संदर्भ:
भारत सरकार ने पुष्टि की है कि आगामी जनगणना 2027 में जाति-वार जनसंख्या का आकलन किया जाएगा। यह 1931 के बाद पहली बार होगा जब देश में सभी जातियों से संबंधित व्यापक और समग्र आंकड़े एकत्र किए जाएंगे।
जनगणना 2027 के बारे में:
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- जनगणना 2027 का आयोजन गृह मंत्रालय के अंतर्गत भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त द्वारा किया जाएगा। यह जनगणना दो चरणों में संपन्न होगी, जिसमें पहले चरण में अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच मकान सूचीकरण और आवास जनगणना के रूप में शामिल होगी तथा दूसरा चरण फरवरी 2027 से जनसंख्या गणना के रूप में प्रारंभ होगा।
- अधिकांश क्षेत्रों के लिए जनगणना की संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 निर्धारित की गई है, जबकि जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे बर्फ़ से ढके क्षेत्रों के लिए यह तिथि 1 अक्टूबर 2026 होगी। दूसरे चरण में जाति से संबंधित प्रश्नों को शामिल किए जाने की आधिकारिक सूचना राज्यसभा में दी जा चुकी है।
- जनगणना 2027 का आयोजन गृह मंत्रालय के अंतर्गत भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त द्वारा किया जाएगा। यह जनगणना दो चरणों में संपन्न होगी, जिसमें पहले चरण में अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच मकान सूचीकरण और आवास जनगणना के रूप में शामिल होगी तथा दूसरा चरण फरवरी 2027 से जनसंख्या गणना के रूप में प्रारंभ होगा।
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जनगणना 2027 की प्रमुख विशेषताएँ:
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- दो-चरणीय गणना प्रक्रिया:
- पहला चरण (मकान सूचीकरण और आवास जनगणना): इस चरण में घरों की संरचना, आवास की स्थिति, संपत्ति तथा उपलब्ध सुविधाओं से संबंधित जानकारी एकत्र की जाएगी।
- दूसरा चरण (जनसंख्या गणना): इस चरण में प्रत्येक व्यक्ति से संबंधित जनसांख्यिकीय, सामाजिक-आर्थिक तथा जातिगत विवरण दर्ज किए जाएंगे। पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जाति से जुड़े प्रश्न पहले से अधिसूचित किए जाएंगे।
- पहला चरण (मकान सूचीकरण और आवास जनगणना): इस चरण में घरों की संरचना, आवास की स्थिति, संपत्ति तथा उपलब्ध सुविधाओं से संबंधित जानकारी एकत्र की जाएगी।
- डिजिटल आधारित जनगणना:
- जनगणना 2027 भारत की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना होगी। इसमें मोबाइल एप्लिकेशन तथा ऑनलाइन स्व-गणना की सुविधा का उपयोग किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर ही कागज़ी प्रपत्रों का प्रयोग किया जाएगा।
- इस व्यापक प्रक्रिया के लिए लगभग 30 से 34 लाख कर्मियों की तैनाती की जाएगी, जिनमें गणनाकर्ता, पर्यवेक्षक और अधिकारी शामिल होंगे।
- जनगणना 2027 भारत की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना होगी। इसमें मोबाइल एप्लिकेशन तथा ऑनलाइन स्व-गणना की सुविधा का उपयोग किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर ही कागज़ी प्रपत्रों का प्रयोग किया जाएगा।
- दो-चरणीय गणना प्रक्रिया:
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जातिगत गणना का महत्व:
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- दीर्घकालिक आंकड़ों के अभाव को दूर करना: 1931 के बाद से भारत में सभी जातियों से संबंधित समग्र और विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। स्वतंत्रता के बाद की जनगणनाओं में केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आंकड़े दर्ज किए गए, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग और अन्य जातियों से संबंधित आंकड़े मुख्यतः अनुमानों पर आधारित रहे। जनगणना 2027 का उद्देश्य नीति निर्माण के लिए ठोस, प्रामाणिक और वास्तविक जातिगत आंकड़े उपलब्ध कराना है।
- नीति निर्माण और सामाजिक योजना: सटीक जातिगत आंकड़ों के आधार पर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों में तथ्य-आधारित नीतियाँ बनाना संभव होगा। इससे ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों तक सरकारी योजनाओं की बेहतर पहुँच सुनिश्चित होगी तथा सामाजिक न्याय से जुड़ी पहलों के प्रभाव का मूल्यांकन भी किया जा सकेगा।
- दीर्घकालिक आंकड़ों के अभाव को दूर करना: 1931 के बाद से भारत में सभी जातियों से संबंधित समग्र और विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। स्वतंत्रता के बाद की जनगणनाओं में केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आंकड़े दर्ज किए गए, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग और अन्य जातियों से संबंधित आंकड़े मुख्यतः अनुमानों पर आधारित रहे। जनगणना 2027 का उद्देश्य नीति निर्माण के लिए ठोस, प्रामाणिक और वास्तविक जातिगत आंकड़े उपलब्ध कराना है।
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चुनौतियाँ और विचारणीय बिंदु:
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- कार्यप्रणाली पर बहस:
- यह प्रश्न उठ रहे हैं कि जाति की पहचान केवल स्व-घोषणा के आधार पर की जाएगी या किसी प्रकार का सत्यापन भी किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं में जातियों के अलग-अलग नामों को दर्ज करना भी एक प्रमुख चुनौती है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की है कि केवल स्व-घोषणा से पूर्ण सटीकता सुनिश्चित नहीं हो सकती, जिससे मजबूत पद्धतिगत सुरक्षा उपायों की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
- यह प्रश्न उठ रहे हैं कि जाति की पहचान केवल स्व-घोषणा के आधार पर की जाएगी या किसी प्रकार का सत्यापन भी किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं में जातियों के अलग-अलग नामों को दर्ज करना भी एक प्रमुख चुनौती है।
- राजनीतिक और सामाजिक विमर्श:
- इस घोषणा के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक बहस शुरू हो गई है। जातिगत प्रश्नों की रूपरेखा और गणना पद्धति पर अधिक परामर्श की मांग की जा रही है, क्योंकि जातिगत आंकड़ों के संभावित राजनीतिक उपयोग को लेकर भी चिंताएँ व्यक्त की जा रही हैं।
- इस घोषणा के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक बहस शुरू हो गई है। जातिगत प्रश्नों की रूपरेखा और गणना पद्धति पर अधिक परामर्श की मांग की जा रही है, क्योंकि जातिगत आंकड़ों के संभावित राजनीतिक उपयोग को लेकर भी चिंताएँ व्यक्त की जा रही हैं।
- कार्यप्रणाली पर बहस:
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निष्कर्ष:
जनगणना 2027, जो भारत की 16वीं दशकीय जनगणना होगी, लगभग एक सदी बाद देश के जनसांख्यिकीय अभिलेखों में व्यापक जातिगत आंकड़ों को शामिल करने का एक ऐतिहासिक प्रयास है। डिजिटल तकनीक और चरणबद्ध, सुव्यवस्थित प्रक्रिया के माध्यम से यह जनगणना विश्वसनीय और सूक्ष्म स्तर के आंकड़े उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखती है। इसकी सफलता पद्धतिगत स्पष्टता, जनविश्वास और इन आंकड़ों के प्रभावी उपयोग पर निर्भर करेगी, ताकि नीति निर्माण, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास को वास्तविक मजबूती मिल सके।

