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Blog / 07 Jul 2026

ऋण वृद्धि जमा वृद्धि से आगे: बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ती चुनौती

चर्चा में क्यों?

हाल के समय में भारत के बैंकिंग क्षेत्र में ऋण (Credit) वृद्धि और जमा (Deposit) संग्रह के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की रिपोर्ट के अनुसार, 15 जून 2026 को समाप्त पखवाड़े में क्रेडिट-डिपॉजिट गैप बढ़कर रिकॉर्ड 564 बेसिस पॉइंट (bps) पर पहुँच गया। इसके साथ ही ऋण-जमा अनुपात (Loan-to-Deposit Ratio - LDR) बढ़कर अब तक के सर्वाधिक 83.4% पर पहुँच गया है, जिससे बैंकिंग क्षेत्र की तरलता (Liquidity) और वित्तीय स्थिरता को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।

आरबीआई रिपोर्ट की प्रमुख बातें:

      • बैंकों का कुल बकाया ऋण (Outstanding Bank Credit) वर्ष-दर-वर्ष 17.7% बढ़कर 215.5 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसका मुख्य कारण खुदरा ग्राहकों (Retail Borrowers), सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs), गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) तथा कॉर्पोरेट क्षेत्र की मजबूत ऋण मांग रही।
      • बैंक जमा (Deposits) में वर्ष-दर-वर्ष केवल 12.0% की वृद्धि हुई और यह 258.4 लाख करोड़ रुपये रही। वहीं, क्रमिक आधार (Sequential Basis) पर जमा में 1.8 लाख करोड़ रुपये (0.6%) की कमी दर्ज की गई। इसका कारण अग्रिम कर (Advance Tax) भुगतान तथा बाजार-आधारित वित्तीय उत्पादों में निवेश बढ़ना रहा।
      • क्रेडिट-डिपॉजिट गैप 544 बेसिस पॉइंट से बढ़कर 564 बेसिस पॉइंट हो गया, जो दर्शाता है कि ऋण वितरण की गति जमा वृद्धि की तुलना में कहीं अधिक तेज है।
      • इसके परिणामस्वरूप ऋण-जमा अनुपात (LDR) एक वर्ष पहले के 79.4% से बढ़कर रिकॉर्ड 83.4% हो गया, जो बैंकिंग प्रणाली में तरलता की स्थिति के अधिक सख्त होने का संकेत देता है।

CASA जमा क्या हैं?

      • CASA (Current Account and Savings Account) जमा बैंकों के लिए कम लागत वाले जमा होते हैं, जो ऋण देने हेतु धन का प्रमुख स्रोत हैं।
      • चालू खाता (Current Account): मुख्यतः व्यवसायों द्वारा संचालित किया जाता है। इसमें सामान्यतः ब्याज नहीं मिलता, लेकिन असीमित लेन-देन की सुविधा होती है।
      • बचत खाता (Savings Account): व्यक्तिगत ग्राहकों द्वारा संचालित किया जाता है। इसमें सीमित ब्याज मिलता है तथा धन की उच्च तरलता बनी रहती है।
      • CASA जमा को कम लागत वाला और अपेक्षाकृत स्थिर (Sticky) धन स्रोत माना जाता है, जिससे बैंक कम लागत पर ऋण प्रदान कर पाते हैं।

CASA जमा की वृद्धि धीमी क्यों हो रही है?

CASA जमा की धीमी वृद्धि के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

      • शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, ETF तथा लघु बचत योजनाओं में अधिक रिटर्न मिलने के कारण निवेश बढ़ना।
      • UPI, ऑनलाइन निवेश प्लेटफॉर्म तथा सरल KYC प्रक्रिया के कारण निवेश करना पहले की तुलना में अधिक आसान होना।
      • परिवारों में वित्तीय जागरूकता का बढ़ना।
      • बचत खातों की तुलना में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर अधिक आकर्षक ब्याज दरों का उपलब्ध होना।
      • ऋण-जमा अनुपात (Credit-to-Deposit Ratio) एवं परिसंपत्ति-दायित्व असंतुलन (Asset-Liability Mismatch)
      • क्रेडिट-टू-डिपॉजिट (CD) अनुपात अथवा ऋण-जमा अनुपात (LDR) यह मापता है कि बैंकों द्वारा प्राप्त कुल जमा का कितना हिस्सा ऋण के रूप में दिया गया है। अधिक अनुपात यह दर्शाता है कि बैंक जमा का प्रभावी उपयोग कर रहे हैं, लेकिन इससे उनके पास तरलता का सुरक्षा कवच (Liquidity Cushion) कम रह जाता है।
      • परिसंपत्ति-दायित्व असंतुलन (Asset-Liability Mismatch - ALM) तब उत्पन्न होता है, जब बैंक अल्पकालिक जमा के आधार पर दीर्घकालिक ऋण प्रदान करते हैं। यदि जमाकर्ता ऋण की परिपक्वता (Maturity) से पहले अपनी राशि निकाल लेते हैं, तो बैंक को तरलता संकट का सामना करना पड़ सकता है।

जमा संग्रह में धीमी वृद्धि चिंता का विषय क्यों है?

      • जमा वृद्धि कमजोर रहने के कारण बैंकों को अब थोक वित्तपोषण (Wholesale Funding) जैसे टर्म डिपॉजिट तथा सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CDs) पर अधिक निर्भर होना पड़ रहा है।
      • सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CDs) की कुल बकाया राशि 6.67 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गई, जबकि नए निर्गम (Fresh Issuances) बढ़कर 1.02 लाख करोड़ रुपये हो गए, जो वर्ष-दर-वर्ष 38.1% की वृद्धि दर्शाते हैं।
      • जहाँ CASA जमा पर बैंकों की लागत सामान्यतः 3–4% होती है, वहीं टर्म डिपॉजिट एवं CDs पर यह लागत 7–8% तक पहुँच जाती है। इससे बैंकों का शुद्ध ब्याज मार्जिन (Net Interest Margin - NIM) कम हो जाता है।
      • थोक वित्तपोषण पर बढ़ती निर्भरता से बैंक RBI की ब्याज दरों में परिवर्तन, तरलता में कमी तथा बाहरी वित्तीय झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।

टर्म डिपॉजिट, सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट एवं म्यूचुअल फंड:

      • टर्म डिपॉजिट (Term Deposits): इसमें फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और रिकरिंग डिपॉजिट (RD) शामिल होते हैं, जिनमें एक निश्चित अवधि के लिए धन जमा किया जाता है और बदले में अपेक्षाकृत अधिक ब्याज प्राप्त होता है।
      • सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (Certificates of Deposit - CDs): ये बैंक द्वारा जारी किए जाने वाले विनिमेय (Negotiable) मुद्रा बाजार (Money Market) के साधन हैं, जिनके माध्यम से बैंक संस्थागत निवेशकों से अल्पकालिक धन जुटाते हैं।
      • म्यूचुअल फंड (Mutual Funds): इनमें अनेक निवेशकों का धन एकत्र कर विशेषज्ञों द्वारा विविध निवेश पोर्टफोलियो में लगाया जाता है। इनमें अधिक प्रतिफल की संभावना होती है, लेकिन बाजार, ऋण, तरलता और ब्याज दर से जुड़े जोखिम भी मौजूद रहते हैं।

निष्कर्ष:

भारत के बैंकिंग क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए जमा संग्रह (Deposit Mobilisation) को मजबूत करना, परिसंपत्ति-दायित्व प्रबंधन (Asset-Liability Management) को बेहतर बनाना तथा संतुलित ऋण-जमा अनुपात (Credit-to-Deposit Ratio) बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होगा। इससे बैंकिंग प्रणाली की तरलता, लाभप्रदता और वित्तीय लचीलापन (Resilience) को मजबूती मिलेगी।

 

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