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Blog / 08 May 2026

आवश्यक धार्मिक प्रथाओं का सिद्धांत

संदर्भ:

हाल ही में सबरीमाला पुनर्विचार मामले की सुनवाई के संदर्भ में आवश्यक धार्मिक प्रथाओं” (Essential Religious Practices- ERP) का सिद्धांत चर्चा में है। विभिन्न धार्मिक प्रथाओं से जुड़े मामलों जैसे- हिजाब विवाद, सबरीमला मंदिर प्रवेश, मुस्लिम महिलाओं के अधिकार तथा धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन पर न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या अदालतों को यह तय करना चाहिए कि किसी धर्म की कौन-सी प्रथा आवश्यकहै और कौन-सी नहीं।

आवश्यक धार्मिक प्रथाओं (ERP) सिद्धांत क्या है?

      • आवश्यक धार्मिक प्रथाओं का सिद्धांत भारतीय न्यायपालिका द्वारा विकसित एक संवैधानिक सिद्धांत है, जिसके माध्यम से यह निर्धारित किया जाता है कि किसी धर्म की कौन-सी प्रथाएँ संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण प्राप्त करेंगी।
        अनुच्छेद 25 नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार देता है।
      • इस सिद्धांत की उत्पत्ति 1954 के प्रसिद्ध शिरूर मठ मामले में हुई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि केवल वही प्रथाएँ संवैधानिक संरक्षण प्राप्त करेंगी जो किसी धर्म का अभिन्न और आवश्यकहिस्सा हों।

न्यायिक हस्तक्षेप की बढ़ती भूमिका:

      • समय के साथ ERP सिद्धांत भारतीय न्यायपालिका के लिए धार्मिक विवादों के समाधान का प्रमुख आधार बन गया। कई महत्वपूर्ण मामलों में अदालतों ने यह जांचने का प्रयास किया कि संबंधित प्रथा वास्तव में धर्म का आवश्यक हिस्सा है या नहीं। प्रमुख उदाहरण:
        • सबरीमला मामला (2018): सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को लैंगिक समानता के विरुद्ध माना।
        • तीन तलाक मामला: अदालत ने इसे इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना और असंवैधानिक घोषित किया।
        • हिजाब विवाद: कर्नाटक हिजाब विवाद में भी यह प्रश्न उठा कि हिजाब इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा है या नहीं।
        • दाऊदी बोहरा समुदाय एवं पशु बलि संबंधी मामले: न्यायालयों ने धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया।
      • इन मामलों ने यह स्पष्ट किया कि न्यायपालिका अब केवल संवैधानिक व्याख्याकार नहीं, बल्कि कई बार धार्मिक प्रथाओं की वैधता का निर्धारण करने वाली संस्था भी बन गई है।

प्रमुख आलोचनाएँ:

      • न्यायपालिका का धर्मशास्त्रीयहस्तक्षेप: आलोचकों का मानना है कि अदालतों के पास धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं की व्याख्या करने की विशेषज्ञता नहीं होती। जब न्यायालय यह तय करते हैं कि कौन-सी प्रथा आवश्यक है, तो वे अप्रत्यक्ष रूप से धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने लगते हैं।
      • व्यक्तिपरक व्याख्या: आवश्यक प्रथाका कोई स्पष्ट मानक नहीं है। अलग-अलग मामलों में विभिन्न पीठों ने अलग दृष्टिकोण अपनाए हैं, जिससे न्यायिक असंगति की स्थिति उत्पन्न हुई है।
      • धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सामाजिक सुधार: ERP सिद्धांत का उपयोग कई बार सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है। हालांकि, इससे यह बहस भी तेज हुई है कि क्या राज्य और न्यायपालिका धार्मिक परंपराओं को बदलने का अधिकार रखते हैं।

संवैधानिक और सामाजिक महत्व:

      • भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता को केवल राज्य और धर्म के पृथक्करणके रूप में नहीं, बल्कि समान सम्मानके रूप में देखता है इसलिए न्यायपालिका का दायित्व है कि वह धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करे, साथ ही मौलिक अधिकारों विशेषकर समानता, गरिमा और लैंगिक न्याय को भी सुनिश्चित करे।
      • अब ERP सिद्धांत भारतीय लोकतंत्र में तीन महत्वपूर्ण मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने का माध्यम बन गया है-
        • धार्मिक स्वतंत्रता,
        • सामाजिक न्याय,
        • संवैधानिक नैतिकता।

निष्कर्ष:

अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं का सिद्धांत धर्म और राज्य के बीच संतुलन बनाने का एक उपकरण है। हालांकि इसकी आलोचना होती है, लेकिन भारतीय जैसे विविधतापूर्ण समाज में सामाजिक सुधार और रूढ़िवादिता को खत्म करने के लिए यह आवश्यक है। आवश्यक धार्मिक प्रथाओं का सिद्धांत भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का एक जटिल लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। वर्तमान समय में जब धार्मिक पहचान और संवैधानिक मूल्यों के बीच टकराव बढ़ रहा है, तब न्यायपालिका की भूमिका और अधिक संवेदनशील हो जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि अदालतें धार्मिक मामलों में संतुलित, सीमित और संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाएँ, ताकि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय दोनों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।

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