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Blog / 09 Mar 2026

BEL ने VLEO संचालन के लिए उपग्रह प्रणालियों के विकास हेतु Bellatrix Aerospace के साथ समझौता किया

संदर्भ:

हाल ही में भारत के रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रम भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने बेंगलुरु स्थित अंतरिक्ष-प्रौद्योगिकी स्टार्टअप बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस (Bellatrix Aerospace) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का उद्देश्य वेरी लो अर्थ ऑर्बिट (VLEO) संचालन के लिए उपग्रह प्रणालियों और पेलोड का संयुक्त रूप से डिजाइन, विकास और निर्माण करना है।

वेरी लो अर्थ ऑर्बिट (VLEO) के बारे में:

      • वेरी लो अर्थ ऑर्बिट (VLEO) उन उपग्रहों को संदर्भित करता है जो पृथ्वी से लगभग 150 किमी से 450 किमी की ऊँचाई पर संचालित होते हैं।
      • यह कक्षा पारंपरिक लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) से नीचे होती है, जहाँ सामान्यतः उपग्रह 500 किमी से 2000 किमी की ऊँचाई पर कार्य करते हैं।

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प्रमुख विशेषताएँ:

      • वायुमंडलीय घर्षण (Atmospheric Drag): VLEO में उपग्रहों को वायुमंडल के पतले कणों का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी गति धीमी होती है और कक्षा में बने रहने के लिए निरंतर प्रणोदन (propulsion) की आवश्यकता होती है।
      • उन्नत प्रणोदन प्रणाली: इस घर्षण का मुकाबला करने और कक्षा बनाए रखने के लिए इलेक्ट्रिक या ग्रीन प्रोपल्शन तकनीक का उपयोग किया जाता है।
      • पृथ्वी के निकटता: पृथ्वी के अधिक निकट होने के कारण उपग्रह उच्च गुणवत्ता की निगरानी और तेज संचार संकेत प्रदान कर सकते हैं।

VLEO उपग्रह प्रणालियों के लाभ:

      • उच्च-रिज़ॉल्यूशन पृथ्वी अवलोकन: VLEO में संचालित उपग्रह अत्यंत उच्च गुणवत्ता की तस्वीरें ले सकते हैं, जिससे निम्न क्षेत्रों में बेहतर निगरानी संभव होती है:
        • सीमा निगरानी
        • आपदा प्रबंधन
        • कृषि निगरानी
      • अति-निम्न संचार विलंबता (Ultra-Low Latency): ग्राउंड स्टेशन से कम दूरी के कारण डेटा का तेजी से आदान-प्रदान संभव होता है, जो निम्न के लिए महत्वपूर्ण है:
        • वास्तविक समय संचार
        • रक्षा संचालन
        • ब्रॉडबैंड सैटेलाइट नेटवर्क

कम प्रक्षेपण लागत:

कम कक्षीय ऊँचाई के कारण उपग्रह को स्थापित करने के लिए कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिससे प्रक्षेपण लागत कम हो सकती है।

अंतरिक्ष मलबे में कमी

VLEO कक्षाओं को कभी-कभीस्वच्छ कक्षा (Self-Cleaning Orbit)” भी कहा जाता है।
यदि कोई उपग्रह निष्क्रिय हो जाए, तो वायुमंडलीय घर्षण के कारण वह शीघ्र ही पृथ्वी के वायुमंडल में पुनः प्रवेश कर जल जाता है, जिससे दीर्घकालिक अंतरिक्ष मलबा कम होता है।

संबंधित संगठनों के बारे में:

      • भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL):
        • रक्षा मंत्रालय के अधीन एक नवरत्न रक्षा सार्वजनिक उपक्रम (PSU)
        • उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, रडार, संचार प्रणालियों और रक्षा उपकरणों में विशेषज्ञता
        • हाल के वर्षों में अंतरिक्ष और उपग्रह प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विस्तार
      • बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस (Bellatrix Aerospace):
        • वर्ष 2015 में स्थापित बेंगलुरु स्थित डीप-टेक अंतरिक्ष स्टार्टअप
        • उपग्रह प्रणोदन प्रणालियों और इन-ऑर्बिट मोबिलिटी समाधानों पर केंद्रित
        • छोटे उपग्रहों के लिए इलेक्ट्रिक और ग्रीन प्रोपल्शन तकनीक विकसित करने के लिए प्रसिद्ध

भारत के लिए महत्व:

यह साझेदारी भारत के अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

      • अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा: उपग्रह निर्माण और प्रणोदन तकनीक में स्वदेशी क्षमताओं को सुदृढ़ करेगा।
      • रक्षा और रणनीतिक क्षमताओं को मजबूती: उच्च-रिज़ॉल्यूशन निगरानी उपग्रह सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा में सहायता कर सकते हैं।
      • अगली पीढ़ी की उपग्रह तकनीकों का विकास: भारत को तेजी से उभरते VLEO उपग्रह बाजार में महत्वपूर्ण स्थान दिला सकता है।
      • अंतरिक्ष क्षेत्र में सार्वजनिकनिजी सहयोग: यह साझेदारी भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधारों के बाद PSU और स्टार्टअप्स के बीच बढ़ते सहयोग को दर्शाती है।

निष्कर्ष:

भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस के बीच यह सहयोग वेरी लो अर्थ ऑर्बिट (VLEO) उपग्रह तकनीक में भारत की क्षमताओं को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड की रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स विशेषज्ञता और बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस की उन्नत प्रणोदन तकनीक के संयोजन से भारत रक्षा, संचार और पृथ्वी अवलोकन मिशनों के लिए किफायती और उच्च प्रदर्शन वाले उपग्रह प्लेटफॉर्म विकसित कर सकता है।