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Blog / 31 Oct 2026

तमिलनाडु में चोल काल की भगवान नटराज और देवी शिवगामी की मूर्तियाँ मिलीं

संदर्भ:

हाल ही में, तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग ने तमिलनाडु के नागपट्टिनम में पुरातात्त्विक उत्खनन के दौरान 12वीं शताब्दी की चोल कालीन भगवान नटराज और देवी शिवगामी की दो कांस्य मूर्तियाँ खोजी हैं।

खोज से संबंधित प्रमुख तथ्य:

      • दोनों कांस्य मूर्तियाँ जमीन के लगभग एक मीटर नीचे मिली हैं। इनके साथ संबंधित आसन (पीठिका) भी प्राप्त हुए हैं। नटराज की मूर्ति की ऊँचाई लगभग 110 सेमी और चौड़ाई 100 सेमी है, जबकि देवी शिवगामी की मूर्ति की ऊँचाई 82 सेमी और चौड़ाई 23 सेमी है।
      • नटराज को चार भुजाओं के साथ आनंद तांडव (आनंद का नृत्य) करते हुए दर्शाया गया है, जबकि देवी शिवगामी को सुंदर त्रिभंग मुद्रा में दिखाया गया है। इन मूर्तियों को रासायनिक उपचार और धातुकर्म संबंधी विश्लेषण सहित वैज्ञानिक परीक्षण एवं संरक्षण के लिए भेजा गया है।

Chola-era bronze alloy idols of Lord Nataraja, Goddess Sivakami unearthed  in Nagapattinam - The Hindu

चोल साम्राज्य के बारे में:

      • चोल दक्षिण भारत के सबसे शक्तिशाली राजवंशों में से एक थे। उन्होंने वर्तमान तमिलनाडु के बड़े हिस्से पर शासन किया तथा श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक अपने प्रभाव का विस्तार किया। विजयालय चोल ने 9वीं शताब्दी में साम्राज्यवादी चोल राजवंश की स्थापना की।
      • राजराजा चोल प्रथम (985–1014 ई.) ने साम्राज्य का विस्तार किया और तंजावुर में प्रसिद्ध बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया। उनके उत्तराधिकारी राजेंद्र चोल प्रथम (1014–1044 ई.) ने दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर नौसैनिक अभियान चलाए और गंगैकोंडचोलपुरम नगर की स्थापना की।
      • चोलों ने एक कुशल प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की, ग्राम स्वशासन को प्रोत्साहित किया तथा चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ समुद्री व्यापार को बढ़ावा दिया। उत्तरमेरुर अभिलेख उनकी स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं और ग्राम सभाओं के महत्त्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान करते हैं।

चोल कला एवं वास्तुकला:

      • चोल काल को दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला और कांस्य मूर्तिकला का स्वर्णिम युग माना जाता है। इस राजवंश ने द्रविड़ शैली की मंदिर वास्तुकला में उल्लेखनीय योगदान दिया। इस शैली की प्रमुख विशेषताओं में विशाल विमान (मंदिर के गर्भगृह के ऊपर निर्मित संरचना), विस्तृत मूर्तिकला और विशाल मंदिर परिसर शामिल हैं।
      • इसके प्रमुख उदाहरणों में तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर, गंगैकोंडचोलपुरम मंदिर और दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर शामिल हैं। इन तीनों मंदिरों को सामूहिक रूप से यूनेस्को द्वारा महान जीवंत चोल मंदिर (Great Living Chola Temples) के रूप में मान्यता दी गई है। इन्हें 1987 में विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया तथा 2004 में इस सूची का विस्तार किया गया।
      • चोल कालीन कांस्य मूर्तियों का निर्माण मुख्य रूप से मोम-क्षय तकनीक (Lost-Wax Technique) से किया जाता था, जिसे सिरे पर्ड्यू (Cire Perdue) भी कहा जाता है। इस तकनीक में पहले मोम का एक मॉडल बनाया जाता था, फिर उसे मिट्टी से ढका जाता था। इसके बाद मोम को पिघलाकर बाहर निकाल दिया जाता था और उससे बनी खाली जगह में पिघली हुई धातु डाली जाती थी।
      • इन मूर्तियों की प्रमुख विशेषताएँ वास्तविक शारीरिक संरचना, सुंदर मुद्राएँ और बारीक अलंकरण हैं।

खोज का महत्त्व:

      • यह खोज चोल काल की धार्मिक परंपराओं, विशेष रूप से शैव धर्म, के प्रमाण प्रदान करती है तथा उस समय के उन्नत कांस्य ढलाई और धातुकर्म कौशल को उजागर करती है। यह एक समुद्री व्यापारिक केंद्र के रूप में नागपट्टिनम के ऐतिहासिक महत्त्व को भी रेखांकित करती है।
      • इस प्रकार की पुरातात्त्विक खोजें मध्यकालीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में सहायता करती हैं तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रयासों को मजबूत बनाती हैं।

निष्कर्ष:

चोल कालीन नटराज और शिवगामी की मूर्तियों की खोज कला, वास्तुकला, धातुकर्म और धार्मिक परंपराओं के क्षेत्र में चोल राजवंश की उल्लेखनीय उपलब्धियों को उजागर करती है। यह दर्शाती है कि पुरातात्त्विक उत्खनन भारत के ऐतिहासिक विकास को समझने में किस प्रकार सहायता करते हैं। साथ ही, यह देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता पर भी बल देती है।

 

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