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Blog / 04 Jun 2026

हर्बल सिगरेट भी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक: नया अध्ययन

संदर्भ:
हाल ही में विश्व तंबाकू निषेध दिवस (31 मई) के अवसर पर 'जर्नल ऑफ हैजार्डस मैटेरियल्स' में प्रकाशित एक नए शोध ने जन-स्वास्थ्य नीति के समक्ष एक गंभीर चुनौती पेश की है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गांधीनगर (IITGN) और अमेरिका के इलिनोइस विश्वविद्यालय के इस संयुक्त अध्ययन से पता चला है कि 'प्राकृतिक' और 'तंबाकू-मुक्त' के रूप में विज्ञापित हर्बल सिगरेट, पारंपरिक तंबाकू उत्पादों की तुलना में स्वास्थ्य के लिए उतनी ही या उससे भी अधिक हानिकारक हैं।

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष:

वैज्ञानिकों ने भारत में प्रचलित दो प्रमुख तंबाकू सिगरेट ब्रांडों की तुलना तुलसी, लौंग, दालचीनी, ग्रीन टी और कैमोमाइल युक्त चार लोकप्रिय हर्बल सिगरेटों से की। इसके परिणाम निम्नलिखित हैं:

1.     सूक्ष्म कणों का उच्च उत्सर्जन (Fine Particulate Matter): हर्बल सिगरेट के धुएं में 500 नैनोमीटर से छोटे महीन कणों (Sub-500-nm Particles) की सांद्रता तंबाकू की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक पाई गई। ये कण फेफड़ों के एल्वियोली को पार कर सीधे रक्तप्रवाह में प्रवेश करने में सक्षम हैं।

2.     ऑक्सीडेटिव पोटेंशियल (OP): हर्बल धुएं में उच्च ऑक्सीडेटिव क्षमता देखी गई, जो शरीर में 'रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज' (ROS) को बढ़ाती है। यह सेलुलर स्तर पर डीएनए क्षति, गंभीर सूजन (Inflammation) और हृदय रोगों का कारण बनती है।

3.     वरण (Wrapper) का प्रभाव: तेंदू के पत्तों (बीड़ी की तरह) में लिपटे हर्बल वेरिएंट्स में कागज से लिपटी सिगरेटों की तुलना में ऑक्सीडेटिव पोटेंशियल 49 प्रतिशत अधिक पाया गया।

4.     विषाक्त भारी धातुएं: '100% प्राकृतिक' होने का दावा करने वाली कुछ तुलसी-आधारित हर्बल सिगरेटों में सीसा (Lead) जैसी हानिकारक भारी धातुओं की उपस्थिति भी दर्ज की गई।

नीतिगत मुद्दे और नियामक अंतराल (Regulatory Gaps)

भारत में तंबाकू उत्पादों को 'सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003' (COTPA) के तहत विनियमित किया जाता है। हालांकि, हर्बल सिगरेट इस कानून के दायरे से बाहर रह जाती हैं क्योंकि इनमें तंबाकू या निकोटीन नहीं होता।

इस नियामक अंतराल के कारण दो बड़ी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं:

  • भ्रामक विपणन (Greenwashing): कंपनियां इन्हें 'वेलनेस प्रोडक्ट' या धूम्रपान छोड़ने के 'सुरक्षित विकल्प' के रूप में प्रचारित करती हैं। इससे युवाओं और गैर-धूम्रपान करने वालों में इसके सेवन के प्रति भ्रामक सुरक्षा का भाव (False Sense of Safety) पैदा हो रहा है।
  • दहन (Combustion) का विज्ञान: यह शोध सिद्ध करता है कि जन-स्वास्थ्य के लिए खतरा केवल निकोटीन नहीं, बल्कि किसी भी कार्बनिक पदार्थ के जलने से उत्पन्न होने वाला धुआं, टार और कालिख हैं।

आगे की राह:

  • सख्त नियामक ढांचा: सरकार को COTPA के दायरे का विस्तार करना चाहिए ताकि 'तंबाकू-मुक्त' धूम्रपान उत्पादों को भी इसमें शामिल कर उन पर वैधानिक स्वास्थ्य चेतावनियां अनिवार्य की जा सकें।
  • मानकीकरण: भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) या केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) को हर्बल धूम्रपान उत्पादों में भारी धातुओं और अन्य अवयवों की कड़ाई से जांच करनी चाहिए।
  • जन-जागरूकता: 'प्राकृतिक का अर्थ सुरक्षित नहीं' विषय पर व्यापक स्वास्थ्य अभियान चलाकर इस भ्रामक नैरेटिव को तोड़े जाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष:

वर्तमान में हर्बल सिगरेटों को उनके प्राकृतिक दावों के कारण कड़े नीतिगत नियमों से अक्सर छूट मिली रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस भ्रामक मार्केटिंग के कारण लोग बिना किसी डर के इनका सेवन बढ़ा रहे हैं, जो उनके स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए इन उत्पादों पर भी तंबाकू जैसे ही सख्त नियम और स्वास्थ्य चेतावनियां लागू की जानी चाहिए।

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