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Blog / 05 Jan 2026

भारत में साइबर अपराध और वित्तीय धोखाधड़ी

सन्दर्भ:

केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत को व्यापक वित्तीय आघात पहुँचा है। इस वर्ष धोखाधड़ी के कारण भारतीयों ने कुल ₹19,812.96 करोड़ की पूंजी गंवाई। 'नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल' पर दर्ज 21.7 लाख से अधिक शिकायतें इस समस्या की भयावहता को रेखांकित करती हैं।

क्षेत्रीय प्रभाव और सांख्यिकीय विश्लेषण:

      • आंकड़ों का विश्लेषण दर्शाता है कि देश के पांच प्रमुख राज्यों, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना में कुल वित्तीय हानि का आधे से अधिक हिस्सा केंद्रित है। इन राज्यों में कुल नुकसान ₹10,000 करोड़ के पार पहुँच गया है।
      • विस्तार और राज्य-वार विवरण:
        • महाराष्ट्र: ₹3,203 करोड़ के नुकसान और 2,83,320 शिकायतों के साथ सबसे अधिक प्रभावित राज्य रहा।
        • कर्नाटक: ₹2,413 करोड़ का नुकसान और 2,13,228 शिकायतें।
        • तमिलनाडु: ₹1,897 करोड़ का नुकसान और 1,23,290 शिकायतें।
        • उत्तर प्रदेश: ₹1,443 करोड़ का नुकसान और 2,75,264 शिकायतें। यह बड़े ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों वाले राज्यों में भी बढ़ते जोखिम को दर्शाता है।
        • तेलंगाना: लगभग 95,000 शिकायतों से ₹1,372 करोड़ का नुकसान।
      • ये पांचों राज्य डिजिटल माध्यम से होने वाली धोखाधड़ी के मुख्य केंद्र रहे।

धोखाधड़ी की प्रकृति और प्रवृत्तियाँ:

      • वर्ष 2025 में वित्तीय अपराधों के स्वरूप में महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं:
        • निवेश संबंधी धोखाधड़ी (77%): यह सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है। लुभावने रिटर्न का लालच देकर की जाने वाली जालसाजी कुल आर्थिक हानि का मुख्य कारण रही।
        • डिजिटल अरेस्ट (8%): यह एक उभरता हुआ मनोवैज्ञानिक अपराध है, जिसमें कानून का डर दिखाकर पीड़ितों से अवैध वसूली की जाती है।
        • अन्य श्रेणियां: क्रेडिट कार्ड जालसाजी (7%), सेक्सटॉर्शन (4%) और ई-कॉमर्स फ्रॉड (3%) भी प्रमुखता से दर्ज किए गए।
      • विशेषज्ञों के अनुसार, तीव्र डिजिटलीकरण, ऑनलाइन वित्तीय व्यवहार में वृद्धि और संगठित साइबर नेटवर्क की बढ़ती तकनीकी जटिलता (Sophistication) इस वृद्धि के प्राथमिक कारक हैं।

भेद्यता के प्रमुख कारण:

      • शहरीकरण और डिजिटल पैठ: जिन राज्यों में डिजिटल साक्षरता और शहरीकरण अधिक है, वहां वित्तीय उत्पादों के साथ अधिक जुड़ाव के कारण जोखिम भी आनुपातिक रूप से बढ़ा है।
      • त्वरित लाभ की आकांक्षा: जालसाज अक्सर अनियमित निवेश योजनाओं और फर्जी ट्रेडिंग ऐप्स के माध्यम से लोगों की 'अल्प समय में अधिक धन' कमाने की इच्छा का लाभ उठाते हैं।
      • जागरूकता का अभाव: वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) तो बढ़ा है, लेकिन सुरक्षात्मक समझ अब भी सीमित है। विशेषकर वरिष्ठ नागरिक और नए डिजिटल उपयोगकर्ता 'सोशल इंजीनियरिंग' (धोखाधड़ी से जानकारी निकलवाना) का आसान शिकार बन रहे हैं।

आगे की राह:

भारत की बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था के समक्ष साइबर-वित्तीय धोखाधड़ी एक गंभीर चुनौती है। हालांकि तकनीक ने सेवाओं को सुलभ बनाया है, लेकिन इसने अपराध के नए मार्ग भी खोले हैं। भविष्य में नियामक तंत्र (Regulatory Framework) को सुदृढ़ करने, कानून प्रवर्तन एजेंसियों की क्षमता निर्माण और व्यापक जन-जागरूकता अभियान के माध्यम से ही इस बढ़ते खतरे को नियंत्रित किया जा सकता है।