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Blog / 25 Apr 2026

चरम मौसम घटनाओं पर अध्ययन

चरम मौसम घटनाओं पर अध्ययन

संदर्भ:

नेचर इकोलॉजी एंड एवोल्यूशन्स में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चरम मौसम घटनाएँ आने वाले दशकों में वैश्विक जैव विविधता पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं। शोध में बताया गया है कि यदि वैश्विक उत्सर्जन उच्च स्तर पर जारी रहा, तो 2085 तक लगभग 36% स्थलीय पशु आवास कई प्रकार की चरम जलवायु घटनाओं के संपर्क में आ सकते हैं।

चरम मौसम घटनाओं के बारे में:

      • अत्यधिक जलवायु घटनाएँ दुर्लभ और उच्च तीव्रता वाली मौसमीय घटनाएँ होती हैं, जो सामान्य ऐतिहासिक पैटर्न से कहीं अधिक होती हैं। इनमें हीटवेव और कोल्ड वेव, बाढ़ और भारी वर्षा, सूखा, जंगल की आग, तथा चक्रवात और तूफान शामिल हैं।
      • ये घटनाएँ मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के कारण, विशेषकर वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा के कारण, अधिक बार और अधिक गंभीर होती जा रही हैं।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:

पोट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के इस अध्ययन में लगभग 34,000 कशेरुकी प्रजातियों और 794 पारिस्थितिक तंत्रों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के अनुसार, आवासों पर चरम मौसम घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। 2050 तक लगभग 74% क्षेत्रों में हीटवेव, 16% में जंगल की आग, 8% में सूखा और 3% में बाढ़ का प्रभाव देखा जा सकता है। 2085 तक लगभग एक-तिहाई स्थलीय आवास एक साथ कई चरम घटनाओं का सामना कर सकते हैं। अमेज़न, उष्णकटिबंधीय अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे जैव विविधता हॉटस्पॉट सबसे अधिक प्रभावित होने की संभावना है, जहाँ बढ़ती गर्मी, सूखा और आग पारिस्थितिक तंत्रों को खतरे में डाल रहे हैं।

यह अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?

      • यह अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन केवल धीरे-धीरे बढ़ने वाला तापमान नहीं है, बल्कि यह चरम मौसम घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता को भी बढ़ा रहा है, जिससे बड़े पैमाने पर प्रजातियों की मृत्यु और पारिस्थितिक तंत्र का विनाश हो सकता है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में 2019–20 की हीटवेव में 72,000 से अधिक फ्लाइंग फॉक्स मारे गए, जबकि पैंटानल क्षेत्र की आग में लगभग 1.7 करोड़ कशेरुकी जीव प्रभावित हुए।
      • अध्ययन यह भी बताता है कि यदि समय रहते उत्सर्जन को तेजी से घटाकर नेट ज़ीरोकी दिशा में बढ़ा जाए, तो इन खतरों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह वैश्विक स्तर पर त्वरित जलवायु कार्रवाई की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

भारत और विश्व के लिए प्रभाव:

      • जैव विविधता हानि: भारत एक मेगा-विविधता वाला देश है, इसलिए पश्चिमी घाट, हिमालय और तटीय क्षेत्रों जैसे पारिस्थितिक तंत्रों पर खतरा बढ़ सकता है।
      • आपदा जोखिम में वृद्धि: हीटवेव, बाढ़ और जंगल की आग की बढ़ती घटनाएँ आपदा प्रबंधन को और चुनौतीपूर्ण बनाएंगी।
      • जलवायु-सहिष्णु योजना की आवश्यकता: संरक्षण रणनीतियों में केवल धीरे-धीरे होने वाले जलवायु परिवर्तन ही नहीं, बल्कि चरम मौसम घटनाओं के लिए तैयारी भी शामिल करनी होगी।

आगे की राह:

      • वैश्विक स्तर पर नेट-ज़ीरो उत्सर्जन की दिशा में तेजी लाना
      • पारिस्थितिकी-आधारित अनुकूलन (ecosystem-based adaptation) को मजबूत करना
      • चरम मौसम घटनाओं के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (early warning systems) में सुधार
      • जैव विविधता संरक्षण योजनाओं में जलवायु जोखिम को शामिल करना
      • जलवायु शमन (mitigation) के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना

निष्कर्ष:

अध्ययन स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन केवल औसत तापमान ही नहीं बढ़ा रहा, बल्कि चरम मौसम घटनाओं को भी तीव्र बना रहा है, जो वैश्विक जैव विविधता के लिए बड़ा खतरा हैं। यदि उत्सर्जन में तत्काल कमी नहीं की गई, तो सदी के अंत तक एक-तिहाई से अधिक स्थलीय पशु आवास गंभीर और एक साथ कई जलवायु संकट का सामना कर सकते हैं।