संदर्भ:
हाल ही में भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) ने सर्वोच्च न्यायालय को अवगत कराया कि मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) करना उसका केवल संवैधानिक अधिकार ही नहीं, बल्कि एक अनिवार्य संवैधानिक कर्तव्य भी है। आयोग ने स्पष्ट किया कि यह सुनिश्चित करना उसकी ज़िम्मेदारी है कि मतदाता सूची में किसी भी विदेशी नागरिक का नाम शामिल न हो। यह पक्ष चुनाव आयोग ने चल रहे पुनरीक्षण अभियान के खिलाफ दायर कानूनी चुनौतियों के जवाब में रखा।
पृष्ठभूमि:
चुनाव आयोग वर्तमान में बिहार से प्रारंभ करते हुए देश के कई राज्यों में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कर रहा है। इसका उद्देश्य मतदाता सूचियों को अद्यतन करना, त्रुटियों को दूर करना तथा अपात्र प्रविष्टियों को हटाना है। हालांकि, इस पुनरीक्षण की संवैधानिक वैधता और इसके अधिकार-क्षेत्र को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में अनेक याचिकाएँ दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में मुख्य प्रश्न यह उठाया गया है कि क्या चुनाव आयोग को मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं की नागरिकता की जाँच करने का अधिकार प्राप्त है।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनाव आयोग का पक्ष:
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- चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को अवगत कराया कि मतदाता सूचियों के निर्माण और उनके पुनरीक्षण के लिए उसे स्पष्ट संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। इस अधिकार के अंतर्गत यह सुनिश्चित करना भी शामिल है कि केवल भारतीय नागरिक ही मतदाता के रूप में पंजीकृत हों।
- आयोग ने यह तर्क दिया कि भारतीय संविधान मूल रूप से “नागरिक-केंद्रित” है, क्योंकि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और न्यायाधीश जैसे प्रमुख संवैधानिक पदों पर केवल भारतीय नागरिक ही नियुक्त हो सकते हैं। इसी कारण मतदाता सूचियों में भी केवल पात्र नागरिकों के नाम दर्ज होना आवश्यक है।
- चुनाव आयोग के अनुसार, उसकी यह शक्ति संविधान के अनुच्छेद 324 और 326 से प्राप्त होती है, जिन्हें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 के साथ पढ़ा जाना चाहिए। यह धारा मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया के दौरान नागरिकता की जाँच का प्रावधान करती है।
- आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की तुलना राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) से किए जाने को अनुचित बताते हुए स्पष्ट किया कि एसआईआर का उद्देश्य केवल मतदाता सूचियों की शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है, न कि नागरिकता का कोई स्वतंत्र रजिस्टर तैयार करना।
- चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को अवगत कराया कि मतदाता सूचियों के निर्माण और उनके पुनरीक्षण के लिए उसे स्पष्ट संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। इस अधिकार के अंतर्गत यह सुनिश्चित करना भी शामिल है कि केवल भारतीय नागरिक ही मतदाता के रूप में पंजीकृत हों।
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कानूनी और संवैधानिक पहलू:
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- संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को चुनावों के संचालन, पर्यवेक्षण और नियंत्रण की व्यापक शक्ति प्रदान करता है, जिसके अंतर्गत मतदाता सूचियों की तैयारी और उनका पुनरीक्षण भी सम्मिलित है। वहीं, अनुच्छेद 326 नागरिकों के लिए वयस्क मताधिकार का प्रावधान करता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मतदाता बनने की पात्रता का मूल आधार नागरिकता है।
- चुनाव आयोग ने इस तर्क का भी प्रत्युत्तर दिया कि नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार को ही प्राप्त है। आयोग ने स्पष्ट किया कि उसकी भूमिका केवल चुनावी प्रयोजनों के लिए सीमित जाँच तक है तथा वह नागरिकता से संबंधित किसी भी विवाद का अंतिम या न्यायिक निर्णय नहीं करता।
- संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को चुनावों के संचालन, पर्यवेक्षण और नियंत्रण की व्यापक शक्ति प्रदान करता है, जिसके अंतर्गत मतदाता सूचियों की तैयारी और उनका पुनरीक्षण भी सम्मिलित है। वहीं, अनुच्छेद 326 नागरिकों के लिए वयस्क मताधिकार का प्रावधान करता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मतदाता बनने की पात्रता का मूल आधार नागरिकता है।
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निष्कर्ष:
चुनाव आयोग द्वारा प्रस्तुत यह पक्ष भारत की निर्वाचन प्रक्रिया की शुचिता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को मज़बूत करता है। यह मूल संवैधानिक सिद्धांत को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि लोकतांत्रिक निर्णय-प्रक्रिया में सहभागिता का अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को ही प्राप्त है। साथ ही, नागरिकता की जाँच को लेकर चल रही संवैधानिक बहसों के संदर्भ में यह चुनाव आयोग की भूमिका, अधिकार-क्षेत्र और कर्तव्यों को स्पष्ट करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
