संदर्भ:
वर्ल्ड ओबेसिटी डे (4 मार्च) पर, वर्ल्ड ओबेसिटी फेडरेशन द्वारा हाल ही में वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026 जारी किया गया। इस रिपोर्ट में भारत में बाल अवस्था के मोटापे की तेजी से बढ़ती समस्या तथा कुपोषण और मोटापे के एक साथ मौजूद रहने की स्थिति को रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार उच्च बॉडी मास इंडेक्स (BMI) वाले बच्चों की संख्या के मामले में भारत विश्व में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है।
वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026 के प्रमुख निष्कर्ष-
प्रमुख आँकड़े
- भारत में लगभग 4.1 करोड़ बच्चों का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) उच्च है।
- लगभग 1.4 करोड़ बच्चे मोटापे (Obesity) से ग्रस्त हैं।
- 5–9 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 1.5 करोड़ बच्चे अधिक वजन या मोटापे से प्रभावित हैं।
- 10–19 वर्ष आयु वर्ग के 2.6 करोड़ से अधिक किशोर अधिक वजन या मोटापे से प्रभावित हैं।
- कुल संख्या के आधार पर भारत विश्व में दूसरे स्थान पर है।
वैश्विक परिदृश्य
दुनिया में तीन ऐसे देश हैं जहाँ 1 करोड़ से अधिक मोटापे से ग्रस्त बच्चे हैं:
- चीन
- भारत
- संयुक्त राज्य अमेरिका
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2040 तक विश्व में लगभग 50.7 करोड़ बच्चे अधिक वजन या मोटापे से प्रभावित हो सकते हैं।
प्रमुख कारक:
कम शारीरिक गतिविधि
- 11–17 वर्ष के 74% किशोर अनुशंसित स्तर की शारीरिक गतिविधि नहीं करते।
- स्क्रीन टाइम में वृद्धि और निष्क्रिय जीवनशैली इसका प्रमुख कारण है।
शिशु पोषण की कमजोर प्रथाएँ
- 1–5 महीने के 32.6% शिशुओं को पर्याप्त स्तनपान नहीं मिल पाता।
अस्वस्थ आहार पैटर्न
- शर्करा युक्त पेय और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन।
- 6–10 वर्ष के बच्चे प्रतिदिन औसतन 50 मि.ली. शर्करा युक्त पेय का सेवन करते हैं।
स्कूल पोषण कार्यक्रम की सीमित पहुँच
- केवल 35.5% स्कूली बच्चों को विद्यालय में भोजन मिलता है, जिससे संतुलित आहार की उपलब्धता सीमित रहती है।
पीढ़ीगत स्वास्थ्य समस्याएँ
- 15–49 वर्ष की 13.4% महिलाएँ उच्च BMI से ग्रस्त हैं।
- 4.2% महिलाएँ टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित हैं, जिससे बच्चों में चयापचय संबंधी जोखिम बढ़ता है।
बाल अवस्था के मोटापे से स्वास्थ्य पर प्रभाव
शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
बाल अवस्था में मोटापा कई दीर्घकालिक बीमारियों से जुड़ा है, जैसे:
- टाइप-2 मधुमेह
- हृदय एवं रक्तवाहिका रोग
- उच्च रक्तचाप
- फैटी लिवर रोग
मनोवैज्ञानिक प्रभाव
- आत्मसम्मान में कमी
- अवसाद
- सामाजिक कलंक और बुलिंग
आर्थिक प्रभाव
- स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता खर्च
- वयस्क अवस्था में उत्पादकता में कमी
रिपोर्ट के अनुसार 2040 तक उच्च BMI से संबंधित रोगों के संकेतकों में भारत में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है।
भारत में कुपोषण का दोहरा बोझ
भारत एक विशिष्ट पोषण संबंधी विरोधाभास का सामना कर रहा है, जहाँ कुपोषण और मोटापा दोनों साथ-साथ मौजूद हैं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के प्रमुख आंकड़े
- 5 वर्ष से कम आयु के 35.5% बच्चे अवरुद्ध वृद्धि (Stunted) से प्रभावित
- 32.1% बच्चे कम वजन (Underweight)
- 19.3% बच्चे क्षीणता (Wasting) से ग्रस्त
- 50% से अधिक बच्चे एनीमिया से पीड़ित
यह स्थिति दर्शाती है कि समस्या केवल भोजन की कमी नहीं, बल्कि असंतुलित आहार भी है।
बाल अवस्था के मोटापे से निपटने के लिए आवश्यक उपाय
नीतिगत हस्तक्षेप
- शर्करा युक्त पेयों पर कर (Tax)
- बच्चों को लक्षित जंक फूड विज्ञापनों पर प्रतिबंध
- खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग
विद्यालय आधारित उपाय
- अनिवार्य शारीरिक शिक्षा
- पौष्टिक स्कूल भोजन कार्यक्रम
- पोषण जागरूकता अभियान
सामुदायिक स्तर पर पहल
- स्तनपान को बढ़ावा देना
- संतुलित आहार के प्रति जागरूकता
- सक्रिय जीवनशैली को प्रोत्साहन
स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत बनाना
- बाल मोटापे की प्रारंभिक स्क्रीनिंग
- पोषण और जीवनशैली पर समेकित परामर्श
निष्कर्ष
भारत में बढ़ता बाल अवस्था का मोटापा एक मौन सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है। इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य प्रणाली और शहरी नियोजन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में बहु-क्षेत्रीय (multisectoral) रणनीति की आवश्यकता है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में गैर-संचारी रोगों (NCDs) की महामारी का खतरा बढ़ सकता है, जो भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को कमजोर कर सकता है।
