चर्चा में क्यों?
हाल ही में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने अपनी पहली आधिकारिक चीन यात्रा के दौरान तीस्ता नदी समग्र प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना (Teesta River Comprehensive Management and Restoration Project-TRCMRP) के लिए चीन से सहयोग का अनुरोध किया। यह परियोजना लंबे समय से लंबित है और बांग्लादेश के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
तीस्ता नदी समग्र प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना (TRCMRP) के बारे में
लगभग 1 अरब अमेरिकी डॉलर की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना को चीन की सरकारी कंपनी पावरचाइना के तकनीकी सहयोग से विकसित किया जा रहा है।
परियोजना के प्रमुख घटक
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- नदी के प्रवाह (River Training) एवं चैनल का स्थिरीकरण।
- लगभग 114 किमी लंबे तटबंधों (Embankments) का निर्माण।
- नदी की बड़े पैमाने पर ड्रेजिंग (गाद निकालना)।
- निकाली गई गाद से भूमि का पुनरुद्धार (Land Reclamation)।
- बाढ़ नियंत्रण संबंधी अवसंरचना का विकास।
- सिंचाई सुविधाओं का विस्तार।
- अंतर्देशीय जल परिवहन (Navigation) में सुधार।
- कटावग्रस्त नदी तटों का पुनर्स्थापन।
- नदी के प्रवाह (River Training) एवं चैनल का स्थिरीकरण।
परियोजना के अंतर्गत वर्तमान में लगभग 3 किमी चौड़ी प्राकृतिक बहुधारात्मक (Braided) नदी को नियंत्रित घुमावदार (Meandering) चैनल में परिवर्तित करते हुए इसकी चौड़ाई लगभग 1 किमी तक सीमित करने का प्रस्ताव है।
परियोजना के उद्देश्य:
बांग्लादेश सरकार के अनुसार इस परियोजना से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होंगे-
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- नदी तटों के कटाव में कमी।
- बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करना।
- सिंचाई क्षेत्र का विस्तार।
- शुष्क मौसम में जल उपलब्धता बढ़ाना।
- अंतर्देशीय जल परिवहन को सुदृढ़ करना।
- लगभग 170 वर्ग किमी भूमि का पुनरुद्धार।
- क्षेत्रीय आर्थिक विकास को बढ़ावा देना।
- नदी तटों के कटाव में कमी।
भारत-बांग्लादेश तीस्ता जल विवाद:
तीस्ता नदी भारत और बांग्लादेश के बीच सबसे विवादास्पद अंतर-सीमावर्ती (Transboundary) नदियों में से एक है।
पृष्ठभूमि
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- भारत और बांग्लादेश के बीच लगभग 54 नदियाँ साझा हैं।
- दोनों देशों ने वर्ष 1972 में संयुक्त नदी आयोग (Joint Rivers Commission-JRC) की स्थापना की।
- वर्ष 2011 में तीस्ता जल बँटवारा समझौते (Teesta Water Sharing Agreement) का मसौदा तैयार किया गया।
- हालांकि, पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा किसानों के लिए जल उपलब्धता संबंधी आपत्तियों के कारण यह समझौता अब तक हस्ताक्षरित नहीं हो सका है।
- भारत और बांग्लादेश के बीच लगभग 54 नदियाँ साझा हैं।
बांग्लादेश की चिंताएँ
बांग्लादेश का तर्क है कि-
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- शुष्क मौसम में जल की उपलब्धता में भारी गिरावट आई है।
- भारत के गजलडोबा बैराज (Gazaldoba Barrage) पर जल मोड़ने से निचले क्षेत्रों में नदी का प्रवाह काफी कम हो गया है।
- शुष्क मौसम के दौरान नदी का प्रवाह, जो 1990 के दशक में लगभग 10,000 क्यूसेक था, कुछ वर्षों में घटकर केवल कुछ सौ क्यूसेक रह गया है।
- जल प्रवाह में कमी से कृषि, मत्स्य पालन और स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित हुई है।
- शुष्क मौसम में जल की उपलब्धता में भारी गिरावट आई है।
भारत की चिंताएँ:
भारत का कहना है कि-
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- उत्तर बंगाल में जल की मांग लगातार बढ़ी है।
- भारत की संघीय व्यवस्था के अनुसार राज्य सरकार की सहमति आवश्यक है।
- जलवायु परिवर्तन एवं जलवैज्ञानिक (Hydrological) कारणों से स्वयं नदी का प्रवाह भी कम हुआ है।
- सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के निकट चीन की भागीदारी भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से चिंता का विषय है।
- उत्तर बंगाल में जल की मांग लगातार बढ़ी है।
आगे की राह-
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- भारत और बांग्लादेश के बीच निष्पक्ष एवं टिकाऊ तीस्ता जल बँटवारा समझौता संपन्न किया जाए।
- संयुक्त नदी आयोग (JRC) को अधिक प्रभावी बनाया जाए।
- एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन (Integrated River Basin Management-IRBM) को अपनाया जाए।
- पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभावों का पारदर्शी आकलन सुनिश्चित किया जाए।
- स्थानीय समुदायों एवं विशेषज्ञों के साथ व्यापक परामर्श किया जाए।
- अत्यधिक संरचनात्मक निर्माण की बजाय प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-based Solutions) को प्राथमिकता दी जाए।
- बाढ़ पूर्वानुमान, तलछट (Sediment) प्रबंधन एवं जलवायु अनुकूलन में भारत-बांग्लादेश सहयोग बढ़ाया जाए।
- यह सुनिश्चित किया जाए कि अवसंरचना परियोजनाएँ आर्थिक रूप से व्यवहार्य, पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ तथा भू-राजनीतिक दृष्टि से संतुलित हों।
- भारत और बांग्लादेश के बीच निष्पक्ष एवं टिकाऊ तीस्ता जल बँटवारा समझौता संपन्न किया जाए।
निष्कर्ष:
तीस्ता अब केवल भारत और बांग्लादेश के बीच साझा नदी नहीं रह गई है, बल्कि यह सीमापार जल शासन (Transboundary Water Governance), पर्यावरणीय स्थिरता, घरेलू राजनीति तथा इंडो-पैसिफिक भू-राजनीति के संगम का केंद्र बन चुकी है। जहाँ एक ओर बांग्लादेश चीन के सहयोग से तीस्ता पुनर्स्थापन परियोजना के माध्यम से विकास को गति देना चाहता है, वहीं दूसरी ओर जल बँटवारे का अनसुलझा मुद्दा, पारिस्थितिक चिंताएँ और सामरिक प्रतिस्पर्धा इस विषय को और जटिल बनाती हैं। इसलिए, दीर्घकालिक समाधान केवल इंजीनियरिंग परियोजनाओं में नहीं, बल्कि न्यायसंगत जल कूटनीति, पारिस्थितिक संरक्षण तथा सतत क्षेत्रीय सहयोग में निहित है।

