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Blog / 26 Sep 2026

ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री: सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को निर्देश

संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (Child Sexual Exploitation and Abuse Material–CSEAM) की उपलब्धता को रोकने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में जानकारी मांगी।

न्यायालय ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) तथा कानून और न्याय मंत्रालय को 23 सितंबर 2024 के अपने फैसले में दिए गए निर्देशों के क्रियान्वयन पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। यह मामला 2024 जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस एवं अन्य बनाम एस. हरीश एवं अन्य से संबंधित है।

सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्देश:

न्यायालय ने संबंधित मंत्रालयों से स्पष्ट रूप से बताने को कहा कि:

  • 2024 के फैसले को लागू करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म पर CSEAM की उपलब्धता और प्रसार को रोकने के लिए क्या उपाय अपनाए गए हैं।
  • सोशल मीडिया इंटरमीडियरी (मध्यस्थ) प्लेटफॉर्म द्वारा भविष्य में ऐसी चूक को रोकने के लिए क्या सावधानियाँ प्रस्तावित की गई हैं।
  • कार्रवाई रिपोर्ट (Action-Taken Report) और मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure–SOP) तैयार करने और लागू करने की दिशा में क्या प्रगति हुई है।

CSEAM क्या है?

बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM) से तात्पर्य ऐसी डिजिटल, दृश्य या ऑडियो सामग्री से है, जिसमें बच्चों के यौन शोषण या दुर्व्यवहार को दर्शाया जाता है।

इसमें फोटोग्राफ, वीडियो, लाइव-स्ट्रीम की गई सामग्री और कुछ प्रकार की डिजिटल रूप से बदली या निर्मित सामग्री शामिल हो सकती है।

“बाल पोर्नोग्राफी” शब्द की जगह CSEAM शब्दावली को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि यह अधिक स्पष्ट रूप से बताती है कि ऐसी सामग्री बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार को दर्शाती है, न कि वयस्कों के बीच सहमति से होने वाली किसी गतिविधि को।

2024 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला:

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस एवं अन्य बनाम एस. हरीश एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने POCSO अधिनियम की धारा 15 की व्याख्या की।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कानून के अंतर्गत आने वाली परिस्थितियों में ऐसी सामग्री को देखना, प्रदर्शित करना या वितरित करना भी ‘कब्जे (Possession)’ की अवधारणा के अंतर्गत आ सकता है, भले ही वह सामग्री पारंपरिक रूप से किसी डिवाइस में स्थायी रूप से संग्रहित न हो।

न्यायालय ने संसद से यह भी विचार करने को कहा कि “बाल पोर्नोग्राफी” शब्द के स्थान पर CSEAM का प्रयोग किया जाए, ताकि अपराध की वास्तविक प्रकृति को अधिक सही ढंग से दर्शाया जा सके।

POCSO अधिनियम, 2012 के बारे में:

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (Protection of Children from Sexual Offences–POCSO Act), 2012 एक लैंगिक रूप से तटस्थ (Gender-Neutral) कानून है, जो 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को यौन हमला, यौन उत्पीड़न और शोषण से सुरक्षा प्रदान करता है।

प्रमुख प्रावधान

  • धारा 15: कुछ निर्धारित उद्देश्यों के लिए बाल यौन शोषण सामग्री को संग्रहित करने या अपने पास रखने से संबंधित प्रावधान।
  • धारा 19: अपराधों की अनिवार्य रिपोर्टिंग का प्रावधान।
  • विशेष न्यायालय: बच्चों के अनुकूल न्यायिक प्रक्रिया और बंद कमरे में सुनवाई (In-camera Trial) सुनिश्चित करते हैं।
  • गंभीर अपराध (Aggravated Offences): निर्धारित परिस्थितियों में अधिक कठोर दंड का प्रावधान।
  • 2019 का संशोधन: गंभीर यौन अपराधों के लिए दंड को और कठोर किया गया।

प्रमुख चुनौतियाँ:

  • आपत्तिजनक सामग्री का तेजी से और बार-बार ऑनलाइन प्रसार।
  • एन्क्रिप्टेड और गुमनाम डिजिटल संचार।
  • साइबर अपराधों का सीमा-पार स्वरूप।
  • पीड़ितों और अपराधियों की पहचान करने में कठिनाई।
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच प्रभावी समन्वय की आवश्यकता।

आगे की राह:

भारत को इस समस्या से निपटने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। इसमें:

  • साइबर अपराधों की जांच क्षमता को मजबूत करना।
  • त्वरित रिपोर्टिंग और सामग्री हटाने की व्यवस्था विकसित करना।
  • डिजिटल इंटरमीडियरी के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करना।
  • पीड़ितों के लिए सहायता एवं संरक्षण व्यवस्था को मजबूत करना।
  • व्यापक यौन शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष:

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इस आवश्यकता को रेखांकित करता है कि तकनीकी प्रगति बच्चों की सुरक्षा और गरिमा को कमजोर न करे।

POCSO अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन, डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदार भूमिका, विशेष साइबर अपराध तंत्र और निवारक शिक्षा, ये सभी बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित डिजिटल वातावरण बनाने के लिए आवश्यक हैं।

 

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