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Blog / 18 Aug 2026

महाराष्ट्र में भूकंपों का झुंड (Earthquake Swarm)

संदर्भ:

हाल के समय में महाराष्ट्र में पिछले दो सप्ताह के दौरान छोटे भूकंपों की एक श्रृंखला देखी गई है। लगभग 29 झटके दर्ज किए गए। अधिकांश भूकंप उथले थे और लगभग 5–8 किमी की गहराई पर आए। बिना किसी स्पष्ट मुख्य भूकंप (Mainshock) के इस प्रकार भूकंपों का एक समूह या श्रृंखला भूकंपों का झुंड (Earthquake Swarm) कहलाता है।

भूकंप क्या है?

      • भूकंप पृथ्वी की पर्पटी में मौजूद भ्रंश (Fault) या कमजोर क्षेत्र के साथ चट्टानों के अचानक खिसकने के कारण संचित ऊर्जा के अचानक मुक्त होने की घटना है। इससे भूकंपीय तरंगें उत्पन्न होती हैं।
        • P-तरंगें संपीड़नात्मक तरंगें होती हैं।
        • S-तरंगें पार्श्व दिशा में कतरनी (Shearing) उत्पन्न करती हैं।
      • सतही तरंगें पृथ्वी की सतह के साथ यात्रा करती हैं और लोगों द्वारा महसूस किए जाने वाले अधिकांश कंपन के लिए जिम्मेदार होती हैं।
      • सामान्य भूकंप श्रृंखला के विपरीत, भूकंपों के झुंड में किसी स्पष्ट मुख्य भूकंप (Mainshock) की पहचान नहीं होती, जिसके बाद आफ्टरशॉक्स आते हों।

महाराष्ट्र में भूकंपों के झुंड क्यों आते हैं?

      • प्लेट के भीतर आने वाले भूकंप (Intraplate Earthquakes):
          • महाराष्ट्र प्रमुख टेक्टोनिक प्लेट सीमाओं से दूर स्थित है। इसलिए यहां आने वाले भूकंप मुख्य रूप से प्लेट के भीतर आने वाले भूकंप (Intraplate Earthquakes) होते हैं, जो भारतीय प्लेट के अंदर उत्पन्न होते हैं।
          • यद्यपि भारतीय प्लेट अपेक्षाकृत स्थिर मानी जाती है, फिर भी यह लगातार गति करती और विकृत होती रहती है। इसके कारण प्लेट के आंतरिक हिस्सों में टेक्टोनिक तनाव जमा हो सकता है।
      • दक्कन ट्रैप और भूगर्भीय कमजोरियां:
          • महाराष्ट्र का एक बड़ा हिस्सा दक्कन के पठार पर स्थित है, जिसकी आधारभूत चट्टान मुख्य रूप से दक्कन ट्रैप (Deccan Traps) से बनी है। इन बेसाल्ट चट्टानों का निर्माण लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पहले हुए बड़े पैमाने के ज्वालामुखीय विस्फोटों से हुआ था।
          • लावा की इन मोटी परतों में दरारें, जोड़ (Joints) और कतरनी क्षेत्र (Shear Zones) मौजूद हैं। ये पहले से मौजूद कमजोरियां संचित टेक्टोनिक तनाव को स्थानांतरित कर सकती हैं और भूकंपीय गतिविधि के केंद्र बन सकती हैं।
      • जल और वर्षा की भूमिका:
        • वर्षा का पानी मिट्टी, दरारों और पारगम्य चट्टानों के माध्यम से जमीन के अंदर प्रवेश कर सकता है। जब यह गहरी दरारों के माध्यम से भ्रंशों से जुड़े क्षेत्रों तक पहुंचता है, तो यह छिद्र जल दाब (Pore-Water Pressure) को बढ़ा सकता है और भ्रंश सतहों के बीच घर्षण को कम कर सकता है।
        • 2018 के पालघर भूकंपों के झुंड पर किए गए अध्ययनों में भूकंपीय गतिविधि में वृद्धि तथा वर्षा और भूमिगत दरारों में पानी के प्रवेश के बीच संबंध के प्रमाण मिले थे। हालांकि, वैज्ञानिक टेक्टोनिक तनाव, सामान्य भ्रंशन (Normal Faulting) और एसेस्मिक विकृति (Aseismic Deformation) को भी संभावित कारक मानते हैं।
      • कोयना और जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता:
        • महाराष्ट्र जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता (Reservoir-Induced Seismicity) का एक प्रसिद्ध उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। कोयना जलाशय के भरने के बाद इस क्षेत्र में भूकंपीय गतिविधि बढ़ गई। इसका चरम 1967 के 6.3 तीव्रता वाले कोयना भूकंप के रूप में सामने आया, जिसने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया और 200 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई।

भूकंपों का झुंड बड़े भूकंप की भविष्यवाणी करता है?

भूकंपों का झुंड अपने आप में इस बात का संकेत नहीं है कि कोई बड़ा भूकंप आने वाला है। अलग-अलग भूकंप झुंडों के कारण अलग हो सकते हैं और उनकी अवधि भी अलग-अलग हो सकती है।

आगे की राह:

      • भारत को भूकंपीय गतिविधियों के पैटर्न का पता लगाने के लिए भूकंपीय निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की आवश्यकता है।
      • भूकंपीय सूक्ष्म-क्षेत्रीकरण (Seismic Microzonation) के माध्यम से उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए और उसके आधार पर शहरी नियोजन किया जाना चाहिए।
      • विशेष रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में भूकंपरोधी भवन निर्माण मानकों को सख्ती से लागू करना आवश्यक है। जलाशयों के संचालन की भी प्रेरित भूकंपीयता के संदर्भ में लगातार निगरानी की जानी चाहिए।
      • इसके साथ ही जन-जागरूकता, निकासी अभ्यास (Evacuation Drills) और आपदा तैयारी को मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि जान-माल के नुकसान को न्यूनतम किया जा सके।

निष्कर्ष:

महाराष्ट्र में भूकंपों के झुंड यह दर्शाते हैं कि प्रमुख टेक्टोनिक प्लेट सीमाओं से दूर स्थित क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण भूकंपीय गतिविधियां हो सकती हैं। टेक्टोनिक तनाव, भूगर्भीय दरारें, वर्षा के कारण बढ़ने वाला छिद्र जल दाब और स्थानीय स्तर पर जलाशय के प्रभाव जैसे कारक भूकंपीय गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए भूकंप के जोखिम को कम करने के लिए निरंतर वैज्ञानिक निगरानी, वैज्ञानिक आधार पर शहरी नियोजन और भूकंप-रोधी अवसंरचना का विकास अत्यंत आवश्यक है।

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