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Blog / 24 Feb 2026

केस स्टडी: लोक प्रशासन में राजनीतिक–प्रशासनिक टकराव

केस संदर्भ: 

कैथल, हरियाणा में आयोजित एक जन-शिकायत निवारण बैठक के दौरान राज्य के ऊर्जा मंत्री और पुलिस अधीक्षक (एसपी) के बीच मतभेद सामने आया। ऊर्जा मंत्री ने सार्वजनिक रूप से अधिकारी से कहा कि अगर आपके पास कोई शक्ति नहीं है तो चले जाइए,” जिससे प्रशासनिक मर्यादा, अधिकार और नैतिक आचरण को लेकर प्रश्न उठे। यह घटना दिखाती है कि शासन के दबावपूर्ण वातावरण में राजनीतिक कार्यपालिका और स्थायी कार्यपालिका के बीच किस प्रकार तनाव उत्पन्न हो सकता है।

संबंधित पक्ष (स्टेकहोल्डर्स):

      • ऊर्जा मंत्री (राजनीतिक कार्यपालिका)
      • पुलिस अधीक्षक (स्थायी कार्यपालिका)
      • जन-शिकायत बैठक में उपस्थित नागरिक
      • राज्य प्रशासन
      • सार्वजनिक संस्थाएँ और लोकतांत्रिक शासन तंत्र
      • आम जनता (जिसका शासन पर विश्वास प्रभावित हो सकता है)

उत्पन्न नैतिक मुद्दे:

      • सार्वजनिक पद के अधिकार का दुरुपयोग या अनुचित प्रयोग
      • पेशेवर गरिमा और आपसी सम्मान का उल्लंघन
      • सार्वजनिक व्यवहार में भावनात्मक बुद्धिमत्ता की कमी
      • राजनीतिक निगरानी और प्रशासनिक स्वायत्तता के बीच टकराव
      • संस्थागत असहमति की नकारात्मक सार्वजनिक छवि
      • सिविल सेवाओं के मनोबल पर प्रभाव
      • शासन व्यवस्था में जनता के विश्वास का कमजोर होना

Haryana minister Anil Vij orders suspension of cop after fiery clash with Kaithal  SP

राजनीतिक कार्यपालिका बनाम स्थायी कार्यपालिका:

राजनीतिक और स्थायी कार्यपालिका के बीच टकराव उनके अलग-अलग दायित्वों और वैधता के स्रोतों के कारण उत्पन्न होता है:

      • लोकतांत्रिक जवाबदेही बनाम प्रशासनिक निष्पक्षता: मंत्री जनता द्वारा चुने जाते हैं और मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी होते हैं, जबकि सिविल सेवकों को राजनीतिक रूप से निष्पक्ष रहकर संवैधानिक मानदंडों का पालन करना होता है।
      • राजनीतिक जनादेश बनाम नियम-आधारित शासन: राजनीतिक नेता चुनावी वादों को लागू करने पर जोर देते हैं, जिसके लिए अक्सर लचीलापन आवश्यक होता है; जबकि प्रशासनिक अधिकारी स्थापित नियमों और विधि-प्रक्रिया का पालन करते हैं ताकि कानून और न्याय सुनिश्चित हो सके।
      • त्वरित निर्णय बनाम प्रक्रियागत शुचिता: राजनीतिक नेतृत्व जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए शीघ्र निर्णय चाहता है, जबकि प्रशासनिक अधिकारी सत्यापन और नियमों के अनुपालन के लिए समय लेते हैं।
      • अधिकार बनाम पेशेवर ईमानदारी: मंत्री राजनीतिक अधिकार का प्रयोग करते हैं, जबकि सिविल सेवकों की जिम्मेदारी है कि वे पेशेवर ईमानदारी बनाए रखते हुए निष्पक्ष सलाह दें, चाहे वह राजनीतिक इच्छा से अलग क्यों न हो।

 नैतिक विश्लेषण:

      • अरस्तू का मध्यम मार्ग का सिद्धांत”: ऊर्जा मंत्री की सार्वजनिक टिप्पणी अत्यधिक कठोरता को दर्शाती है, जबकि नैतिक शासन में संयम और संतुलन आवश्यक है।
      • धर्म’ (भारतीय नैतिक परंपरा): सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्तियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने आचरण में मर्यादा और संयम रखें।
      • भावनात्मक बुद्धिमत्ता: संतुलित और संयमित संवाद ही विवाद समाधान और संस्थागत सौहार्द बनाए रख सकता है।
      • मैक्स वेबर की प्रशासनिक नैतिकता: सिविल सेवक तर्कसंगत-कानूनी अधिकार के अधीन कार्य करते हैं, जहाँ प्रक्रियाओं और नियमों का सम्मान आवश्यक है।

संभावित समाधान के कदम:

      • सार्वजनिक मंच पर सदैव पेशेवर व्यवहार और संयम बनाए रखना।
      • मतभेदों को सार्वजनिक टकराव के बजाय संस्थागत माध्यमों से सुलझाना।
      • दोनों पक्षों के लिए भावनात्मक बुद्धिमत्ता और नैतिक नेतृत्व का प्रशिक्षण सुनिश्चित करना।
      • जन-शिकायत बैठकों में स्पष्ट संवाद और आचरण के प्रोटोकॉल विकसित करना।
      • राजनीतिक नेतृत्व और सिविल सेवकों के बीच आपसी सम्मान को बढ़ावा देना।

आगे की राह: 

      • सार्वजनिक अधिकारियों के लिए नैतिकता-आधारित प्रशिक्षण को संस्थागत रूप देना।
      • सार्वजनिक पदधारकों के लिए आचार संहिता को और मजबूत बनाना।
      • सहयोगात्मक शासन मॉडल को बढ़ावा देना।
      • प्रशासनिक ढाँचे में प्रभावी विवाद-निवारण तंत्र विकसित करना।

निष्कर्ष:

      • कैथल की यह घटना बताती है कि लोक प्रशासन में संयम, मर्यादा और पेशेवर आचरण कितना आवश्यक है। राजनीतिक और स्थायी कार्यपालिका के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उन्हें किस प्रकार सुलझाया जाता है, यही संस्थाओं की विश्वसनीयता तय करता है। जैसा कि ड्वाइट डी. आइजनहावर ने कहा था, “नेतृत्व वह कला है जिसमें आप किसी व्यक्ति से वह काम कराते हैं जो आप चाहते हैं, लेकिन वह व्यक्ति उस काम को अपनी इच्छा से करे।नैतिक शासन केवल अधिकार चलाने का नाम नहीं है, बल्कि सम्मान, संयम और संस्थागत ईमानदारी के माध्यम से सहयोग उत्पन्न करने की प्रक्रिया है।
      • लोक प्रशासन में राजनीतिक और स्थायी कार्यपालिका के बीच असहमति होना स्वाभाविक है, परंतु उसका समाधान भावनात्मक संतुलन, आपसी सम्मान और संवैधानिक नैतिकता के आधार पर होना चाहिए। जैसा कि कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में कहा है, शासन की वास्तविक शक्ति बल प्रयोग में नहीं, बल्कि धर्मसम्मत आचरण में निहित होती है।
      • अंततः लोकतंत्र तभी सफल है जब अधिकार के साथ विनम्रता जुड़ी हो, टकराव की जगह संवाद ले और सार्वजनिक पद को शक्ति प्रदर्शन नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी के रूप में निभाया जाए।