संदर्भ:
हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (आईआईटी-मद्रास) के शोधकर्ताओं ने एक उन्नत प्रकाशीय तकनीक विकसित की है, जो जैव-सामग्री की सतह पर रक्त के थक्के बनने के समय को अत्यंत सटीकता से माप सकती है। यह उपलब्धि विशेष रूप से स्टेंट, कृत्रिम हृदय वाल्व और कैथेटर जैसे चिकित्सीय प्रत्यारोपण उपकरणों का निर्माण करने वाली कंपनियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यह नवाचार क्यों महत्वपूर्ण है?
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- जब कोई चिकित्सीय उपकरण रक्त प्रवाह में स्थापित किया जाता है, तो वह अनचाहे थक्के (थ्रोम्बोसिस) बनने की प्रक्रिया को आरंभ कर सकता है। अत्यधिक थक्का बनने से रक्त वाहिकाएँ अवरुद्ध हो सकती हैं, अंगों को क्षति पहुँच सकती है या प्रत्यारोपित उपकरण विफल हो सकता है। इसलिए यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है कि कोई सामग्री रक्त के साथ सुरक्षित और संतुलित व्यवहार करे। इसे रक्त-संगतता (हीमो-कम्पैटिबिलिटी) कहा जाता है और किसी भी उपकरण को नियामक स्वीकृति प्राप्त करने से पूर्व इसका परीक्षण अनिवार्य होता है।
- पारंपरिक थक्का-परीक्षण विधियाँ प्रायः रासायनिक अभिकर्मकों और मानवीय निरीक्षण पर आधारित होती हैं, जिससे परिणामों में भिन्नता आ सकती है और वास्तविक समय की सटीक जानकारी प्राप्त नहीं हो पाती। आईआईटी-मद्रास की यह नई तकनीक प्रकाश के परावर्तन का उपयोग करती है। इसके माध्यम से सतह पर थक्का बनने की शुरुआत और उसकी प्रगति के दौरान होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों का तुरंत पता लगाया जा सकता है। इससे रक्त के थक्का बनने का समय वास्तविक समय में, बिना किसी प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के और अत्यधिक विश्वसनीयता के साथ मापा जा सकता है।
- जब कोई चिकित्सीय उपकरण रक्त प्रवाह में स्थापित किया जाता है, तो वह अनचाहे थक्के (थ्रोम्बोसिस) बनने की प्रक्रिया को आरंभ कर सकता है। अत्यधिक थक्का बनने से रक्त वाहिकाएँ अवरुद्ध हो सकती हैं, अंगों को क्षति पहुँच सकती है या प्रत्यारोपित उपकरण विफल हो सकता है। इसलिए यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है कि कोई सामग्री रक्त के साथ सुरक्षित और संतुलित व्यवहार करे। इसे रक्त-संगतता (हीमो-कम्पैटिबिलिटी) कहा जाता है और किसी भी उपकरण को नियामक स्वीकृति प्राप्त करने से पूर्व इसका परीक्षण अनिवार्य होता है।
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इस तकनीक के लाभ:
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- परीक्षण की समयावधि और लागत में कमी
- गुणवत्ता नियंत्रण में अधिक सटीकता
- उत्पाद की स्वीकृति प्रक्रिया में तेजी
- रोगियों की सुरक्षा में वृद्धि
- परीक्षण की समयावधि और लागत में कमी
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यह तकनीक भारत में स्वदेशी जैव-चिकित्सीय नवाचार को प्रोत्साहित करने और चिकित्सा उपकरण निर्माण को सशक्त बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
रक्त के विषय में:
रक्त एक महत्वपूर्ण द्रव संयोजी ऊतक है, जो शरीर के कुल भार का लगभग 7–8 प्रतिशत होता है। यह शरीर में ऑक्सीजन, पोषक तत्व और हार्मोन पहुँचाने के साथ-साथ चयापचय (Metabolism) से उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का कार्य करता है।
संरचना:
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- प्लाज्मा (55%) – हल्के पीले रंग का द्रव, जिसमें जल, आयन, ग्लूकोज़, हार्मोन तथा विभिन्न प्रोटीन पाए जाते हैं, जैसे:
- एल्ब्यूमिन – जो परासरण दाब को संतुलित बनाए रखता है।
- फाइब्रिनोजेन – जो थक्का बनने की प्रक्रिया में आवश्यक है।
- एल्ब्यूमिन – जो परासरण दाब को संतुलित बनाए रखता है।
- घटक तत्व (45%)
- लाल रक्त कणिकाएँ (एरिथ्रोसाइट्स): ये सर्वाधिक संख्या में पाई जाती हैं। इनमें हीमोग्लोबिन होता है, जो फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन पहुँचाता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड को वापस फेफड़ों तक ले जाता है। स्तनधारियों में इनमें केंद्रक नहीं होता।
- श्वेत रक्त कणिकाएँ (ल्यूकोसाइट्स): ये शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण भाग हैं और संक्रमण से रक्षा करती हैं।
- प्लेटलेट्स (थ्रोम्बोसाइट्स): ये कोशिका खंड होते हैं, जो रक्त के थक्का बनने और रक्तस्राव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- लाल रक्त कणिकाएँ (एरिथ्रोसाइट्स): ये सर्वाधिक संख्या में पाई जाती हैं। इनमें हीमोग्लोबिन होता है, जो फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन पहुँचाता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड को वापस फेफड़ों तक ले जाता है। स्तनधारियों में इनमें केंद्रक नहीं होता।
- प्लाज्मा (55%) – हल्के पीले रंग का द्रव, जिसमें जल, आयन, ग्लूकोज़, हार्मोन तथा विभिन्न प्रोटीन पाए जाते हैं, जैसे:
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रक्त का थक्का बनना (कोएगुलेशन):
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- रक्त का थक्का बनना एक सुरक्षात्मक जैव-शारीरिक प्रक्रिया है, जो रक्त वाहिका के क्षतिग्रस्त होने पर अत्यधिक रक्तस्राव को रोकती है। यह प्रक्रिया तीन प्रमुख चरणों में संपन्न होती है:
- रक्त वाहिकाओं का संकुचन – रक्त प्रवाह को कम करने के लिए वाहिकाएँ सिकुड़ती हैं।
- प्लेटलेट प्लग का निर्माण – प्लेटलेट्स क्षतिग्रस्त स्थान पर चिपककर अस्थायी अवरोध बनाते हैं।
- कोएगुलेशन श्रृंखला – एंजाइम आधारित प्रतिक्रियाओं की एक क्रमिक श्रृंखला फाइब्रिनोजेन को फाइब्रिन तंतुओं में परिवर्तित कर देती है, जिससे मजबूत और स्थायी थक्का बनता है।
- रक्त वाहिकाओं का संकुचन – रक्त प्रवाह को कम करने के लिए वाहिकाएँ सिकुड़ती हैं।
- इस प्रक्रिया में आंतरिक और बाह्य मार्ग शामिल होते हैं, जो अंततः एक सामान्य मार्ग में मिलकर फाइब्रिन जाल का निर्माण करते हैं। कैल्शियम आयन तथा विभिन्न थक्का-कारक इस प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- यद्यपि थक्का बनना शरीर की सुरक्षा के लिए आवश्यक है, किंतु यदि रक्त वाहिकाओं के भीतर असामान्य रूप से थक्का बन जाए, तो यह जीवन के लिए खतरा बन सकता है। यही कारण है कि प्रत्यारोपण उपकरणों के परीक्षण में थक्का बनने के समय का सटीक और विश्वसनीय मापन अत्यंत आवश्यक है।
- रक्त का थक्का बनना एक सुरक्षात्मक जैव-शारीरिक प्रक्रिया है, जो रक्त वाहिका के क्षतिग्रस्त होने पर अत्यधिक रक्तस्राव को रोकती है। यह प्रक्रिया तीन प्रमुख चरणों में संपन्न होती है:
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रक्त के प्रमुख जैव-शारीरिक कार्य:
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- परिवहन – ऑक्सीजन और पोषक तत्वों का संचार तथा कार्बन डाइऑक्साइड और यूरिया का निष्कासन।
- नियमन – शरीर के तापमान और अम्ल-क्षार संतुलन (लगभग 7.4 पीएच) को बनाए रखना।
- सुरक्षा – प्रतिरक्षा रक्षा और रक्त के थक्का बनने की प्रक्रिया को सुनिश्चित करना।
- परिवहन – ऑक्सीजन और पोषक तत्वों का संचार तथा कार्बन डाइऑक्साइड और यूरिया का निष्कासन।
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निष्कर्ष:
आईआईटी-मद्रास द्वारा विकसित यह नई प्रकाशीय थक्का-पहचान तकनीक जैव-चिकित्सीय सुरक्षा को सुदृढ़ बनाती है। यह रक्त की एक महत्वपूर्ण सुरक्षात्मक प्रक्रिया “थक्का बनने” को अधिक स्पष्टता और सटीकता से समझने तथा मापने में महत्वपूर्ण योगदान देगी।

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