लोकसभा में गिलोटिन प्रक्रिया
संदर्भ:
हाल ही में लोकसभा ने 2026–27 के लिए अनुदान की मांग को (Demands for Grants) स्वीकृति प्रदान की गयी, जिसमें लगभग ₹53 लाख करोड़ से अधिक का व्यय मंजूर किया गया। यह स्वीकृति गिलोटिन (Guillotine) प्रक्रिया के माध्यम से किया गया, अर्थात वह संसदीय प्रक्रिया जिसके तहत बजट सत्र के अंतिम दिनों में कुछ प्रमुख मंत्रालयों जैसे कृषि और रेलवे को छोड़कर अधिकांश मंत्रालयों की मांगें बिना विस्तृत चर्चा के मंजूर कर दी जाती है।
अनुदान की मांग और गिलोटिन के बारे में:
-
-
- अनुदान की मांग (Demands for Grants):
- संविधान के अनुच्छेद 113 के तहत, प्रत्येक मंत्रालय अपनी अनुदान की मांगें (डिमांड्स फॉर ग्रांट्स) प्रस्तुत करता है। ये अगले वित्तीय वर्ष में होने वाले व्यय के अनुमान होते हैं। इसमें राजस्व और पूंजीगत व्यय दोनों शामिल हैं और इन पर लोकसभा की मंजूरी आवश्यक है, ताकि भारत की संचित निधि से पैसे निकाले जा सकें।
- केवल लोकसभा के पास इन डिमांड्स पर मतदान करने का अधिकार है।
- हर मंत्रालय की डिमांड अलग से चर्चा और मतदान के लिए पेश की जाती है।
- सांसद कट मोशन पेश करके व्यय घटाने या अस्वीकृत करने का प्रस्ताव रख सकते हैं।
- केवल लोकसभा के पास इन डिमांड्स पर मतदान करने का अधिकार है।
- संविधान के अनुच्छेद 113 के तहत, प्रत्येक मंत्रालय अपनी अनुदान की मांगें (डिमांड्स फॉर ग्रांट्स) प्रस्तुत करता है। ये अगले वित्तीय वर्ष में होने वाले व्यय के अनुमान होते हैं। इसमें राजस्व और पूंजीगत व्यय दोनों शामिल हैं और इन पर लोकसभा की मंजूरी आवश्यक है, ताकि भारत की संचित निधि से पैसे निकाले जा सकें।
-
गिलोटिन प्रक्रिया:
- समय की कमी के कारण, सभी मांगों पर विस्तार से चर्चा करना संभव नहीं होता। ऐसे में स्पीकर गिलोटिन प्रक्रिया अपनाते हैं:
- बाकी सभी बिना चर्चा वाली डिमांड्स को एक साथ मतदान के लिए रखा जाता है।
- इन्हें बिना किसी और बहस के पास कर दिया जाता है।
- यह आमतौर पर बजट चर्चा के अंतिम दिन होता है, ताकि बजट समय पर पास हो सके और सरकार का कामकाज बाधित न हो।
- समय की कमी के कारण, सभी मांगों पर विस्तार से चर्चा करना संभव नहीं होता। ऐसे में स्पीकर गिलोटिन प्रक्रिया अपनाते हैं:
- अनुदान की मांग (Demands for Grants):
-
गिलोटिन प्रक्रिया के पीछे कारण:
-
-
- समय सीमा: केंद्रीय बजट में कई मंत्रालय और विभाग शामिल हैं, इसलिए सभी डिमांड्स पर विस्तार से चर्चा करना संभव नहीं होता।
- शासन की निरंतरता सुनिश्चित करना: वित्तीय प्रस्तावों का समय पर पास होना आवश्यक है। व्यय की मंजूरी के बिना राज्य कानूनी रूप से खर्च नहीं कर सकता। गिलोटिन प्रक्रिया वित्तीय अड़चन को रोकता है।
- सुसंगठित संसदीय प्रक्रिया: गिलोटिन प्रक्रिया लागू करने से पहले:
- डिमांड्स का विभागीय स्थायी समितियों द्वारा अध्ययन किया जाता है।
- कुछ प्रमुख मंत्रालयों पर लोकसभा में विस्तार से चर्चा होती है।
इस प्रकार, सभी डिमांड्स पर चर्चा न होने के बावजूद कुछ स्तर की जांच अवश्य होती है।
- डिमांड्स का विभागीय स्थायी समितियों द्वारा अध्ययन किया जाता है।
- समय सीमा: केंद्रीय बजट में कई मंत्रालय और विभाग शामिल हैं, इसलिए सभी डिमांड्स पर विस्तार से चर्चा करना संभव नहीं होता।
-
चिंताएं और प्रभाव:
-
-
- संसदीय जांच की कमी: बजट का 70–80% हिस्सा बिना चर्चा के पास हो जाता है। इससे सांसदों की क्षमता सीमित हो जाती है कि वे:
- सरकार के खर्च पर सवाल उठाएं
- अप्रभावी या गलत आवंटन उजागर करें
- जनता की चिंताओं का प्रतिनिधित्व करें
- सरकार के खर्च पर सवाल उठाएं
- जवाबदेही कमजोर होना: संसद का वित्तीय मामलों में मुख्य काम कार्यपालिका पर निगरानी रखना है। जब डिमांड्स बिना बहस पास हो जाती हैं, तो यह निगरानी कमजोर हो जाती है।
- विपक्ष का हाशिये पर जाना: गिलोटिन प्रक्रिया विपक्ष के लिए मुद्दे उठाने, कट मोशन लाने और सरकार को जवाबदेह ठहराने के अवसर कम कर देती है। इससे लोकतांत्रिक बहस प्रभावित होती है।
- समितियों पर अधिक निर्भरता: स्थायी समितियां डिमांड्स का अध्ययन करती हैं, लेकिन उनकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होतीं। संसद में बाद में बहस न होने से समिति की जांच का प्रभाव कम हो जाता है।
- प्रक्रियात्मक बनाम वास्तविक लोकतंत्र: गिलोटिन प्रक्रिया बजट की प्रक्रियात्मक पूर्ति सुनिश्चित करती है, लेकिन वास्तविक लोकतांत्रिक भागीदारी (जहां नीतियों पर गंभीर बहस होती है और उन्हें परिष्कृत किया जाता है) कम हो सकती है।
- संसदीय जांच की कमी: बजट का 70–80% हिस्सा बिना चर्चा के पास हो जाता है। इससे सांसदों की क्षमता सीमित हो जाती है कि वे:
-
