संदर्भ:
हाई सीज़ संधि, जिसे औपचारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के अंतर्गत राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे क्षेत्रों में समुद्री जैव-विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग पर समझौता (BBNJ Agreement) कहा जाता है, 17 जनवरी 2026 को प्रभाव में आई। यह पहली बार है जब वैश्विक समुदाय ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्रों, जो किसी भी एक देश के अधिकार क्षेत्र से बाहर स्थित विशाल महासागरीय क्षेत्र हैं, में समुद्री जीवन की रक्षा हेतु कानूनी रूप से बाध्यकारी ढांचा अपनाया है।
पृष्ठभूमि:
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- महासागर पृथ्वी की सतह के 70% से अधिक भाग को आच्छादित करते हैं और इनमें से लगभग दो-तिहाई क्षेत्र, जिसे हाई सीज़ कहा जाता है, राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर स्थित है। ऐतिहासिक रूप से, इन क्षेत्रों में समुद्री जैव-विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग के लिए कोई एकीकृत कानूनी व्यवस्था नहीं थी, जिससे ये क्षेत्र विशेष रूप से निम्नलिखित खतरों के प्रति संवेदनशील रहे हैं:
- विनाशकारी मत्स्य प्रथाएँ, जिनमें अत्यधिक मछली पकड़ना तथा अवैध, अप्रतिबंधित और अनियमित (IUU) मछली पकड़ना शामिल हैं:
- नौवहन से उत्पन्न प्रभाव और प्रदूषण, विशेषकर प्लास्टिक कचरा
- जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न दबाव, जैसे महासागरों का गर्म होना और अम्लीकरण
- गहरे समुद्र में खनन जैसी उभरती हुई चुनौतियाँ
- नौवहन से उत्पन्न प्रभाव और प्रदूषण, विशेषकर प्लास्टिक कचरा
- लगभग दो दशकों की वार्ताओं के बाद, BBNJ समझौते को जून 2023 में अपनाया गया, सितंबर 2023 में हस्ताक्षर हेतु खोला गया और कम से कम 60 देशों द्वारा अनुमोदन के बाद सितंबर 2025 में आवश्यक सीमा पूरी होने के 120 दिनों बाद यह प्रभाव में आया।
- महासागर पृथ्वी की सतह के 70% से अधिक भाग को आच्छादित करते हैं और इनमें से लगभग दो-तिहाई क्षेत्र, जिसे हाई सीज़ कहा जाता है, राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर स्थित है। ऐतिहासिक रूप से, इन क्षेत्रों में समुद्री जैव-विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग के लिए कोई एकीकृत कानूनी व्यवस्था नहीं थी, जिससे ये क्षेत्र विशेष रूप से निम्नलिखित खतरों के प्रति संवेदनशील रहे हैं:
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हाई सीज़ संधि की प्रमुख विशेषताएँ:
यह संधि राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे क्षेत्रों (ABNJ) में समुद्री जैव-विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग के लिए एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचा स्थापित करती है। इसके प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं:
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- समुद्री संरक्षित क्षेत्र (Marine Protected Areas – MPAs):
- पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों के संरक्षण हेतु हाई सीज़ में समुद्री संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना की व्यवस्था।
- वर्तमान में हाई सीज़ के केवल लगभग 1% क्षेत्र को ही संरक्षण प्राप्त है; यह संधि संरक्षण कवरेज को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाने के उपकरण प्रदान करती है।
- पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों के संरक्षण हेतु हाई सीज़ में समुद्री संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना की व्यवस्था।
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIAs):
- जिन गतिविधियों से हाई सीज़ की जैव-विविधता को नुकसान पहुँच सकता है, जैसे गहरे समुद्र में खनन और बड़े पैमाने पर मछली पकड़ना, उनके लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अनिवार्य किया गया है।
- इसका उद्देश्य संचयी पर्यावरणीय क्षति को रोकना, न्यूनतम करना या कम करना है।
- जिन गतिविधियों से हाई सीज़ की जैव-विविधता को नुकसान पहुँच सकता है, जैसे गहरे समुद्र में खनन और बड़े पैमाने पर मछली पकड़ना, उनके लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अनिवार्य किया गया है।
- समुद्री आनुवंशिक संसाधन (Marine Genetic Resources – MGRs):
- संधि समुद्री जीवों से प्राप्त आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से उत्पन्न लाभों के न्यायसंगत और समान वितरण का प्रावधान करती है, जिसमें डिजिटल अनुक्रम सूचना भी शामिल है।
- यह विशेष रूप से विकासशील देशों के हित में न्याय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर बल देती है।
- संधि समुद्री जीवों से प्राप्त आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से उत्पन्न लाभों के न्यायसंगत और समान वितरण का प्रावधान करती है, जिसमें डिजिटल अनुक्रम सूचना भी शामिल है।
- क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण:
- विकासशील देशों को हाई सीज़ प्रशासन और समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान में प्रभावी भागीदारी हेतु समर्थन प्रदान किया जाएगा।
- इससे समुद्री संरक्षण प्रयासों में समावेशी और समान भागीदारी को बढ़ावा मिलता है।
- विकासशील देशों को हाई सीज़ प्रशासन और समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान में प्रभावी भागीदारी हेतु समर्थन प्रदान किया जाएगा।
- संस्थागत ढांचा:
- संधि के अंतर्गत पक्षकारों का सम्मेलन (COP), एक वैज्ञानिक एवं तकनीकी निकाय, तथा सचिवालय जैसे संस्थागत ढांचों की स्थापना का प्रावधान है, जो कार्यान्वयन और निर्णय-निर्माण का समन्वय करेंगे।
- संधि के अंतर्गत पक्षकारों का सम्मेलन (COP), एक वैज्ञानिक एवं तकनीकी निकाय, तथा सचिवालय जैसे संस्थागत ढांचों की स्थापना का प्रावधान है, जो कार्यान्वयन और निर्णय-निर्माण का समन्वय करेंगे।
- समुद्री संरक्षित क्षेत्र (Marine Protected Areas – MPAs):
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महत्व:
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- वैश्विक महासागरीय शासन:
- पहली बार, अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र जो पहले खंडित और क्षेत्र-विशिष्ट कानूनों द्वारा शासित थे, अब जैव-विविधता संरक्षण और सततता पर केंद्रित एकीकृत, कानूनी रूप से बाध्यकारी व्यवस्था के अंतर्गत आए हैं।
- यह पृथ्वी के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साझा संसाधन के प्रबंधन में वैश्विक सहयोग की बड़ी उपलब्धि है।
- पहली बार, अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र जो पहले खंडित और क्षेत्र-विशिष्ट कानूनों द्वारा शासित थे, अब जैव-विविधता संरक्षण और सततता पर केंद्रित एकीकृत, कानूनी रूप से बाध्यकारी व्यवस्था के अंतर्गत आए हैं।
- संरक्षण और जलवायु संबंध:
- स्वस्थ महासागर कार्बन अवशोषण, ऑक्सीजन उत्पादन, और वैश्विक जलवायु प्रणाली के विनियमन में अहम भूमिका निभाते हैं।
- हाई सीज़ पारिस्थितिकी तंत्रों का संरक्षण जलवायु शमन और जैव-विविधता लक्ष्यों में प्रत्यक्ष योगदान देता है, जिनमें 2030 तक 30% महासागरीय क्षेत्रों की रक्षा (30×30 लक्ष्य) शामिल है।
- स्वस्थ महासागर कार्बन अवशोषण, ऑक्सीजन उत्पादन, और वैश्विक जलवायु प्रणाली के विनियमन में अहम भूमिका निभाते हैं।
- समानता और समावेशन:
- क्षमता निर्माण और लाभ-साझेदारी पर जोर देकर यह संधि विकासशील देशों को समुद्री अनुसंधान और संरक्षण में सार्थक भागीदारी का अवसर देती है।
- यह वैश्विक महासागरीय शासन में पारिस्थितिक प्रभावशीलता और अंतरराष्ट्रीय समानता दोनों के लिए आवश्यक है।
- क्षमता निर्माण और लाभ-साझेदारी पर जोर देकर यह संधि विकासशील देशों को समुद्री अनुसंधान और संरक्षण में सार्थक भागीदारी का अवसर देती है।
- वैज्ञानिक सहयोग:
- अनुमोदन करने वाले देशों को समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान में सहयोग, डेटा साझा करने और महासागरीय खतरों पर नीतिगत समन्वय करना अनिवार्य है।
- इससे ज्ञान-अंतर कम होते हैं और हाई सीज़ से जुड़े मुद्दों पर साक्ष्य-आधारित निर्णय-निर्माण को मजबूती मिलती है।
- अनुमोदन करने वाले देशों को समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान में सहयोग, डेटा साझा करने और महासागरीय खतरों पर नीतिगत समन्वय करना अनिवार्य है।
- वैश्विक महासागरीय शासन:
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