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Blog / 15 Jan 2026

“10-मिनट डिलीवरी” मॉडल हटाने का निर्णय

संदर्भ-

हाल ही में केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया के हस्तक्षेप के बाद, डिलीवरी प्लेटफॉर्म ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, ज़ोमैटो और स्विगी ने अपने ऐप्स से “10-मिनट डिलीवरीप्रणाली हटाने का निर्णय लिया है।

परिवर्तन के कारण-

यह बदलाव नए साल की पूर्व संध्या 2025 को हुए राष्ट्रव्यापी गिग-वर्कर हड़ताल के बाद सामने आया, जिसमें डिलीवरी पार्टनर्स ने असुरक्षित कार्य-परिस्थितियों, सड़क दुर्घटनाओं के बढ़ते जोखिम और अत्यधिक तेज़ डिलीवरी लक्ष्यों से उत्पन्न मानसिक दबाव के विरुद्ध विरोध किया।
इसके पश्चात, केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, ज़ोमैटो और स्विगी सहित प्रमुख क्विक-कॉमर्स और फूड-डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स को ऐसे समय-बद्ध डिलीवरी ब्रांडिंग को बंद करने का निर्देश दिया, जो असुरक्षित कार्य-प्रथाओं को प्रोत्साहित कर सकती थी।

10-मिनट डिलीवरी मॉडल-

10-मिनट डिलीवरी मॉडल एक क्विक-कॉमर्स (q-commerce) रणनीति है, जो पास के डार्क स्टोर्स के सघन नेटवर्क, एआई-आधारित मांग पूर्वानुमान और एल्गोरिदम-अनुकूलित लॉजिस्टिक्स पर निर्भर करती है। इसका उद्देश्य अत्यधिक सुविधा प्रदान करना हैजिसमें किराना, आवश्यक वस्तुएँ और कुछ रिटेल उत्पादों को ऑर्डर के दस मिनट के भीतर, मुख्यतः उच्च घनत्व वाले शहरी क्षेत्रों में, पहुँचाया जाता है।

भारत में गिग अर्थव्यवस्था-

भारत की गिग अर्थव्यवस्था जिसमें ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, ज़ोमैटो, स्विगी, ओला और उबर जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं, डिजिटल पहुँच, शहरीकरण और युवा कार्यबल की उपलब्धता के कारण तेज़ी से विस्तारित हुई है। इस क्षेत्र ने विशेषकर शहरी युवाओं के लिए लचीले रोज़गार और आर्थिक समावेशन के अवसर उपलब्ध कराए हैं।
हालाँकि, कई संरचनात्मक चुनौतियाँ बनी हुई हैं:
अनिश्चित आय: प्रोत्साहनों पर अत्यधिक निर्भरता और कम आधार वेतन।
एल्गोरिदमिक नियंत्रण: कार्य आवंटन, प्रदर्शन मूल्यांकन और पारिश्रमिक का निर्धारण अपारदर्शी प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम द्वारा।
उच्च-दबाव डिलीवरी मॉडल: अत्यंत तेज़ डिलीवरी लक्ष्य दुर्घटना जोखिम बढ़ाते हैं और श्रमिक सुरक्षा से समझौता करते हैं।
सामाजिक सुरक्षा का अभाव: स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना कवरेज और पेंशन लाभों तक सीमित पहुँच।
क्रिसमस 2025 सहित उच्च मांग अवधि के दौरान हुई हड़तालों ने इन प्रणालीगत समस्याओं को चर्चा का विषय बना दिया, जब हज़ार गिग-वर्कर्स ने असुरक्षित परिस्थितियों और अस्थिर आजीविका के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया।

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत कानूनी मान्यता-

सामाजिक सुरक्षा संहिता (SS), 2020 एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, क्योंकि इसने भारत के श्रम ढाँचे में पहली बार गिग-वर्कर्स और प्लेटफॉर्म-वर्कर्स को औपचारिक रूप से मान्यता दी। इससे पहले, ये श्रमिक भुगतान-वेतन अधिनियम, 1936 और कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 जैसे पारंपरिक श्रम कानूनों के दायरे से बाहर थे।
संहिता के तहत प्रमुख परिभाषाएँ इस प्रकार हैं:
एग्रीगेटर: खरीदारों को सेवा-प्रदाताओं से जोड़ने वाला डिजिटल मध्यस्थ।
गिग-वर्कर: पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध से बाहर पारिश्रमिक के बदले कार्य करने वाला व्यक्ति।
प्लेटफॉर्म-वर्कर: ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से सेवाएँ प्रदान करने वाला व्यक्ति।
प्लेटफॉर्म-वर्क: भुगतान के बदले डिजिटल रूप से सुगम कार्य-व्यवस्थाएँ।

सामाजिक सुरक्षा, कल्याण और पोर्टेबिलिटी-

संहिता सामाजिक सुरक्षा कोष की स्थापना का प्रावधान करती है, जिसे अमेजोन, फ्लिकार्ट, स्विगी और ज़मोटो जैसे एग्रीगेटर्स के योगदान से वित्तपोषित किया जाएगा। यह कोष गिग और प्लेटफॉर्म-वर्कर्स के लिए स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना कवरेज, मातृत्व लाभ और वृद्धावस्था पेंशन का समर्थन करेगा।
यह ई-श्रम पोर्टल के माध्यम से लाभों की पोर्टेबिलिटी भी सुनिश्चित करती है, जिससे श्रमिक प्लेटफॉर्म या पेशा बदलने पर भी अपने अधिकार बनाए रख सकें। एक केंद्रीकृत डेटाबेस लक्षित कल्याण वितरण, कौशल विकास पहल और शिकायत निवारण तंत्र, जैसे टोल-फ्री हेल्पलाइन और सुविधा केंद्र को सक्षम बनाता है।

आगे की राह-

सामाजिक सुरक्षा संहिता गिग कार्यबल को अनौपचारिक और असुरक्षित स्थिति से निकालकर कानूनी मान्यता और संरक्षण की ओर ले जाने वाला एक दृष्टांत-परिवर्तन है। फिर भी, इसके प्रभावी परिणाम सुदृढ़ प्रवर्तन, असुरक्षित डिलीवरी मॉडलों के नियमन, तथा प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर निर्भर करेंगे। निष्पक्ष वेतन, व्यावसायिक सुरक्षा और व्यापक सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना एक सुदृढ़, समावेशी और औपचारिक गिग अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए आवश्यक है।

निष्कर्ष-

ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, ज़ोमैटो और स्विगी द्वारा “10-मिनट डिलीवरीमॉडल को हटाने का निर्णय उपभोक्ता सुविधा और श्रमिक सुरक्षा व गरिमा के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यह भारत के क्विक-कॉमर्स क्षेत्र में उत्तरदायी श्रम-प्रथाओं और मज़बूत नियामक निगरानी की दिशा में व्यापक बदलाव का संकेत देता है जो भविष्य-उन्मुख डिजिटल अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाने के लिए एक आवश्यक कदम है।