चर्चा में क्यों?
हाल ही में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने 16 नई स्वदेशी नस्लों का पंजीकरण किया है। इससे भारत के पशु आनुवंशिक संसाधनों के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और सतत उपयोग के प्रयासों को बल मिला है। इन नस्लों के पंजीकरण की संस्तुति 7 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में आयोजित आईसीएआर की नस्ल पंजीकरण समिति की 14वीं बैठक में की गई।
16 नव-पंजीकृत स्वदेशी नस्लें कौन-सी हैं?
इन 16 नस्लों में 9 पशु प्रजातियाँ शामिल हैं, जो 13 राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश से संबंधित हैं:
- गाय: कोप्पल (कर्नाटक), महाकौशली (मध्य प्रदेश), पेरियार (केरल), उमरदा (महाराष्ट्र)
- भैंस: गोमांचली (गोवा)
- बकरी: बत्तीसी (राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश), तोतापुरी (राजस्थान)
- भेड़: असोमी (असम), कोव देबार (उत्तराखंड), माडग्याल (महाराष्ट्र एवं कर्नाटक), सीमांचली (बिहार)
- गधा: ब्रज (उत्तर प्रदेश)
- घोड़ा/टट्टू: कश्मीरी (जम्मू-कश्मीर)
- सूअर: नागाल (नागालैंड)
- याक: सिक्किमी (सिक्किम)
- कुत्ता: कोम्बाई (तमिलनाडु)
प्रत्येक नस्ल को आईसीएआर-एनबीएजीआर द्वारा एक विशिष्ट पंजीकरण संख्या प्रदान की गई है, जिससे उसका आधिकारिक वैज्ञानिक अभिलेख तैयार हो गया है।
आईसीएआर द्वारा नस्लों का पंजीकरण क्यों महत्वपूर्ण है?
नस्ल पंजीकरण से स्वदेशी पशु आनुवंशिक संसाधनों के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और सतत उपयोग में सहायता मिलती है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल नस्लों में जलवायु के अनुरूप ढलने की क्षमता, रोगों के प्रति सहनशीलता और कम संसाधनों वाली कृषि व्यवस्था में उपयोगिता जैसे महत्वपूर्ण गुण हो सकते हैं।
यह आनुवंशिक विविधता ग्रामीण आजीविका, चयनात्मक प्रजनन, जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशीलता तथा भविष्य में पशुधन सुधार के लिए भी उपयोगी हो सकती है।
आईसीएआर क्या है?
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की स्थापना 16 जुलाई 1929 को हुई थी। यह भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त निकाय है। यह कृषि, बागवानी, मत्स्य पालन तथा पशु विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान और शिक्षा के नियोजन, मार्गदर्शन एवं प्रबंधन के लिए देश की सर्वोच्च संस्था है।
आईसीएआर के प्रमुख कार्य:
आईसीएआर की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल हैं:
- अनुसंधान एवं प्रसार: देशभर में फैले नेटवर्क, जिसमें 700 से अधिक कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) शामिल हैं, के माध्यम से नवाचार और सतत कृषि विकास को बढ़ावा देना।
- प्रौद्योगिकी विकास: खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अधिक उत्पादक तथा जलवायु-सहिष्णु कृषि तकनीकों और फसल किस्मों का विकास करना।
- शिक्षा: उच्च कृषि शिक्षा के मानक निर्धारित करना तथा शिक्षण संस्थानों को मान्यता प्रदान करना।
- क्षमता निर्माण: वैज्ञानिक अनुसंधान को किसानों से जोड़ना तथा खेत-स्तर पर कृषि संबंधी ज्ञान को मजबूत करना।
आईसीएआर-एनबीएजीआर की भूमिका:
आईसीएआर–राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीएजीआर), करनाल भारत में पशु नस्लों के पंजीकरण के लिए प्रमुख नोडल संस्था है। यह विभिन्न पशु आबादियों का वैज्ञानिक रूप से लक्षण-वर्णन करता है तथा नस्लों से संबंधित आधिकारिक अभिलेखों का रखरखाव करता है।
भारत में पंजीकृत नस्लों की संख्या में वृद्धि:
इन नई नस्लों के पंजीकरण के साथ आईसीएआर-एनबीएजीआर के पंजीकृत नस्ल आधार की संख्या बढ़कर 262 हो गई है। इनमें 258 स्वदेशी और 4 संश्लिष्ट नस्लें शामिल हैं।
यह भारत में पाई जाने वाली विविध पशु आबादियों की पहचान और उनके वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण के निरंतर प्रयासों को दर्शाता है।
जलवायु सहनशीलता और संरक्षण:
बदलती जलवायु परिस्थितियों में स्वदेशी नस्लें अत्यंत उपयोगी हो सकती हैं, क्योंकि इनमें से कई नस्लें स्थानीय गर्मी, रोगों तथा पर्यावरणीय दबावों के अनुकूल विकसित हुई हैं।
इन नस्लों का संरक्षण भविष्य में नई नस्लों के विकास और प्रजनन के लिए आनुवंशिक विकल्पों को सुरक्षित रखने तथा सतत पशुधन उत्पादन को बढ़ावा देने में सहायक होगा।
निष्कर्ष:
16 नई स्वदेशी पशु नस्लों का पंजीकरण भारत की पशु आनुवंशिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कोप्पल गाय और माडग्याल भेड़ से लेकर सिक्किमी याक, नागाल सूअर, कश्मीरी टट्टू और कोम्बाई कुत्ते तक, ये नई नस्लें भारत की असाधारण जैव-विविधता को प्रदर्शित करती हैं। इन नस्लों का संरक्षण जैव-विविधता, जलवायु सहनशीलता, सतत कृषि, ग्रामीण आजीविका और दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
