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Blog / 14 May 2026

खाद्य सुरक्षा और भारतीय कृषि पर अत्यधिक गर्मी का प्रभाव

खाद्य सुरक्षा पर अत्यधिक गर्मी का प्रभाव

संदर्भ:

हाल ही में खाद्य एवं कृषि संगठन तथा विश्व मौसम विज्ञान संगठन की एक संयुक्त रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अत्यधिक गर्मी वैश्विक कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बनती जा रही है।

अत्यधिक गर्मी (Extreme Heat) के बारे में:

      • अत्यधिक गर्मी से आशय अत्यधिक उच्च तापमान की लंबी अवधि से है, जिसे आधिकारिक रूप से हीटवेव” (लू) की श्रेणी में रखा जाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण इनकी तीव्रता और आवृत्ति लगातार बढ़ रही है।
      • यह एक महत्वपूर्ण गैर-पारंपरिक आपदा है, जो स्वास्थ्य, कृषि तथा श्रम क्षेत्र को प्रभावित करती है। इसका सबसे अधिक प्रभाव गरीबों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर पड़ता है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:

      • खतरे को बढ़ाने वाला कारकके रूप में अत्यधिक गर्मी:
        • रिपोर्ट में अत्यधिक गर्मी को थ्रेट मल्टिप्लायर (Threat Multiplier) अर्थात खतरों को बढ़ाने वाला कारकबताया गया है, क्योंकि यह विकासशील देशों में पहले से मौजूद कमजोरियों को और अधिक गंभीर बना देती है।
        • अत्यधिक गर्मी मिट्टी की नमी के वाष्पीकरण को बढ़ाती है, वर्षा चक्र को बाधित करती है, कृषि भूमि को शुष्क बनाती है तथा बाढ़ और सूखे जैसी स्थितियों को जन्म देती है।
        • यह वनों को नुकसान पहुँचाती है, जैव विविधता को कम करती है तथा खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित करती है। चूँकि विश्व की लगभग 80 प्रतिशत कृषि भूमि वर्षा पर निर्भर है, इसलिए बढ़ता तापमान खाद्य उत्पादन प्रणालियों पर गंभीर दबाव उत्पन्न कर रहा है।
      • भारत की खाद्य प्रणाली पर प्रभाव:
        • भारत की खाद्य सुरक्षा मुख्य रूप से गेहूँ और चावल जैसी जलवायु-संवेदनशील फसलों पर निर्भर करती है। भारत का अन्न भंडारकहे जाने वाले इंडो-गंगेटिक मैदान (Indo-Gangetic Plains) टर्मिनल हीट स्ट्रेस के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।
        • सामान्य तापमान से केवल 1–2°C की वृद्धि भी गेहूँ की उत्पादकता को कम कर सकती है, क्योंकि इससे दाने सिकुड़ जाते हैं तथा फसल समय से पहले पकने लगती है। वर्ष 2022 की हीटवेव के कारण भारत के कई राज्यों में गेहूँ उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई थी।
        • चावल की खेती भी जोखिम में है, क्योंकि यह वर्षा और स्थिर मौसम परिस्थितियों पर अत्यधिक निर्भर करती है।
        • भारत में कुल कैलोरी सेवन का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा चावल से प्राप्त होता है, इसलिए बढ़ती गर्मी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष खतरा उत्पन्न करती है। गेहूँ और चावल की एकल फसल प्रणाली (Monoculture Farming) पर भारत की अत्यधिक निर्भरता जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता को और बढ़ाती है।
      • पशुधन, मत्स्य पालन और वनों पर प्रभाव:
        • अत्यधिक गर्मी पशुधन क्षेत्र, विशेषकर डेयरी और पोल्ट्री उद्योग, पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। हीट स्ट्रेस के कारण दूध और अंडा उत्पादन में कमी आती है तथा पशुओं की मृत्यु दर बढ़ जाती है।
        • मत्स्य क्षेत्र भी खतरे में है, क्योंकि समुद्री तापमान में वृद्धि से जल में घुलित ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है और मछलियाँ गहरे समुद्री क्षेत्रों की ओर चली जाती हैं, जहाँ तक पारंपरिक मछुआरों की पहुँच कठिन हो जाती है।
        • वन भी अत्यधिक संवेदनशील हैं, क्योंकि बढ़ता तापमान वनाग्नि (Wildfires) के जोखिम को बढ़ाता है। इससे जैव विविधता को नुकसान पहुँचता है तथा फल, शहद और औषधीय पौधों जैसे वन उत्पादों की उपलब्धता कम हो जाती है।

भारत की कृषि नीति व्यवस्था से संबंधित चुनौतियाँ:

      • भारत की कृषि नीतियाँ मुख्यतः खाद्य उत्पादन बढ़ाने पर केंद्रित रही हैं, न कि जलवायु-सहिष्णुता (Climate Resilience) पर।
      • सब्सिडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रणाली गेहूँ और धान जैसी जल-गहन फसलों की खेती को प्रोत्साहित करती है। दूसरी ओर, सरकार द्वारा श्री अन्नके रूप में प्रचारित किए जाने के बावजूद बाजरा और दलहन जैसी जलवायु-सहिष्णु फसलें किसानों के लिए अपेक्षाकृत कम लाभकारी बनी हुई हैं।

निष्कर्ष:

अत्यधिक गर्मी भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है। जलवायु-संवेदनशील फसलें, मानसून पर निर्भरता तथा विशाल कृषि कार्यबल भारत को बढ़ते तापमान के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाते हैं।

इस संकट से निपटने के लिए भारत को फसल विविधीकरण, जलवायु-सहिष्णु कृषि, श्रमिक सुरक्षा तथा सतत कृषि नीतियों को बढ़ावा देना होगा, ताकि अधिक सुरक्षित और लचीली खाद्य प्रणाली का निर्माण किया जा सके।

 

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