संदर्भ:
हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने पश्चिमी घाट में पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र (Ecologically Sensitive Area-ESA) घोषित करने संबंधी मसौदा अधिसूचना को सातवीं बार पुनः जारी किया है। इससे पहले जारी मसौदा जुलाई 2026 में समाप्त हो गया था।
मसौदा अधिसूचना क्या है?
इस मसौदा अधिसूचना का उद्देश्य विश्व के सबसे समृद्ध जैव विविधता हॉटस्पॉट में से एक पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित कर उनका संरक्षण करना है।
अधिसूचना को अंतिम रूप दिए जाने के बाद:
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- खनन, पत्थर उत्खनन, रेत खनन, नए ताप विद्युत संयंत्र, रेड कैटेगरी के प्रदूषणकारी उद्योग और बड़ी निर्माण परियोजनाओं पर प्रतिबंध लगाया जाएगा।
- जलविद्युत परियोजनाओं और बुनियादी ढाँचा विकास जैसी गतिविधियों को विनियमित किया जाएगा।
- कृषि, बागान, बागवानी, जैविक खेती और अन्य सतत आजीविका गतिविधियों को जारी रखने की अनुमति होगी।
- खनन, पत्थर उत्खनन, रेत खनन, नए ताप विद्युत संयंत्र, रेड कैटेगरी के प्रदूषणकारी उद्योग और बड़ी निर्माण परियोजनाओं पर प्रतिबंध लगाया जाएगा।
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नवीनतम मसौदा अधिसूचना पर आम जनता से आपत्तियाँ और सुझाव प्राप्त करने के लिए 60 दिनों का समय दिया गया है। इसके बाद केंद्र सरकार अंतिम अधिसूचना जारी करने पर विचार करेगी।
इसमें गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में कुल 56,825.7 वर्ग किमी क्षेत्र को ESA के रूप में प्रस्तावित किया गया है। यह पारिस्थितिक संरक्षण और राज्यों की विकास संबंधी चिंताओं के बीच संतुलन स्थापित करने के केंद्र सरकार के प्रयासों को दर्शाता है।
प्रस्तावित ESA का विस्तार:
पश्चिमी घाट के छह राज्यों में प्रस्तावित 56,825.7 वर्ग किमी ESA का वितरण निम्नलिखित है:
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- कर्नाटक: 20,668 वर्ग किमी
- महाराष्ट्र: 17,340 वर्ग किमी
- केरल: 9,993.7 वर्ग किमी
- तमिलनाडु: 6,914 वर्ग किमी
- गोवा: 1,461 वर्ग किमी
- गुजरात: 449 वर्ग किमी
- कर्नाटक: 20,668 वर्ग किमी
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इन क्षेत्रों का निर्धारण मुख्य रूप से कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों के आधार पर किया गया है। हालाँकि, राज्यों के साथ परामर्श के बाद इनमें कुछ संशोधन भी किए गए हैं।
पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र (ESA) क्या है?
पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र (Ecologically Sensitive Area-ESA), जिसे इको-सेंसिटिव जोन (Eco-Sensitive Zone-ESZ) भी कहा जाता है, केंद्र सरकार द्वारा संरक्षित क्षेत्रों के आसपास अधिसूचित एक प्रकार का बफर क्षेत्र है।
यह संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के लिए ‘शॉक एब्जॉर्बर’ की तरह कार्य करता है। इसका उद्देश्य पर्यावरण के लिए हानिकारक मानवीय गतिविधियों से नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करते हुए सतत विकास को बढ़ावा देना है।
कानूनी एवं संस्थागत ढाँचा:
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- वैधानिक आधार: ESA/ESZ को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3(2)(v) तथा पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 के नियम 5 के तहत अधिसूचित किया जाता है।
- विस्तार: सामान्यतः राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास 10 किमी तक का क्षेत्र इको-सेंसिटिव जोन के रूप में निर्धारित किया जा सकता है। हालाँकि, पारिस्थितिक आवश्यकताओं और वन्यजीव गलियारों के आधार पर इसकी सीमा अलग-अलग हो सकती है।
- सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश (2022): सर्वोच्च न्यायालय ने देश के सभी राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास न्यूनतम 1 किमी का इको-सेंसिटिव जोन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था, जब तक कि किसी क्षेत्र की विशिष्ट परिस्थितियाँ इससे अलग व्यवस्था को उचित न ठहराएँ।
- वैधानिक आधार: ESA/ESZ को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3(2)(v) तथा पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 के नियम 5 के तहत अधिसूचित किया जाता है।
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पश्चिमी घाट के बारे में:
पश्चिमी घाट, जिसे सह्याद्रि पहाड़ियाँ भी कहा जाता है, गुजरात में ताप्ती नदी से लेकर तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक लगभग 1,600 किमी में फैला हुआ है और छह राज्यों से होकर गुजरता है।
इस क्षेत्र की प्रमुख विशेषताएँ हैं:
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- यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) है।
- यह विश्व के आठ सबसे महत्त्वपूर्ण ‘हॉटेस्ट’ जैव विविधता हॉटस्पॉट में से एक है।
- यहाँ लायन-टेल्ड मकाक (सिंह-पूंछ मकाक) और नीलगिरि तहर जैसी अनेक स्थानिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- गोदावरी, कृष्णा और कावेरी सहित प्रायद्वीपीय भारत की कई प्रमुख नदियों का उद्गम पश्चिमी घाट से होता है।
- यह दक्षिण-पश्चिम मानसून के नियमन और भारत की जल सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) है।
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हालाँकि, पश्चिमी घाट को खनन, वनों की कटाई, बागानों के विस्तार, शहरीकरण और बुनियादी ढाँचा विकास जैसी गतिविधियों से लगातार खतरा बढ़ रहा है।
पश्चिमी घाट से संबंधित प्रमुख समितियाँ:
माधव गाडगिल समिति (WGEEP), 2011
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- समिति ने संपूर्ण पश्चिमी घाट के लगभग 1,29,037 वर्ग किमी क्षेत्र को पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की।
- इसने पश्चिमी घाट को तीन पारिस्थितिक क्षेत्रों में विभाजित कर अलग-अलग स्तर के संरक्षण का प्रस्ताव दिया।
- खनन, बाँधों और उद्योगों पर कड़े प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की।
- पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण (Western Ghats Ecology Authority) स्थापित करने का सुझाव दिया।
- अत्यधिक प्रतिबंधात्मक माने जाने के कारण इसकी सिफारिशों को राज्यों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।
- समिति ने संपूर्ण पश्चिमी घाट के लगभग 1,29,037 वर्ग किमी क्षेत्र को पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की।
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कस्तूरीरंगन समिति (HLWG), 2013
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- समिति ने अपेक्षाकृत संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए पश्चिमी घाट के केवल 37% क्षेत्र, अर्थात् लगभग 56,825–60,000 वर्ग किमी प्राकृतिक भू-दृश्य, को ESA घोषित करने की सिफारिश की।
- इसने प्राकृतिक भू-दृश्य (Natural Landscape) और सांस्कृतिक भू-दृश्य (Cultural Landscape) जैसे गाँवों एवं बागानों के बीच अंतर किया।
- खनन, पत्थर उत्खनन और प्रदूषणकारी उद्योगों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव किया, जबकि कृषि और बागान गतिविधियों को जारी रखने की अनुमति देने की सिफारिश की।
- वर्तमान मसौदा अधिसूचना मुख्य रूप से इसी समिति की सिफारिशों पर आधारित है।
- समिति ने अपेक्षाकृत संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए पश्चिमी घाट के केवल 37% क्षेत्र, अर्थात् लगभग 56,825–60,000 वर्ग किमी प्राकृतिक भू-दृश्य, को ESA घोषित करने की सिफारिश की।
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संजय कुमार समिति (2022)
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- इस समिति का गठन राज्यों द्वारा उठाई गई आपत्तियों की समीक्षा के लिए किया गया।
- यह ESA को अंतिम रूप देने से पहले ग्राम-वार सीमाओं की समीक्षा और क्षेत्रीय सत्यापन से संबंधित कार्य कर रही है।
- इस समिति का गठन राज्यों द्वारा उठाई गई आपत्तियों की समीक्षा के लिए किया गया।
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महत्त्व:
प्रस्तावित ESA अधिसूचना का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करना है।
पश्चिमी घाट का संरक्षण निम्नलिखित दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है:
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- जैव विविधता संरक्षण
- जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता
- जल सुरक्षा
- पारिस्थितिक संपर्क (Ecological Connectivity)
- मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना
- जैव विविधता संरक्षण
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साथ ही, राज्यों के साथ निरंतर परामर्श पर्यावरणीय शासन में सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के महत्त्व को भी रेखांकित करता है।
निष्कर्ष:
पश्चिमी घाट ESA संबंधी मसौदा अधिसूचना का बार-बार पुनः जारी होना पारिस्थितिक संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती को दर्शाता है।
