संदर्भ:
हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने समक्ष प्रस्तुत सामग्री के आधार पर सिर ढकने या हिजाब पहनने को इस्लाम की “आवश्यक धार्मिक प्रथा” (Essential Religious Practice- ERP) के रूप में मानने से इनकार कर दिया है। उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी कक्षा 11 की एक मुस्लिम छात्रा द्वारा दायर याचिका पर दी गई, जिसमें उसने स्कूल की वर्दी के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगी थी।
न्यायालय की टिप्पणी के बारे में:
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- छात्रा ने तर्क दिया था कि सिर पर स्कार्फ या हिजाब पहनना एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है और उसके मौलिक अधिकारों, विशेषकर अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत इसकी संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है।
- छात्रा कक्षा 6 से ही विद्यालय में सिर पर स्कार्फ या हिजाब पहनती आ रही थी, लेकिन न्यायालय ने कहा कि पूर्व अनुमति से ड्रेस कोड में छूट का कोई प्रवर्तनीय अधिकार नहीं बनता। पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में हिजाब को आवश्यक धार्मिक प्रथा भी सिद्ध नहीं किया जा सका। न्यायालय ने माना कि मामला मुख्यतः विद्यालय के ड्रेस कोड और संस्थागत अनुशासन से जुड़ा है।
- छात्रा ने तर्क दिया था कि सिर पर स्कार्फ या हिजाब पहनना एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है और उसके मौलिक अधिकारों, विशेषकर अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत इसकी संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है।
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आवश्यक धार्मिक प्रथा का सिद्धांत क्या है?
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- आवश्यक धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practices—ERP) सिद्धांत न्यायपालिका द्वारा विकसित एक सिद्धांत है, जिसका उपयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि कौन-सी धार्मिक प्रथाएं अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संवैधानिक संरक्षण प्राप्त करती हैं।
- अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। हालांकि, यह स्वतंत्रता संविधान में निर्धारित सीमाओं के अधीन है।
- अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार भी लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।
- इस सिद्धांत की उत्पत्ति सामान्यतः शिरूर मठ मामले (1954) से मानी जाती है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि किसी धर्म से अभिन्न और आवश्यक धार्मिक प्रथाओं को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हो सकता है।
- आवश्यक धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practices—ERP) सिद्धांत न्यायपालिका द्वारा विकसित एक सिद्धांत है, जिसका उपयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि कौन-सी धार्मिक प्रथाएं अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संवैधानिक संरक्षण प्राप्त करती हैं।
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न्यायिक हस्तक्षेप:
आवश्यक धार्मिक प्रथा (ERP) सिद्धांत का विभिन्न महत्वपूर्ण मामलों में प्रयोग किया गया है:
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- सबरीमाला मामला (2018): धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के संदर्भ में महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय ने विचार किया।
- तीन तलाक मामला (2017): सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल तीन तलाक को असंवैधानिक ठहराते हुए कहा कि यह इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है।
- कर्नाटक हिजाब मामला: न्यायालय ने इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या इस्लाम में हिजाब पहनना एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है।
- न्यायालयों ने धार्मिक संप्रदायों तथा पशु बलि जैसी विभिन्न धार्मिक प्रथाओं से जुड़े मामलों में भी इस सिद्धांत की जांच की है।
- सबरीमाला मामला (2018): धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के संदर्भ में महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय ने विचार किया।
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प्रमुख आलोचनाएं:
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- न्यायिक धार्मिक-शास्त्रीय हस्तक्षेप: न्यायालयों के पास यह निर्धारित करने के लिए आवश्यक धार्मिक या धर्मशास्त्रीय विशेषज्ञता न होने की संभावना रहती है कि किसी धर्म में कौन-सी प्रथा वास्तव में आवश्यक है।
- व्यक्तिपरकता: यह निर्धारित करने के लिए कोई पूरी तरह एकरूप और निश्चित कसौटी नहीं है कि किसी धार्मिक प्रथा को आवश्यक धार्मिक प्रथा माना जाए या नहीं।
- धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सामाजिक सुधार: यह सिद्धांत इस महत्वपूर्ण प्रश्न को जन्म देता है कि समानता और गरिमा की रक्षा के लिए राज्य तथा न्यायपालिका को धार्मिक प्रथाओं में कितनी सीमा तक हस्तक्षेप करना चाहिए।
- न्यायिक धार्मिक-शास्त्रीय हस्तक्षेप: न्यायालयों के पास यह निर्धारित करने के लिए आवश्यक धार्मिक या धर्मशास्त्रीय विशेषज्ञता न होने की संभावना रहती है कि किसी धर्म में कौन-सी प्रथा वास्तव में आवश्यक है।
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संवैधानिक महत्व:
हिजाब का मुद्दा धार्मिक स्वतंत्रता, समानता, व्यक्तिगत गरिमा और संस्थागत अनुशासन के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इसमें अनुच्छेद 14, 19 और 25 से जुड़े संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं तथा यह संवैधानिक नैतिकता और भारतीय धर्मनिरपेक्षता की व्यापक अवधारणा पर भी महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।
निष्कर्ष:
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय आवश्यक धार्मिक प्रथा सिद्धांत की निरंतर प्रासंगिकता और उससे जुड़े विवादों को रेखांकित करता है। व्यापक संवैधानिक चुनौती यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता, समानता, गरिमा, सामाजिक सुधार और संवैधानिक नैतिकता के बीच ऐसा संतुलन स्थापित किया जाए, जो व्यक्तिगत अधिकारों के साथ-साथ संस्थागत अनुशासन और संवैधानिक मूल्यों की भी रक्षा करे।
