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Blog / 18 Feb 2026

ग्रेट निकोबार द्वीप मेगा परियोजना को एनजीटी की मंजूरी

संदर्भ:

हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने ₹92,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार द्वीप मेगा अवसंरचना परियोजना को मंजूरी प्रदान की है। न्यायाधिकरण ने इसे रणनीतिक, रक्षा और राष्ट्रीय महत्वकी परियोजना बताया। यह निर्णय उन कई याचिकाओं को निरस्त करने के बाद लिया गया, जिनमें वर्ष 2022 में दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति को चुनौती दी गई थी।

ग्रेट निकोबार परियोजना के बारे में:

यह परियोजना अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह एकीकृत विकास निगम (ANIIDCO)  द्वारा नीति आयोग के तहत लागू की जा रही है। यह लगभग 30 वर्षों (2025–2047) में चरणबद्ध रूप से पूरी की जाने वाली व्यापक विकास योजना है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग ₹81,000 से ₹92,000 करोड़ के बीच है। इसके प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:

      • अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (आईसीटीटी): यह टर्मिनल गैलेथिया खाड़ी में स्थापित किया जाएगा, जिसकी अनुमानित क्षमता 1.6 करोड़ टीईयू होगी। इसका उद्देश्य विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करना और भारत को एक प्रमुख वैश्विक जहाजरानी केंद्र के रूप में विकसित करना है।
      • ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा: यह एक द्वैध-उपयोग (नागरिक और सैन्य) सुविधा होगी। वर्ष 2050 तक इसमें प्रति घंटे लगभग 4,000 यात्रियों को संभालने की क्षमता विकसित की जाएगी। इससे परिवहन व्यवस्था सुदृढ़ होगी और रक्षा तैयारियों को भी मजबूती मिलेगी।
      • टाउनशिप विकास: परियोजना के अंतर्गत आवासीय, व्यावसायिक और संस्थागत क्षेत्रों का विकास किया जाएगा, ताकि अनुमानित 3 से 4 लाख लोगों के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकें।
      • बिजली और अन्य अवसंरचना: इसमें 450 एमवीए क्षमता का गैस और सौर ऊर्जा आधारित विद्युत संयंत्र स्थापित किया जाएगा। साथ ही नई सड़कों, जल आपूर्ति प्रणाली और आधुनिक संचार नेटवर्क का निर्माण भी किया जाएगा।

NGT Clears ₹80,000-Crore Great Nicobar Project

प्रभाव और रणनीतिक महत्व:

      • यह परियोजना भारत की समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय संपर्क को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसकी भौगोलिक स्थिति मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित सिक्स डिग्री चैनलके पास है, जो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इस स्थान से प्रमुख अंतरराष्ट्रीय शिपिंग मार्गों पर निगरानी रखने में सहायता मिलेगी।
      • यह पहल भारत की एक्ट ईस्ट नीतिके अनुरूप है, जिससे आसियान देशों के साथ आर्थिक और सामरिक संबंध और सुदृढ़ होंगे। इसके अतिरिक्त, यह मानवीय सहायता एवं आपदा राहत अभियानों की क्षमता को भी बढ़ाएगी। आर्थिक दृष्टि से बंदरगाह और हवाई अड्डा व्यापार को प्रोत्साहित करेंगे, निवेश आकर्षित करेंगे और बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न करेंगे।

पर्यावरणीय, जनजातीय और कानूनी चिंताएँ:

      • परियोजना को लेकर कई पर्यावरणीय चिंताएँ सामने आई हैं। अनुमान है कि लगभग 8.5 लाख से 58 लाख तक पेड़ों की कटाई हो सकती है। इससे निकोबार मेगापोड, लेदरबैक कछुए और प्रवाल भित्तियों जैसी दुर्लभ एवं स्थानिक प्रजातियों को खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसके अलावा, यह क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है।
      • स्थानीय जनजातियाँ निकोबारी और शॉम्पेनने अपनी पारंपरिक भूमि और वन अधिकारों पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी समुदाय का विस्थापन प्रस्तावित नहीं है। साथ ही, प्रतिपूरक वनीकरण, वन्यजीव गलियारों का निर्माण, जैव विविधता संरक्षण के लिए विशेष निधि और कम कार्बन ऊर्जा स्रोतों के उपयोग जैसे कई संरक्षणात्मक उपाय प्रस्तावित किए गए हैं। वन स्वीकृतियों से संबंधित मामला वर्तमान में कलकत्ता उच्च न्यायालय में विचाराधीन है, जिससे यह स्पष्ट है कि कानूनी समीक्षा की प्रक्रिया अभी जारी है।

निष्कर्ष:

ग्रेट निकोबार परियोजना भारत के लिए रणनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। चरणबद्ध विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के माध्यम से यह समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और आर्थिक प्रगति को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखती है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निगरानी कितनी प्रभावी ढंग से की जाती है, स्थानीय समुदायों की भागीदारी कितनी सुनिश्चित की जाती है और सभी नियामक मानकों का पालन कितनी पारदर्शिता और प्रतिबद्धता के साथ किया जाता है। यह परियोजना राष्ट्रीय हित और सतत विकास के बीच जटिल संतुलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती है।