संदर्भ:
हाल ही में मिस्र के थेबन नेक्रोपोलिस में नदी नील के प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थल वैली ऑफ द किंग्स में लगभग 30 तमिल-ब्राह्मी अभिलेखों की पहचान की गई है। ये अभिलेख पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी (रोमन काल) के माने जा रहे हैं। यह खोज प्राचीन दक्षिण भारत और मिस्र के बीच व्यापारिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को प्रमाणित करने वाली एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
तमिल-ब्राह्मी लिपि:
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- ब्राह्मी लिपि भारत की सबसे प्राचीन लिपि है, जो सिंधु लिपि के बाद विकसित हुई। यह सभी आधुनिक भारतीय लिपियों और दक्षिण-पूर्व एवं पूर्वी एशिया की कई लिपियों की आधारशिला है।
- अधिकतर ब्राह्मी शिलालेख प्राकृत भाषा में हैं। ज्ञात सबसे पुराने शिलालेख मौर्य सम्राट अशोक के आदेशों से हैं (268–232 ईसा पूर्व)। इसे 1838 में जेम्स प्रिंसेप द्वारा सफलतापूर्वक पढ़ा गया था।
- ब्राह्मी के अवशेष गंगीय मैदान, तमिलनाडु, केरल और श्रीलंका में पाए गए हैं, मुख्यतः मिट्टी के बर्तन पर।
- इसकी उत्तराधिकारी लिपियों में देवनागरी, बंगाली, गुजराती, तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ शामिल हैं।
- ब्राह्मी लिपि भारत की सबसे प्राचीन लिपि है, जो सिंधु लिपि के बाद विकसित हुई। यह सभी आधुनिक भारतीय लिपियों और दक्षिण-पूर्व एवं पूर्वी एशिया की कई लिपियों की आधारशिला है।
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खोज के प्रमुख बिंदु:
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- मिस्र के शाही समाधि-स्थलों में तमिल-ब्राह्मी के लगभग 30 अभिलेख मिले हैं।
- कुछ अभिलेख संस्कृत और प्राकृत भाषाओं में भी पाए गए हैं।
- अभिलेखों में सीकै कोट्टन, कोपान, सातन जैसे तमिल नाम दर्ज हैं।
- कुछ लेखों में “आया और देखा” जैसे वाक्यांश मिलते हैं, जो संकेत देते हैं कि ये आगंतुकों द्वारा अंकित किए गए थे।
- कुछ नामों की पुनरावृत्ति यह दर्शाती है कि भारतीयों की उपस्थिति आकस्मिक नहीं, बल्कि संगठित या नियमित रही होगी।
- मिस्र के शाही समाधि-स्थलों में तमिल-ब्राह्मी के लगभग 30 अभिलेख मिले हैं।
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ऐतिहासिक एवं वैश्विक महत्त्व:
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- तटीय व्यापार से आगे का विस्तार: अब तक तमिल-ब्राह्मी अभिलेख मुख्यतः लाल सागर के तटीय बंदरगाहों, जैसे बेरेनिके में पाए गए थे। किंतु नील नदी के आंतरिक भाग में इनकी उपस्थिति यह दर्शाती है कि भारतीय व्यापारी केवल समुद्री तटों तक सीमित नहीं थे, बल्कि मिस्र के भीतरी क्षेत्रों तक भी पहुँचे थे।
- इंडो-रोमन व्यापार नेटवर्क: पहली-दूसरी शताब्दी ईस्वी में दक्षिण भारत और रोमन साम्राज्य के बीच व्यापक समुद्री व्यापार विकसित था। भारत से काली मिर्च, मसाले, मोती, हाथीदांत और उत्तम वस्त्र निर्यात होते थे, जबकि रोमन साम्राज्य से सोने के सिक्के, मदिरा और विलासिता की वस्तुएँ आयात की जाती थीं।
- सांस्कृतिक संपर्क का प्रमाण: अभिलेख केवल व्यापारिक गतिविधियों का संकेत नहीं देते, बल्कि यह दर्शाते हैं कि भारतीय व्यापारी स्थानीय संस्कृति से परिचित थे। शाही समाधियों में अपने नाम अंकित करना यह दर्शाता है कि वे स्थानीय सामाजिक परिवेश से जुड़ाव महसूस करते थे।
- प्रारंभिक वैश्वीकरण का संकेत: यह खोज इस तथ्य को सुदृढ़ करती है कि प्राचीन विश्व में भारतीय महासागर व्यापार नेटवर्क वैश्विक संपर्क का प्रमुख माध्यम था। दक्षिण भारत इस नेटवर्क का एक सशक्त और प्रभावशाली केंद्र था।
- तटीय व्यापार से आगे का विस्तार: अब तक तमिल-ब्राह्मी अभिलेख मुख्यतः लाल सागर के तटीय बंदरगाहों, जैसे बेरेनिके में पाए गए थे। किंतु नील नदी के आंतरिक भाग में इनकी उपस्थिति यह दर्शाती है कि भारतीय व्यापारी केवल समुद्री तटों तक सीमित नहीं थे, बल्कि मिस्र के भीतरी क्षेत्रों तक भी पहुँचे थे।
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निष्कर्ष:
मिस्र के वैली ऑफ द किंग्स में तमिल-ब्राह्मी अभिलेखों की खोज प्राचीन भारत और भूमध्यसागरीय विश्व के मध्य गहरे और बहुआयामी संबंधों का सशक्त प्रमाण है। यह न केवल इंडो-रोमन व्यापार की व्यापकता को दर्शाती है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि दक्षिण भारत प्राचीन वैश्विक व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण केंद्र था। यह खोज प्रारंभिक वैश्वीकरण, समुद्री शक्ति और सांस्कृतिक कूटनीति के ऐतिहासिक आयामों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देती है।

