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Blog / 04 Nov 2026

विश्व के हिमाच्छादित क्षेत्र वैश्विक औसत से अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं: संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट

संदर्भ:

हाल ही में, 2 नवंबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय क्रायोस्फीयर जलवायु पहल (ICCI) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा दो रिपोर्टें जारी की गईं। ये रिपोर्टें हैं- ओवरशूट एंड द क्रायोस्फीयर: अवर्टिंग ग्लोबल मेल्टडाउन, स्टेट ऑफ द क्रायोस्फीयर 2026: द कॉस्ट ऑफ ओवरशूट (Overshoot and the Cryosphere: Averting Global Meltdown  and State of the Cryosphere 2026: The Cost of Overshoot)। इन रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि विश्व के हिमाच्छादित क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं, जिससे हिमनद झीलों में बाढ़ (Glacial Floods), बर्फ की अपरिवर्तनीय हानि और बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन का खतरा बढ़ रहा है।

क्रायोस्फीयर (Cryosphere) क्या है?

      • क्रायोस्फीयर से तात्पर्य पृथ्वी के उन सभी हिस्सों से है, जहाँ जल हिम के रूप में मौजूद होता है। इसमें हिमनद (Glaciers), हिम चादरें (Ice Sheets), समुद्री बर्फ (Sea Ice), स्थायी तुषार भूमि (Permafrost), हिम आवरण (Snow Cover) और हिम शेल्फ (Ice Shelves) शामिल हैं।
      • यह एल्बिडो प्रभाव (Albedo Effect) के माध्यम से वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने, मीठे जल के भंडार को बनाए रखने और महासागरीय परिसंचरण को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

रिपोर्टों के प्रमुख निष्कर्ष:

      • इन रिपोर्टों में बताया गया है कि पिछले एक दशक के दौरान आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में चार गुना तक अधिक तेजी से गर्म हुआ है। हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में वैश्विक तापमान में 1.5°C की वृद्धि का अर्थ क्षेत्रीय तापमान में 1.8–2.2°C तक की वृद्धि हो सकता है।
      • ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की हिम चादरें 1990 के दशक की तुलना में लगभग छह गुना अधिक तेजी से बर्फ खो रही हैं। इसके अतिरिक्त, रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि पेरिस समझौते द्वारा निर्धारित 1.5°C की तापमान सीमा का अस्थायी रूप से भी अतिक्रमण हिमनदों, हिम चादरों और स्थायी तुषार भूमि को अपरिवर्तनीय क्षति पहुँचा सकता है।

स्थायी तुषार भूमि (Permafrost) और जलवायु पर इसके प्रभाव:

स्थायी तुषार भूमि से तात्पर्य ऐसी भूमि से है, जो लगातार कम-से-कम दो वर्षों तक जमी रहती है। उत्तरी गोलार्ध के लगभग 1.4 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के नीचे स्थायी तुषार भूमि मौजूद है, जिसमें कम-से-कम 1,700 अरब टन कार्बन संचित है।

इसके पिघलने से कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में उत्सर्जित होती हैं। इससे एक सकारात्मक प्रतिपुष्टि चक्र (Positive Feedback Loop) बनता है, जो वैश्विक तापमान वृद्धि की प्रक्रिया को और तेज करता है।

हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOFs) क्या हैं?

      • GLOF से तात्पर्य हिमनद झील के प्राकृतिक बाँध के टूटने के कारण उसमें संचित जल के अचानक बाहर निकलने से है। यह प्राकृतिक बाँध बर्फ या एकत्रित चट्टानी मलबे से बना हो सकता है।
      • इसके प्रमुख कारणों में हिमस्खलन (Ice Avalanches), अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन और मोरेन बाँध (Moraine Dam) का टूटना शामिल हैं। अध्ययन के अनुसार, दर्ज की गई घटनाओं में हिमस्खलन का योगदान 50% था, जबकि अत्यधिक वर्षा का योगदान 25% था। लगभग 70% GLOF घटनाएँ ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान हुईं।

भारत की सुभेद्यता:

      • हिंदूकुश हिमालय के आठ देशों को शामिल करने वाले संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 1835 से 2025 के बीच भारत में GLOF के कारण 6,119 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई, जो अध्ययन में शामिल देशों में सबसे अधिक है।
      • भारत में GLOF की 62 घटनाएँ दर्ज की गईं, जबकि चीन में 199 और पाकिस्तान में 152 घटनाएँ दर्ज की गईं। वर्ष 1950 के बाद GLOF की आवृत्ति बढ़कर लगभग 34 घटनाएँ प्रति दशक हो गई, जो वर्ष 1950 से पहले की दर से लगभग पाँच गुना अधिक है।
      • वर्ष 2021 की चमोली आपदा और वर्ष 2023 की दक्षिण ल्होनक झील आपदा भारत की इस सुभेद्यता को उजागर करती हैं।

प्रमुख प्रभाव:

क्रायोस्फीयर का क्षरण मीठे जल की सुरक्षा, जैव विविधता, जलविद्युत अवसंरचना, कृषि और पर्वतीय समुदायों की आजीविका के लिए खतरा उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त, यह समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, सुभेद्य समुदायों के विस्थापन और निचले क्षेत्रों में आपदा जोखिमों को बढ़ाने में भी योगदान देता है।

सरकार की पहलें:

इस दिशा में प्रमुख पहलों में पेरिस समझौता (2015), जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (National Action Plan on Climate Change), हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण हेतु राष्ट्रीय मिशन (National Mission for Sustaining the Himalayan Ecosystem), GLOF प्रबंधन पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशा-निर्देश तथा संयुक्त राष्ट्र की ‘सभी के लिए पूर्व चेतावनी’ पहल (Early Warnings for All) शामिल हैं।

निष्कर्ष:

क्रायोस्फीयर का तेजी से क्षरण अब केवल ध्रुवीय या हिमालयी क्षेत्रों की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक जलवायु सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया है। भारत को अपने संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करने और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए जलवायु परिवर्तन शमन, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा आपदा तैयारी को एकीकृत करने की आवश्यकता है।

 

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