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Blog / 04 Apr 2026

ग्रेट निकोबार परियोजना: जनजातीय अधिकार, पारिस्थितिकी और रणनीतिक महत्व

ग्रेट निकोबार परियोजना

सन्दर्भ:

हाल ही में, अंडमान और निकोबार प्रशासन द्वारा जारी "व्यापक जनजातीय कल्याण योजना" (Comprehensive Tribal Welfare Plan) के मसौदे ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। ₹72,000 करोड़ (अनुमानित ₹92,000 करोड़ तक) की इस मेगा परियोजना के लिए 'निकोबारी' और 'शोंपेन' जनजातियों के स्थानांतरण की बात इस दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से कही गई है, जबकि पहले सरकार ने विस्थापन से इनकार किया था।

परियोजना के विषय में:

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट (~₹72,000 करोड़) नीति आयोग द्वारा परिकल्पित एक रणनीतिक मेगा-अवसंरचना योजना है, जो अंडमान के दक्षिणी छोर पर स्थित है। 2021 में शुरू की गई इस परियोजना के मुख्य घटकों में गैलेथिया खाड़ी में अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, आधुनिक टाउनशिप और एक 450 MVA गैस-सौर ऊर्जा संयंत्र शामिल है।

जनजातीय समुदायों से जुड़ी प्रमुख चिंताएँ:

      • आवास और भूमि का अधिकार: प्रशासन ने ₹42.52 करोड़ की योजना पेश की है ताकि निकोबारी समुदायों को 'परियोजना प्रभावित क्षेत्रों' से हटाया जा सके। जनजातीय परिषद का आरोप है कि उन्हें अपनी पैतृक भूमि छोड़ने के लिए 'सरेंडर सर्टिफिकेट' पर हस्ताक्षर करने का दबाव दिया जा रहा है।
      • शोंपेन (Shompen) जनजाति पर खतरा: शोंपेन एक 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह' (PVTG) हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बाहरी आबादी (2050 तक 3 लाख का लक्ष्य) के आने से इनकी संस्कृति और स्वास्थ्य (प्रतिरक्षा की कमी) पर गंभीर संकट आ सकता है।
      • सहमति का उल्लंघन: वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के तहत ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है। जनजातीय परिषद ने 2022 में अपनी एनओसी (NOC) वापस ले ली थी, यह दावा करते हुए कि उन्हें अंधेरे में रखकर हस्ताक्षर कराए गए थे।

पर्यावरण और पारिस्थितिक प्रभाव:

      • यह द्वीप यूनेस्को बायोस्फीयर रिजर्व का हिस्सा है।
      • परियोजना के लिए लगभग 130 वर्ग किलोमीटर वन भूमि के डायवर्जन की आवश्यकता है, जिससे करीब 8.5 लाख से 10 लाख पेड़ काटे जा सकते हैं।
      • गैलाथिया खाड़ी 'जायंट लेदरबैक कछुओं' का महत्वपूर्ण प्रजनन स्थल है, जो इस निर्माण से नष्ट हो सकता है।

सरकार का पक्ष:

      • हिंद महासागर में प्रभुत्व: यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के करीब है। यहाँ बंदरगाह और हवाई अड्डा बनने से भारत की सैन्य और व्यापारिक स्थिति मजबूत होगी।
      • आर्थिक विकास: ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल से भारत वैश्विक समुद्री व्यापार का बड़ा केंद्र बन सकता है।
      • कानूनी स्थिति:
        • कलकत्ता उच्च न्यायालय और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में इस परियोजना के खिलाफ कई याचिकाएं लंबित हैं। न्यायालय ने हाल ही में प्रशासन से पूछा है कि क्या आदिवासियों की वास्तविक सहमति ली गई है या यह केवल कागजी खानापूर्ति है।

आगे की राह:

      • संतुलित दृष्टिकोण: विकास और सुरक्षा (Strategic interests) अनिवार्य हैं, लेकिन यह स्थानीय समुदायों के संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 21 और 5वीं/6वीं अनुसूची की भावना) की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
      • सहमति और पुनर्वास: 'वन अधिकार अधिनियम' का अक्षरशः पालन सुनिश्चित किया जाए और पुनर्वास केवल भौतिक न होकर सांस्कृतिक रूप से भी अनुकूल हो।
      • पारिस्थितिक सुरक्षा: पर्यावरणीय क्षति को कम करने के लिए 'शमन उपायों' (Mitigation measures) को पारदर्शी तरीके से लागू करना चाहिए।

निष्कर्ष:

ग्रेट निकोबार परियोजना का ₹92,000 करोड़ का मेगा-विकास प्रस्ताव स्थानीय निकोबारी और विशेष रूप से कमजोर शोंपेन जनजातियों के पुनर्वास और वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 के उल्लंघन की चिंताओं के कारण विवादों में है । रणनीतिक बंदरगाह, हवाई अड्डे और टाउनशिप के निर्माण के लिए पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई और स्वदेशी संस्कृति के विलुप्त होने का खतरा है । परियोजना को 'जनजातीय पंचशील सिद्धांतों' का पालन करते हुए, पारदर्शी संवाद और कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से विकास और स्वदेशी अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है।