संदर्भ:
आईआईटी गांधीनगर के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, कावेरी बेसिन को 2026 से 2050 के बीच 3.5% जल की कमी का सामना करना पड़ सकता है। यह रिपोर्ट अर्थ्स फ्यूचर (Earth’s Future) नामक जर्नल में प्रकाशित हुई है। यह निष्कर्ष विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की अधिकांश नदियों में जलवायु परिवर्तन के कारण जल प्रवाह बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
कावेरी बेसिन के बारे में:
कावेरी बेसिन दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण नदी बेसिनों में से एक है। इस नदी का उद्गम पश्चिमी घाट में स्थित तलाकावेरी (Talakaveri) से होता है। इसके बाद यह कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के कुछ हिस्सों से होकर बहती हुई बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) में जाकर मिलती है।
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- बेसिन का क्षेत्रफल: लगभग 81,155 वर्ग किलोमीटर
- मुख्य सहायक नदियाँ: हेमावती, कबिनी, भवानी और अमरावती
- मुख्य बांध: कृष्णराजसागर बांध और मेट्टूर बांध
- बेसिन का क्षेत्रफल: लगभग 81,155 वर्ग किलोमीटर
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यह बेसिन सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी से उपजाऊ कावेरी डेल्टा बनता है, जिसे तमिलनाडु का “चावल का कटोरा” भी कहा जाता है।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष:
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- अध्ययन के अनुसार, कावेरी बेसिन में 1951 से 2012 के बीच नदी के जल प्रवाह में लगभग 28% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। शोध में यह भी अनुमान लगाया गया है कि भविष्य में भी इसमें और कमी आ सकती है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर वर्षा में बढ़ोतरी की प्रवृत्ति देखी जा रही है।
- शोधकर्ताओं ने CMIP6 (युग्मित मॉडल अंतर-तुलना परियोजना चरण 6) के अंतर्गत विकसित सीमित जलवायु मॉडलों का उपयोग किया। इन मॉडलों के आधार पर यह पाया गया कि जहाँ गंगा नदी, जैसी नदियों में जल प्रवाह बढ़ सकता है, वहीं कावेरी बेसिन में निकट और मध्यम अवधि में जल संकट बढ़ने की आशंका है।
- अध्ययन के अनुसार, कावेरी बेसिन में 1951 से 2012 के बीच नदी के जल प्रवाह में लगभग 28% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। शोध में यह भी अनुमान लगाया गया है कि भविष्य में भी इसमें और कमी आ सकती है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर वर्षा में बढ़ोतरी की प्रवृत्ति देखी जा रही है।
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भारत के लिए इसके प्रभाव:
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- इस अध्ययन के निष्कर्ष भारत की जल सुरक्षा (Water Security) और अंतर-राज्यीय संबंधों के लिए गंभीर संकेत देते हैं। कावेरी नदी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से विवाद चलता रहा है। इसी कारण कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal) का गठन किया गया था और बाद में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2018 में अपना निर्णय देते हुए जल बँटवारे के संबंध में राज्यों के हिस्से निर्धारित किए थे। यदि जल उपलब्धता में और कमी आती है, तो विशेषकर सूखे के वर्षों में ऐसे विवाद और अधिक गंभीर हो सकते हैं।
- इसके अलावा, यह बेसिन दक्षिण भारत में कृषि, पीने के पानी की आपूर्ति और आजीविका का आधार है। पानी के बहाव में कमी से फ़सलों की पैदावार, शहरी जल आपूर्ति (जैसे बेंगलुरु) और पारिस्थितिक संतुलन पर असर पड़ सकता है। यह अध्ययन नदी-जोड़ो परियोजनाओं पर भी चर्चा को फिर से शुरू करता है, जैसे कि प्रस्तावित गोदावरी-कावेरी लिंक परियोजना; हालाँकि, पारिस्थितिक और आर्थिक चिंताओं के कारण ऐसे समाधानों पर अभी भी बहस जारी है।
- इस अध्ययन के निष्कर्ष भारत की जल सुरक्षा (Water Security) और अंतर-राज्यीय संबंधों के लिए गंभीर संकेत देते हैं। कावेरी नदी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से विवाद चलता रहा है। इसी कारण कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal) का गठन किया गया था और बाद में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2018 में अपना निर्णय देते हुए जल बँटवारे के संबंध में राज्यों के हिस्से निर्धारित किए थे। यदि जल उपलब्धता में और कमी आती है, तो विशेषकर सूखे के वर्षों में ऐसे विवाद और अधिक गंभीर हो सकते हैं।
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अध्ययन में उजागर की गई चुनौतियाँ:
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- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों में क्षेत्रीय असमानता
- वर्षा के भविष्य के अनुमान को लेकर अनिश्चितता
- सीमित जल संसाधनों पर बढ़ती मांग
- पहले से मौजूद अंतर-राज्यीय विवाद और प्रशासनिक/शासन संबंधी समस्याएँ
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों में क्षेत्रीय असमानता
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आगे की राह:
कावेरी बेसिन में बढ़ते जल संकट से निपटने के लिए भारत को एक बहुआयामी रणनीति अपनानी चाहिए। इसमें कृषि में जल-उपयोग की दक्षता में सुधार करना, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना, बेसिन-स्तर पर जल-प्रशासन को मज़बूत करना और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाना शामिल है। इसके अलावा, बेहतर योजना बनाने के लिए जलवायु मॉडलिंग और डेटा-आधारित नीति-निर्माण में वैज्ञानिक प्रगति अत्यंत महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष:
कावेरी बेसिन में जल उपलब्धता में संभावित गिरावट यह दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव सभी क्षेत्रों में समान नहीं होते। यह स्थिति सहकारी संघवाद, सतत जल प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन रणनीतियों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।
