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Blog / 03 Apr 2026

अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल की शक्ति

सन्दर्भ:

हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 161 के अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण निर्णय में व्याख्या दी कि शक्तियों का प्रयोग करते समय राज्यपाल,विशेषकर दोषियों को दंड में रियायत (remission) और समयपूर्व रिहाई के मामलों में मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे होते हैं। यह निर्णय विभिन्न व्याख्याओं को समाप्त करता है और भारत की संवैधानिक व्यवस्था में कार्यपालिका की जवाबदेही के सिद्धांत को मजबूत करता है।

मामले की पृष्ठभूमि:

2024 में राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों को लेकर विरोधाभासी निर्णय आए थे। मद्रास उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों,मारू राम बनाम भारत संघ (1980), शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) और ए.जी. पेरारिवलन मामला (2022) का सन्दर्भ लिया, जिन्होंने इस मुद्दे पर संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट किया है।

न्यायालय का मुख्य निर्णय:

      • न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्यपाल अनुच्छेद 161 के तहत स्वतंत्र विवेक का प्रयोग नहीं कर सकते और वे संवैधानिक रूप से राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे हैं। ऐसी सलाह से कोई भी विचलन संसदीय शासन प्रणाली का उल्लंघन होगा।
      • न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट केस (2003) पर निर्भरता गलत थी, क्योंकि वह मामला वैधानिक विवेक से संबंधित था, न कि संवैधानिक क्षमादान शक्तियों से।
      • मध्य प्रदेश स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट (2003) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि मंत्रिपरिषद का निर्णय पक्षपातपूर्ण लगता है, तो राज्यपाल अपने विवेक का उपयोग कर अभियोजन की मंजूरी दे सकते हैं।

अनुच्छेद 161 के बारे में:

      • अनुच्छेद 161 राज्यपाल को क्षमादान (pardon), दंड स्थगन (reprieve), राहत (respite) या दंड में कमी (remission) देने तथा राज्य के कार्यकारी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अपराधों के लिए सजा को निलंबित (suspend), कम (remit) या परिवर्तित (commute) करने की शक्ति देता है।
        • रियायत (Remission) का अर्थ है सजा की अवधि को कम करना, बिना उसकी प्रकृति बदले।
        • राज्यपाल मृत्यु दंड को माफ (pardon) नहीं कर सकते, यह शक्ति अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति के पास होती है लेकिन वे उसे कम (commute) या घटा (remit) सकते हैं।
        • यह शक्ति CrPC की धारा 433A जैसी वैधानिक सीमाओं से ऊपर होती है, जैसा कि मारू राम मामले में कहा गया।
        • हालांकि, शमशेर सिंह मामले के अनुसार, राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कार्य करना होता है।
        • यदि इस शक्ति का प्रयोग मनमाने, दुर्भावनापूर्ण या भेदभावपूर्ण तरीके से किया जाता है, तो यह न्यायिक समीक्षा के अधीन होता है।
        • यह शक्ति कोर्ट-मार्शल मामलों पर लागू नहीं होती।
        • क्षमादान (Pardon) दोषसिद्धि को समाप्त कर देता है, जबकि रियायत (remission) केवल सजा को कम करता है।

निर्णय का महत्व:

यह निर्णय संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करता है, यह स्पष्ट करते हुए कि वास्तविक कार्यकारी शक्ति निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास होती है। यह उच्च न्यायालयों की विरोधाभासी व्याख्याओं को समाप्त कर संवैधानिक अस्पष्टता को दूर करता है और कानून में एकरूपता सुनिश्चित करता है। राज्यपाल के विवेक को सीमित करके, यह क्षमादान शक्तियों के दुरुपयोग या राजनीतिकरण को रोकता है। साथ ही, यह राज्यों के अधिकारों को बनाए रखते हुए संघीय संतुलन को भी सुदृढ़ करता है।

निष्कर्ष:

मद्रास उच्च न्यायालय का यह निर्णय संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक शासन की एक महत्वपूर्ण पुष्टि है। राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करने की आवश्यकता पर जोर देकर, यह संविधान की भावना को सुरक्षित रखता है और यह सुनिश्चित करता है कि क्षमादान शक्तियों का प्रयोग निष्पक्ष, जवाबदेह और गैर-मनमाने तरीके से हो, जिससे भारत की संसदीय प्रणाली और मजबूत होती है।