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Blog / 11 Apr 2026

CBSE त्रि-भाषा सूत्र 2026: NEP 2020, विवाद और विश्लेषण

संदर्भ:

हाल ही में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 6 के लिए 'त्रि-भाषा सूत्र' को अनिवार्य रूप से लागू करने की घोषणा की है।

त्रि-भाषा सूत्र क्या है?

त्रि-भाषा सूत्र की अवधारणा सर्वप्रथम 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में पेश की गई थी। वर्तमान में, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत इसे पुनर्जीवित किया गया है। इसके मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं:

·        कक्षा 6 से 10 तक: छात्रों को तीन भाषाएँ पढ़नी होंगी।

·        भारतीय भाषाओं को प्रधानता: इन तीन में से कम से कम दो भाषाएँ भारतीय मूल की होनी चाहिए।

·        विकल्प: राज्यों और छात्रों को भाषा चुनने की स्वतंत्रता है, बशर्ते वे दो भारतीय भाषाओं के नियम का पालन करें।

त्रि-भाषा सूत्र को लेकर विवाद क्यों है?

दक्षिण भारतीय राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु और कर्नाटक, ने इस नीति का कड़ा विरोध किया है। उनके तर्क निम्नलिखित बिंदुओं पर आधारित हैं:

द्वि-भाषा बनाम त्रि-भाषा नीति:
तमिलनाडु 1968 से 'द्वि-भाषा नीति' (तमिल और अंग्रेजी) का पालन कर रहा है। उनके अनुसार, तीसरी भाषा का बोझ छात्रों पर अतिरिक्त मानसिक दबाव डालता है और यह उनकी क्षेत्रीय पहचान (भाषाई गौरव) के विरुद्ध है।

पारस्परिकता का अभाव (Lack of Reciprocity):
विवाद का एक बड़ा कारण यह है कि जहाँ गैर-हिंदी भाषी राज्यों के छात्रों को अक्सर तीसरी भाषा के रूप में हिंदी सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, वहीं हिंदी भाषी राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार) में दक्षिण भारतीय भाषाओं (जैसे तमिल, तेलुगु, कन्नड़) को शायद ही कभी अनिवार्य किया जाता हो।

उत्तर भारत के अधिकांश स्कूल तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत को चुनते हैं, जिससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मूल उद्देश्य विफल हो जाता है।

संरचनात्मक लाभ:
आलोचकों का तर्क है कि यह नीति हिंदी भाषियों को अनुचित लाभ देती है। उन्हें केवल दो मुख्य भाषाएँ (हिंदी और अंग्रेजी) सीखनी पड़ती हैं, जबकि गैर-हिंदी भाषियों को अपनी मातृभाषा और अंग्रेजी के अलावा एक तीसरी भाषा (अक्सर हिंदी) सीखने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

संसाधनों की कमी:
कई राज्यों का तर्क है कि स्कूलों में दक्षिण भारतीय या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को पढ़ाने के लिए शिक्षकों और बुनियादी ढांचे की भारी कमी है, जिससे अंततः छात्रों के पास 'हिंदी' को ही चुनने का एकमात्र विकल्प बचता है।

संवैधानिक और संघीय ढांचा-

अनुच्छेद 343: संघ की आधिकारिक भाषा हिंदी (देवनागरी लिपि) होगी।

अनुच्छेद 351: केंद्र सरकार का कर्तव्य है कि वह हिंदी भाषा के प्रसार को बढ़ावा दे ताकि यह भारत की मिश्रित संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।

शिक्षा का अधिकार: शिक्षा 'समवर्ती सूची' (Concurrent List) का विषय है, जिससे केंद्र और राज्य दोनों को कानून बनाने का अधिकार है। हालांकि, राज्यों का मानना है कि केंद्र वित्तीय लाभों (जैसे समग्र शिक्षा निधि) का उपयोग कर अपनी भाषाई नीतियों को जबरन लागू कर रहा है।

आगे की राह:

त्रि-भाषा सूत्र का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता और बहुभाषावाद को बढ़ावा देना है, किंतु इसकी सफलता के लिए संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

बहुभाषावाद को बढ़ावा देने हेतु हिंदी भाषी राज्यों में भी दक्षिण भारतीय भाषाओं को पढ़ाने के ठोस प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि पारस्परिकता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भावना विकसित हो सके।

राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान करते हुए केंद्र को एक ही नियम सबके लिएकी नीति के बजाय विभिन्न राज्यों की भाषाई विविधता और संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखना चाहिए।

भाषा शिक्षण को अनिवार्यता के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय इसे एक उपयोगी कौशल और अवसर के रूप में बढ़ावा देना चाहिए, जिससे छात्र स्वेच्छा और रुचि के साथ विभिन्न भाषाओं को सीखने के लिए प्रेरित हों।

निष्कर्ष:

भारत जैसे विविधता वाले देश में भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं बल्कि पहचान का प्रतीक है। भाषाई नीति को लागू करते समय 'सहकारी संघवाद' की भावना सर्वोपरि होनी चाहिए।