संदर्भ:
अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था शक्ति संतुलन में बदलाव और बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। इस संदर्भ में, प्रमुख शक्तियों के साथ चीन की बढ़ती कूटनीतिक गतिविधियों ने उसे एक महत्वपूर्ण वैश्विक अभिनेता के रूप में मजबूत किया है। दिसंबर 2025 से मई 2026 के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के सभी अन्य स्थायी सदस्यों के नेताओं की चीन यात्राएँ भी अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को आकार देने में इसके बढ़ते प्रभाव को दर्शाती हैं।
कूटनीतिक केंद्र के रूप में चीन:
चीन स्वयं को शांति, संवाद और बहुपक्षीय सहयोग के प्रवर्तक के रूप में प्रस्तुत करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम के साथ उच्च-स्तरीय संवादों के माध्यम से चीन वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए प्रमुख शक्तियों के बीच संवाद की आवश्यकता पर जोर देता है। उसकी कूटनीति गुटनिरपेक्षता, गैर-टकराव और राज्य संप्रभुता के सम्मान के सिद्धांतों पर आधारित है। यह दृष्टिकोण बढ़ते वैश्विक ध्रुवीकरण के बावजूद चीन को विविध देशों के साथ संबंध बनाए रखने में सक्षम बनाता है।
बहुपक्षवाद के प्रति प्रतिबद्धता:
चीन की विदेश नीति का एक प्रमुख विषय संयुक्त राष्ट्र-केंद्रित अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली का समर्थन है। चीन बहुपक्षवाद, विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और वैश्विक शासन संस्थानों में विकासशील देशों के अधिक प्रतिनिधित्व की वकालत करता है। उसका तर्क है कि जलवायु परिवर्तन, आर्थिक अस्थिरता और सुरक्षा खतरों जैसी अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान एकतरफा कदमों के बजाय सामूहिक कार्रवाई से ही संभव है। इन रुखों ने ग्लोबल साउथ के कई देशों के बीच चीन की अपील को बढ़ाया है।
आर्थिक प्रभाव और वैश्वीकरण:
चीन का आर्थिक उत्थान अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में उसकी भूमिका को काफी मजबूत करता है। विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और व्यापारिक देशों में से एक होने के नाते, वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में केंद्रीय स्थान रखता है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) जैसी पहलों के माध्यम से चीन ने एशिया, अफ्रीका और यूरोप में बुनियादी ढांचे की कनेक्टिविटी और आर्थिक साझेदारियों का विस्तार किया है। व्यापार और निवेश के प्रति उसकी निरंतर प्रतिबद्धता वैश्विक आर्थिक विकास में योगदान देती है और उसके रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाती है।
चुनौतियाँ और आलोचनाएँ:
अपनी बढ़ती शक्ति के बावजूद, चीन का उदय विवाद का विषय बना हुआ है। दक्षिण चीन सागर में उसकी आक्रामक नीतियों, ताइवान पर उसके रुख और आर्थिक प्रभाव को रणनीतिक लाभ के लिए उपयोग करने के आरोपों को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं। इसके अलावा, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच चल रही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने प्रौद्योगिकी, व्यापार और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में तनाव पैदा किया है। आलोचकों का मानना है कि चीन की कार्रवाइयाँ हमेशा उसके द्वारा घोषित नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं होतीं।
भारत के लिए निहितार्थ:
भारत के लिए चीन की बढ़ती भूमिका अवसर और चुनौतियाँ दोनों प्रस्तुत करती है। व्यापार, जलवायु परिवर्तन, BRICS और वैश्विक शासन सुधारों में सहयोग सहभागिता के अवसर प्रदान करता है। हालांकि, अनसुलझे सीमा विवाद, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण भारत को अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए कूटनीतिक संवाद बनाए रखना आवश्यक है।
निष्कर्ष:
चीन आर्थिक शक्ति, कूटनीतिक पहुँच और बहुध्रुवीयता के समर्थन के माध्यम से विकसित हो रही अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा है। यद्यपि वैश्विक शासन में उसका योगदान महत्वपूर्ण है, क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चिंताएँ भी बनी हुई हैं। भविष्य की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था काफी हद तक इस पर निर्भर करेगी कि चीन अपने राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं और एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी जिम्मेदारियों के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करता है।
