संदर्भ:
हाल ही में बांग्लादेश ने पद्मा नदी (बांग्लादेश में गंगा) के प्रवाह को नियंत्रित करने और मौसमी जल संकट से निपटने के लिए पद्मा बैराज परियोजना के निर्माण को मंजूरी दी है।
पृष्ठभूमि:
यह परियोजना ऐसे समय में सामने आई है जब बांग्लादेश ने शुष्क मौसम में गंगा नदी के जल प्रवाह में कमी को लेकर कई बार चिंता जताई है। बांग्लादेश इस कमी का एक कारण भारत के फरक्का बैराज के संचालन को मानता है। यह मुद्दा 1996 की गंगा जल संधि से जुड़ा है, जो दोनों देशों के बीच जल बंटवारे को नियंत्रित करती है और दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है। वर्तमान में इस संधि की समीक्षा की जा रही है, जिससे सीमा-पार जल बंटवारा एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मुद्दा बन गया है।
परियोजना की मुख्य विशेषताएँ:
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- पद्मा बैराज का उद्देश्य शुष्क मौसम में जल उपलब्धता बढ़ाना, सिंचाई को बेहतर बनाना, भूजल पर निर्भरता कम करना और जल सुरक्षा को मजबूत करना है। प्रस्तावित 2.1 किलोमीटर लंबा बैराज भारत के पश्चिम बंगाल स्थित फरक्का बैराज से लगभग 180 किलोमीटर नीचे की ओर बनाया जाएगा।
- इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 50,443 करोड़ टका (लगभग ₹39,170 करोड़) है और इसे सात वर्षों में पूरा किया जाएगा। इसके तहत लगभग 2,900 मिलियन घन मीटर पानी संग्रहित किया जा सकेगा और इससे दक्षिण-पश्चिम तथा उत्तरी बांग्लादेश के लगभग 6.5 करोड़ लोगों को लाभ मिलेगा।
- पद्मा बैराज का उद्देश्य शुष्क मौसम में जल उपलब्धता बढ़ाना, सिंचाई को बेहतर बनाना, भूजल पर निर्भरता कम करना और जल सुरक्षा को मजबूत करना है। प्रस्तावित 2.1 किलोमीटर लंबा बैराज भारत के पश्चिम बंगाल स्थित फरक्का बैराज से लगभग 180 किलोमीटर नीचे की ओर बनाया जाएगा।
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पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक चिंताएँ:
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- विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े बैराज प्राकृतिक नदी प्रवाह और भूजल प्रणालियों को बाधित कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन भविष्य में जल प्रवाह को और अधिक अनिश्चित बना सकता है, जिससे ऐसे प्रोजेक्ट्स का दीर्घकालिक लाभ सीमित हो सकता है।
- यह परियोजना रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत के निकट स्थित है और इसमें विदेशी (संभवतः चीन सहित) सहायता की संभावना है। यह भारत और बांग्लादेश के बीच भविष्य के जल-बंटवारे वार्तालापों को प्रभावित कर सकती है।
- विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े बैराज प्राकृतिक नदी प्रवाह और भूजल प्रणालियों को बाधित कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन भविष्य में जल प्रवाह को और अधिक अनिश्चित बना सकता है, जिससे ऐसे प्रोजेक्ट्स का दीर्घकालिक लाभ सीमित हो सकता है।
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भारत पर प्रभाव:
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- शुष्क मौसम में गंगा के जल प्रवाह में कमी आ सकती है।
- जल बंटवारे को लेकर तनाव बढ़ सकता है।
- गंगा जल संधि के नवीनीकरण पर बातचीत प्रभावित हो सकती है।
- फरक्का बैराज की जल योजना पर असर पड़ सकता है।
- सीमा और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ बढ़ सकती हैं।
- बांग्लादेश के साथ अधिक बातचीत और सहयोग की आवश्यकता होगी।
- शुष्क मौसम में गंगा के जल प्रवाह में कमी आ सकती है।
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बांग्लादेश के लिए महत्व:
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- जल सुरक्षा
- शुष्क मौसम में जल उपलब्धता बढ़ेगी।
- भूजल दोहन पर निर्भरता कम होगी।
- शुष्क मौसम में जल उपलब्धता बढ़ेगी।
- कृषि लाभ
- सिंचाई और फसल उत्पादन को समर्थन मिलेगा।
- सूखे की परिस्थितियों से निपटने की क्षमता बढ़ेगी।
- सिंचाई और फसल उत्पादन को समर्थन मिलेगा।
- बाढ़ प्रबंधन
- नदी प्रवाह को नियंत्रित करने और मौसमी बाढ़ को प्रबंधित करने में मदद मिलेगी।
- नदी प्रवाह को नियंत्रित करने और मौसमी बाढ़ को प्रबंधित करने में मदद मिलेगी।
- रणनीतिक महत्व
- बांग्लादेश को अपने जल संसाधनों पर अधिक नियंत्रण मिलेगा।
- अंतरराष्ट्रीय जल वार्ताओं में उसकी स्थिति मजबूत होगी।
- बांग्लादेश को अपने जल संसाधनों पर अधिक नियंत्रण मिलेगा।
- जल सुरक्षा
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निष्कर्ष:
पद्मा बैराज परियोजना बांग्लादेश की बढ़ती जल सुरक्षा चुनौतियों से निपटने और बदलती जल-भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल होने का प्रयास है। यह परियोजना सामाजिक-आर्थिक लाभ प्रदान कर सकती है, लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक चिंताएँ भी जुड़ी हैं। इसकी सफलता सतत नदी प्रबंधन, क्षेत्रीय सहयोग और भारत-बांग्लादेश के बीच संतुलित जल-बंटवारे समझौतों पर निर्भर करेगी।

