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Blog / 27 Jan 2026

दिल्ली का शीतकालीन प्रदूषण

संदर्भ:

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) द्वारा कराए गए एक हालिया मेटा-विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि दिल्ली के शीतकालीन वायु प्रदूषण में द्वितीयक कणीय पदार्थ सबसे बड़ा योगदानकर्ता हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सर्दियों के मौसम में पीएम2.5 प्रदूषण का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा द्वितीयक कणों से उत्पन्न होता है, जो अब तक अधिक जिम्मेदार माने जाने वाले वाहनों के उत्सर्जन और पराली जलाने जैसे स्रोतों से भी अधिक है।

मेटा-विश्लेषण के प्रमुख निष्कर्ष:

      • सीएक्यूएम की इस रिपोर्ट में दिल्ली के वायु प्रदूषण से संबंधित कई स्रोत-विभाजन अध्ययनों का समेकित विश्लेषण किया गया है। सर्दियों के दौरान प्रदूषण के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित पाए गए:
        • द्वितीयक कणीय पदार्थ: 27 प्रतिशत
        • परिवहन से होने वाला उत्सर्जन: 23 प्रतिशत
        • बायोमास दहन: 20 प्रतिशत (जिसमें फसल अवशेष तथा नगर ठोस कचरे का जलाया जाना शामिल है)
        • धूल: 15 प्रतिशत
        • औद्योगिक गतिविधियाँ: 9 प्रतिशत
      • यह रिपोर्ट किसी नए प्रदूषण स्रोत की पहचान नहीं करती, बल्कि पूर्ववर्ती अध्ययनों में अपनाई गई विभिन्न पद्धतियों को एकरूप बनाकर नीति-निर्माण के लिए एक अधिक स्पष्ट और समन्वित आकलन प्रस्तुत करती है।

द्वितीयक कणीय पदार्थ क्या हैं?

      • द्वितीयक कणीय पदार्थ सीधे वातावरण में उत्सर्जित नहीं होते, बल्कि वायुमंडल में होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं के परिणामस्वरूप बनते हैं। इनके निर्माण में मुख्य रूप से नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, वाष्पशील कार्बनिक यौगिक तथा अमोनिया जैसी गैसें शामिल होती हैं।
      • दिल्ली के संदर्भ में:
        • कोयले के दहन और ईंट भट्टों से उत्सर्जित सल्फर डाइऑक्साइड वायुमंडल में मिलकर सल्फ्यूरिक अम्ल का निर्माण करता है।
        • वाहनों और ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाला नाइट्रोजन ऑक्साइड नाइट्रिक अम्ल में परिवर्तित हो जाता है।
        • ये अम्ल, कृषि में उर्वरकों के उपयोग और पशुओं के मल-मूत्र से निकलने वाली अमोनिया के साथ प्रतिक्रिया करके अमोनियम सल्फेट तथा अमोनियम नाइट्रेट जैसे सूक्ष्म कण बनाते हैं, जो पीएम2.5 का एक बड़ा भाग होते हैं।
      • अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि पीएम2.5 का लगभग 25 से 60 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं सल्फेट और नाइट्रेट कणों से मिलकर बनता है, जिससे द्वितीयक कणीय पदार्थ अत्यंत प्रभावी और घातक प्रदूषक बन जाते हैं।

स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रभाव:

द्वितीयक कणीय पदार्थ अपने अत्यंत सूक्ष्म आकार (पीएम2.5) के कारण विशेष रूप से हानिकारक होते हैं, क्योंकि ये फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुँचने के साथ-साथ रक्त प्रवाह में भी प्रवेश कर सकते हैं। इनसे दमा, दीर्घकालिक श्वसन रोग, फेफड़ों का कैंसर, हृदय संबंधी विकार, नेत्र रोग तथा तीव्र श्वसन संक्रमण जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। चूँकि इन कणों का निर्माण मौसम संबंधी परिस्थितियों से भी प्रभावित होता है, इसलिए केवल किसी एक स्रोत पर प्रतिबंध लगाकर इन्हें नियंत्रित करना कठिन हो जाता है।

नीतिगत संकेत और आगे की राह:

      • रिपोर्ट यह रेखांकित करती है कि केवल पराली जलाने या यातायात पर प्रतिबंध जैसे प्रत्यक्ष और दिखाई देने वाले स्रोतों पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है। प्रभावी नियंत्रण के लिए आवश्यक है:
        • नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और अमोनिया जैसी पूर्ववर्ती गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना, जिसके लिए स्वच्छ ईंधन, सख्त औद्योगिक मानक और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना होगा।
        • उत्सर्जन की विश्वसनीय सूची तैयार करना तथा मजबूत स्रोत-विभाजन अध्ययन करना, जिसे सीएक्यूएम वर्ष 2026 को आधार वर्ष मानकर करने की योजना बना रहा है।
        • बेहतर प्रारंभिक चेतावनी और निर्णय-समर्थन प्रणालियों के माध्यम से वायु गुणवत्ता के पूर्वानुमान को  मजबूत बनाना।

निष्कर्ष:

सीएक्यूएम की यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि दिल्ली की वायु प्रदूषण समस्या केवल स्थानीय उत्सर्जन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रासायनिक प्रक्रियाओं और व्यापक प्रणालीगत कारकों से भी गहराई से जुड़ी हुई है। द्वितीयक कणीय पदार्थों के निर्माण को नियंत्रित करने के लिए ऊर्जा, परिवहन, कृषि और शहरी प्रशासन, सभी क्षेत्रों में समन्वित तथा दीर्घकालिक प्रयास आवश्यक हैं। तभी वायु गुणवत्ता में स्थायी और प्रभावी सुधार संभव हो सकेगा।