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Blog / 22 Apr 2026

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने असम में भैंस लड़ाई (मो-जुज) पर लगाई रोक

संदर्भ:

हाल ही में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने असम सरकार को निर्देश दिया है कि राज्य में किसी भी प्रकार की भैंस लड़ाई (मो-जुज) का आयोजन न किया जाए और आयोजकों के खिलाफ आगे के आदेश तक दंडात्मक कार्रवाई की जाए। यह अंतरिम आदेश 21 अप्रैल 2026 को दिया गया, जो पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स इंडिया (PETA India) द्वारा दायर याचिका पर आधारित था।

न्यायालय के मुख्य निर्देश:

      • भैंस लड़ाई प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960” का उल्लंघन करती है।
      • इसे सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
      • ऐसे आयोजनों की अनुमति देना सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लंघन होगा।
      • नियमों का उल्लंघन करने वालों पर अनिवार्य रूप से सख्त कार्रवाई होगी।

Buffalo fights return on Magh Bihu after 9 years | Assam News | Guwahati  News - Times of India

कानूनी और संवैधानिक ढांचा:

      • सुप्रीम कोर्ट का पूर्व निर्णय:
        • एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया बनाम ए. नागराजा (2014)
          • पशु-युद्ध (animal fights) को असंवैधानिक और क्रूर माना गया।
          • जानवरों को अनावश्यक पीड़ा से सुरक्षा का अधिकार दिया गया।  
      • संवैधानिक प्रावधान:
        • अनुच्छेद 51A(g): नागरिकों का कर्तव्य है कि वे जीव-जंतुओं की रक्षा करें और उनके प्रति करुणा रखें।
        • यह पर्यावरण और नैतिक शासन के सिद्धांतों को मजबूत करता है।

मो-जुज परंपरा:

      • मो-जुज असम के माघ बिहू (भोगाली बिहू) के दौरान होने वाली पारंपरिक भैंस लड़ाई है।
      • इसका आयोजन ऐतिहासिक रूप से मोरीगांव जिले के आहातगुरी क्षेत्र में होता रहा है।
      • इसे कुछ लोग फसल उत्सव से जुड़ी ग्रामीण सांस्कृतिक परंपरा मानते हैं।

पुनर्जीवन का प्रयास (2023–2024):

      • दिसंबर 2023 में असम सरकार ने SOP (मानक संचालन प्रक्रिया) जारी कर भैंस और बुलबुल पक्षी लड़ाई को अनुमति दी थी।
      • इसे असम की सांस्कृतिक विरासतबताया गया।

न्यायिक निर्णय:

      • सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और पशु कल्याण कानूनों का उल्लंघन कहते हुए दिसंबर 2024 में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने इस SOP को रद्द कर दिया।
      • तमिलनाडु के जल्लीकट्टू के विपरीत, असम में ऐसा कोई कानूनी संशोधन नहीं था जो केंद्रीय कानून को चुनौती दे सके, इसलिए SOP अमान्य माना गया।

निर्णय का महत्व:

      • पशु कल्याण कानूनों की सख्त व्याख्या को मजबूत करता है।
      • स्पष्ट करता है कि SOP या कार्यपालिका आदेश कानून या सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को नहीं बदल सकते।
      • पारंपरिक प्रथाओं की संवैधानिक मूल्यों के आधार पर समीक्षा का मार्ग प्रशस्त करता है।
      • पशु अधिकारों के प्रति न्यायिक दृष्टिकोण को और मजबूत करता है।

चुनौतियाँ:

      • ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक आयोजनों की गहरी स्वीकार्यता
      • त्यौहारों के दौरान नियमों का पालन करवाना
      • सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी राजनीतिक संवेदनशीलता
      • वैकल्पिक सांस्कृतिक गतिविधियों की आवश्यकता

निष्कर्ष:

गुवाहाटी हाई कोर्ट का यह अंतरिम आदेश भारत के पशु कल्याण न्यायशास्त्र को मजबूत करता है। यह स्पष्ट करता है कि परंपरा के नाम पर क्रूरता को अनुमति नहीं दी जा सकती। यह निर्णय जीव-जंतुओं के प्रति करुणा के संवैधानिक दृष्टिकोण को सुदृढ़ करता है और संस्कृति व आधुनिक कानूनी-नैतिक मानकों के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।