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Blog / 05 Jun 2026

रक्षा खरीद प्रणाली में सशस्त्र बलों की बढ़ी वित्तीय स्वायत्तता

संदर्भ:

हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सशस्त्र बलों के लिए संशोधित ‘डेलीगेशन ऑफ फाइनेंशियल पावर्स फॉर डिफेंस सर्विसेज (DFPDS)’ जारी किया है। इसके तहत सेना, नौसेना और वायुसेना के विभिन्न कमांडरों तथा वित्तीय प्राधिकरणों की खरीद संबंधी वित्तीय शक्तियों में 100 प्रतिशत तक वृद्धि की गई है। सरकार का उद्देश्य रक्षा खरीद प्रक्रियाओं को तेज करना, परिचालन दक्षता बढ़ाना तथा आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहित करना है।

DFPDS क्या है?

      • डेलीगेशन ऑफ फाइनेंशियल पावर्स फॉर डिफेंस सर्विसेज (DFPDS) वह प्रशासनिक ढांचा है जो सशस्त्र बलों के विभिन्न अधिकारियों को रक्षा सेवाओं की आवश्यकताओं हेतु वित्तीय निर्णय लेने और खरीद की अनुमति देता है।
      • यह मुख्यतः राजस्व व्यय (Revenue Procurement) से संबंधित खरीद को नियंत्रित करता है, जिसमें शामिल हैं-
        • गोला-बारूद और स्पेयर पार्ट्स,
        • उपकरणों का रखरखाव,
        • चिकित्सा सामग्री,
        • बुनियादी ढांचा एवं कार्य परियोजनाएँ,
        • परिचालन आवश्यकताओं से जुड़ी वस्तुएँ।
      • इसके विपरीत, बड़े पूंजीगत रक्षा अधिग्रहण (जैसे युद्धक विमान, टैंक, युद्धपोत आदि) रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (Defence Acquisition Procedure-DAP) के अंतर्गत आते हैं।

I congratulate MoD and the Armed Forces on getting enhanced Financial Powers  for Revenue related Procurement having annual value of more than Rs 1.25  Lakh crore under the new delegation of financial

संशोधित वित्तीय शक्तियों की प्रमुख विशेषताएँ:

      • वित्तीय सीमा में उल्लेखनीय वृद्धि: नए प्रावधानों के तहत विभिन्न सैन्य प्राधिकरणों की खरीद संबंधी वित्तीय शक्तियों को दोगुना या उससे अधिक बढ़ाया गया है। इससे कमांडर उच्च स्तर की स्वीकृति की प्रतीक्षा किए बिना शीघ्र निर्णय ले सकेंगे।
      • परिचालन आवश्यकताओं के लिए अधिक स्वायत्तता: तीनों सेनाओं के कमांडरों को आपातकालीन एवं परिचालन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विशेष वित्तीय शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। इससे सीमावर्ती क्षेत्रों या संकट की परिस्थितियों में त्वरित खरीद संभव होगी।
      • आत्मनिर्भरता और अनुसंधान को बढ़ावा: स्वदेशीकरण (Indigenisation) तथा अनुसंधान एवं विकास (R&D) से संबंधित वित्तीय शक्तियों को भी दोगुना किया गया है। इसका उद्देश्य विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं (OEMs) पर निर्भरता कम करना और घरेलू रक्षा उद्योग को प्रोत्साहित करना है।
      • संयुक्त सैन्य खरीद (Joint-Service Procurement): नए DFPDS में "लीड सर्विस" के माध्यम से संयुक्त खरीद का प्रावधान किया गया है। इससे सेना, नौसेना और वायुसेना समान आवश्यकताओं की खरीद सामूहिक रूप से कर सकेंगी, जिससे लागत कम होगी और संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा।
      • विकेंद्रीकरण को बढ़ावा: नई व्यवस्था में कई अतिरिक्त सक्षम वित्तीय अधिकारी (Competent Financial Authorities) जोड़ी गई हैं, जिससे खरीद संबंधी निर्णय निचले स्तरों पर लिए जा सकेंगे और नौकरशाही प्रक्रियाओं में कमी आएगी।

सुधार का महत्व:

      • राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से: आधुनिक युद्धों में त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। सीमावर्ती तनाव, ड्रोन युद्ध, साइबर खतरे और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसी चुनौतियों के बीच सैन्य कमांडरों को तत्काल निर्णय लेने की आवश्यकता होती है। नई वित्तीय शक्तियाँ इस आवश्यकता को पूरा करती हैं।
      • आत्मनिर्भर भारत अभियान को बल: रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी अनुसंधान, नवाचार और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देकर यह कदम "आत्मनिर्भर भारत" तथा "मेक इन इंडिया" कार्यक्रमों को मजबूत करेगा।
      • खरीद प्रक्रिया में गति: रक्षा खरीद प्रणाली अक्सर जटिल प्रक्रियाओं और बहुस्तरीय अनुमोदनों के कारण विलंबित होती रही है। वित्तीय शक्तियों के विकेंद्रीकरण से इन बाधाओं को कम किया जा सकेगा।

चुनौतियाँ:

हालाँकि बढ़ी हुई वित्तीय स्वायत्तता सकारात्मक कदम है, लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं-

      • वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करना।
      • खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना।
      • भ्रष्टाचार और संसाधनों के दुरुपयोग की रोकथाम।
      • विभिन्न सैन्य सेवाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना।
      • स्वदेशी रक्षा उद्योग की उत्पादन क्षमता को पर्याप्त स्तर तक विकसित करना।

निष्कर्ष:

DFPDS-2026 में किया गया संशोधन भारतीय सशस्त्र बलों को अधिक परिचालन स्वतंत्रता, त्वरित निर्णय क्षमता और वित्तीय लचीलापन प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार है। यह न केवल रक्षा तैयारियों को मजबूत करेगा, बल्कि आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन, संयुक्त सैन्य संचालन तथा आधुनिक युद्ध आवश्यकताओं के अनुरूप सैन्य संरचना विकसित करने में भी सहायक सिद्ध होगा।

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