प्रसंग:
हाल ही में रेलवे बोर्ड ने देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन फ्यूल सेल आधारित ट्रेन (DPRS 1200 kW DEMU) के संचालन को आधिकारिक मंजूरी दी है। यह ट्रेन हरियाणा के जींद–सोनीपत रेल खंड पर चलेगी जो भारत के ‘नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन’ लक्ष्य को प्राप्त करने में एक महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी कदम साबित हो सकती है।
हाइड्रोजन ट्रेनें क्या हैं?
-
-
- हाइड्रोजन ट्रेनें, जिन्हें ‘हाइड्रेल’ (Hydrail) या H-ट्रेन भी कहा जाता है, ऐसी विद्युत चालित ट्रेनें हैं जो बाहरी बिजली या डीज़ल के बजाय हाइड्रोजन फ्यूल सेल की सहायता से स्वयं ऊर्जा उत्पन्न करती हैं।
- इनमें हाइड्रोजन फ्यूल सेल (HFC) तकनीक का उपयोग होता है, जिसमें हाइड्रोजन ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके बिजली उत्पन्न करती है। इस प्रक्रिया का एकमात्र उप-उत्पाद जलवाष्प होता है, इसलिए ये उपयोग के स्थान पर शून्य-उत्सर्जन (Zero Emission) वाली ट्रेनें मानी जाती हैं।
- हाइड्रोजन ट्रेनें, जिन्हें ‘हाइड्रेल’ (Hydrail) या H-ट्रेन भी कहा जाता है, ऐसी विद्युत चालित ट्रेनें हैं जो बाहरी बिजली या डीज़ल के बजाय हाइड्रोजन फ्यूल सेल की सहायता से स्वयं ऊर्जा उत्पन्न करती हैं।
-
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की प्रमुख विशेषताएँ:
-
-
- विकसितकर्ता: इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF), चेन्नई
- मार्ग: जींद–सोनीपत, हरियाणा
- संरचना: 10-कोच वाली ट्रेनसेट
- अधिकतम गति: 75 किमी प्रति घंटा
- प्रकार: गैर-विद्युतीकृत मार्ग पर संचालन
- वैश्विक समन्वय: जर्मनी, जापान, स्वीडन और चीन की हाइड्रोजन रेल प्रणालियों के अनुरूप
- विकसितकर्ता: इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF), चेन्नई
-
हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रौद्योगिकी के बारे में:
हाइड्रोजन ट्रेनें विद्युत-रासायनिक अभिक्रियाओं (Electrochemical Reactions) के माध्यम से संचालित होती हैं:
हाइड्रोजन एनोड में प्रवेश करती है और प्रोटॉन तथा इलेक्ट्रॉन में विभाजित हो जाती है।
प्रोटॉन प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन (PEM) से होकर गुजरते हैं।
इलेक्ट्रॉन बाहरी परिपथ (External Circuit) से प्रवाहित होकर बिजली उत्पन्न करते हैं।
कैथोड पर ऑक्सीजन, प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉनों के साथ मिलती है।
उत्पादन: विद्युत् + जलवाष्प + ऊष्मा
इस प्रणाली में दहन (Combustion) नहीं होता तथा इसमें बहुत कम चलायमान भाग होते हैं, जिससे यह शांत और अधिक दक्ष बनती है।
भारत के लिए इसका महत्व:
-
-
- रेलवे का डीकार्बोनाइजेशन: यह भारतीय रेलवे के वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य को समर्थन देता है तथा डीज़ल पर निर्भरता कम करता है।
- स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण: हाइड्रोजन ट्रेनें शून्य टेलपाइप उत्सर्जन प्रदान करती हैं, जिससे भारत को स्वच्छ परिवहन प्रणाली की ओर बढ़ने में सहायता मिलती है।
- रेल नेटवर्क का आधुनिकीकरण: यह गैर-विद्युतीकृत तथा विरासत (Heritage) मार्गों पर हरित परिवहन को संभव बनाती है।
- “हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज” पहल: इस पहल के अंतर्गत भारतीय रेलवे विरासत एवं पहाड़ी मार्गों पर 35 हाइड्रोजन ट्रेनों को संचालित करने की योजना बना रहा है।
- रेलवे का डीकार्बोनाइजेशन: यह भारतीय रेलवे के वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य को समर्थन देता है तथा डीज़ल पर निर्भरता कम करता है।
-
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के बारे में:
वर्ष 2023 में स्वीकृत इस मिशन का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन का वैश्विक केंद्र बनाना है।
प्रमुख लक्ष्य:
-
-
- वर्ष 2030 तक 5 MMT (मिलियन मीट्रिक टन) वार्षिक हरित हाइड्रोजन उत्पादन
- निर्यात वृद्धि के साथ इसे 10 MMT तक विस्तारित करने की संभावना
- इस्पात, रिफाइनिंग और उर्वरक जैसे क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधन का प्रतिस्थापन
- वर्ष 2030 तक 5 MMT (मिलियन मीट्रिक टन) वार्षिक हरित हाइड्रोजन उत्पादन
-
हाइड्रोजन के प्रकार:
-
-
- ग्रे हाइड्रोजन: प्राकृतिक गैस/कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों से स्टीम मीथेन रिफॉर्मिंग प्रक्रिया द्वारा उत्पादित; इसमें CO₂ उत्सर्जन होता है।
- ब्लू हाइड्रोजन: जीवाश्म ईंधनों से उत्पादित, लेकिन इसमें कार्बन कैप्चर एवं स्टोरेज (CCS) तकनीक का उपयोग किया जाता है।
- ग्रीन हाइड्रोजन: नवीकरणीय ऊर्जा की सहायता से इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया द्वारा उत्पादित; इसमें लगभग शून्य उत्सर्जन होता है।
- ग्रे हाइड्रोजन: प्राकृतिक गैस/कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों से स्टीम मीथेन रिफॉर्मिंग प्रक्रिया द्वारा उत्पादित; इसमें CO₂ उत्सर्जन होता है।
-
निष्कर्ष:
भारत की पहली हाइड्रोजन चालित ट्रेन सतत रेलवे परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन तथा वर्ष 2070 तक भारत की नेट-ज़ीरो प्रतिबद्धता के अनुरूप है। उचित विस्तार और आधारभूत संरचना के समर्थन के साथ, हाइड्रोजन ट्रेनें भारत की स्वच्छ, दक्ष और भविष्य-उन्मुख परिवहन प्रणाली का एक प्रमुख आधार बन सकती हैं।
