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Blog / 30 Oct 2026

बद्रीनाथ में लटकते ग्लेशियरों से खतरा

संदर्भ:

हाल ही में, 28 अक्टूबर, 2026 को लैंड्स्लाइड्स  (Landslides) जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में उत्तराखंड के बद्रीनाथ के ऊपर स्थित तीन लटकते ग्लेशियरों (Hanging Glaciers) की संवेदनशीलता का आकलन किया गया। यह शोध भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया।

लटकते ग्लेशियर क्या हैं?

      • लटकते ग्लेशियर बर्फ के ऐसे विशाल भंडार होते हैं, जो खड़ी पर्वतीय ढलानों पर स्थित होते हैं या चट्टानी ढलानों के किनारों पर अचानक समाप्त हो जाते हैं। इनका संबंध घाटी के तल से नहीं होता है। इनकी स्थिरता तापमान, ढलान के कोण, बर्फ की मोटाई और आधार पर मौजूद प्रतिरोध पर निर्भर करती है।
      • जब ये ग्लेशियर अस्थिर हो जाते हैं, तो इनके बर्फ के कुछ हिस्से टूटकर नीचे की ओर गिर सकते हैं, जिससे हिमस्खलन (Ice Avalanches) की घटनाएँ हो सकती हैं। इस तरह की घटनाओं में चट्टानें, बर्फ, पानी और मलबा भी बहकर नीचे आ सकता है, जिससे बस्तियों और बुनियादी ढाँचे को व्यापक नुकसान पहुँच सकता है।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:

      • शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किए गए सबसे खराब स्थिति (Worst-case Scenario) के अनुसार, सबसे अधिक जोखिम वाले लटकते ग्लेशियर के ढहने से उत्पन्न हिमस्खलन लगभग 398 इमारतों, 2.66 किलोमीटर सड़कों, दो पुलों, एक हेलीपैड और एक पार्किंग क्षेत्र को नुकसान पहुँचा सकता है।
      • अध्ययन में पाया गया कि बद्रीनाथ मंदिर के सीधे तौर पर इसकी चपेट में आने की आशंका नहीं है। हालाँकि, जमा हुई चट्टानें और मलबा संभावित रूप से मंदिर परिसर को प्रभावित कर सकते हैं।

बद्रीनाथ क्यों संवेदनशील है?

      • बद्रीनाथ उत्तराखंड के चमोली जिले में समुद्र तल से लगभग 3,415 मीटर की ऊँचाई पर अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है। अलकनंदा नदी गंगा की एक प्रमुख सहायक नदी है। यह भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है और वर्ष 2025 की चारधाम यात्रा के दौरान यहाँ लगभग 17 लाख श्रद्धालु पहुँचे थे।
      • खड़ी हिमालयी ढलानों, ग्लेशियरों और संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र के बीच स्थित होने के कारण यह क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अधिक संवेदनशील है। इसके अतिरिक्त, बढ़ते पर्यटन और बुनियादी ढाँचे के विकास से ऐसे खतरों के संभावित प्रभाव और अधिक बढ़ जाते हैं।

तीन लटकते ग्लेशियरों का आकलन:

      • शोधकर्ताओं ने 30 डिग्री या उससे अधिक औसत ढलान वाले ग्लेशियरों की पहचान करने के लिए उच्च-रिजॉल्यूशन उपग्रह चित्रों और ऊँचाई संबंधी मॉडलों का उपयोग किया। इसके बाद संख्यात्मक सिमुलेशन (Numerical Simulations) के माध्यम से उनके बर्फ के आयतन, मोटाई और संवेदनशील हिस्सों का आकलन किया गया।
      • तीनों ग्लेशियरों में दूसरे ग्लेशियर स्थल में सबसे अधिक नुकसान की संभावना पाई गई। इसमें बर्फ का अनुमानित आयतन 5.32 मिलियन घन मीटर और ढलान का कोण 34.57 डिग्री पाया गया।
      • सिमुलेटेड हिमस्खलन की स्थिति में इसकी अधिकतम गति 78.5 मीटर प्रति सेकंड और प्रवाह की ऊँचाई लगभग 73.5 मीटर तक पहुँच सकती है।

जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियर से संबंधित जोखिम:

      • जलवायु परिवर्तन हिमालयी क्रायोस्फीयर (Himalayan Cryosphere) की संवेदनशीलता को बढ़ा रहा है। इसमें ग्लेशियर, बर्फ का आवरण और पर्माफ्रॉस्ट (Permafrost) शामिल हैं।
      • बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज होती है और बर्फ की स्थिरता प्रभावित होती है। पर्माफ्रॉस्ट के क्षरण से पर्वतीय ढलान कमजोर हो सकती हैं, जबकि ग्लेशियरों के पीछे हटने से हिमनद झीलों (Glacial Lakes) का निर्माण और विस्तार हो सकता है। इससे हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (Glacial Lake Outburst Floods-GLOFs) का खतरा बढ़ जाता है।
      • इन प्रक्रियाओं के कारण भूस्खलन, हिमस्खलन और आकस्मिक बाढ़ जैसी परस्पर जुड़ी आपदाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
      • एक पूर्व अध्ययन में 219 लटकते ग्लेशियरों की पहचान की गई थी, जिनमें से लगभग 30% अलकनंदा बेसिन में स्थित थे।

प्रमुख चुनौतियाँ:

      • ग्लेशियर से संबंधित आपदाओं के प्रबंधन में कई चुनौतियाँ हैं, जिनमें सीमित वैज्ञानिक निगरानी, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियाँ, अपर्याप्त जोखिम मानचित्रण और अनियोजित बुनियादी ढाँचा विकास शामिल हैं।
      • इसके अतिरिक्त, बर्फ की मोटाई, टूटकर गिरने वाली बर्फ के आयतन और घर्षण संबंधी मापदंडों का अनुमान लगाने में अनिश्चितता हिमस्खलन के सिमुलेशन की सटीकता को प्रभावित कर सकती है। इसलिए, निरंतर क्षेत्रीय अवलोकन और वैज्ञानिक सत्यापन आवश्यक हैं।

निष्कर्ष:

बद्रीनाथ से संबंधित यह अध्ययन जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियर से जुड़ी आपदाओं के प्रति हिमालयी बस्तियों की बढ़ती संवेदनशीलता को उजागर करता है। हालाँकि, अध्ययन के निष्कर्ष निकट भविष्य में ग्लेशियर के ढहने की निश्चित भविष्यवाणी नहीं करते हैं, लेकिन वे आपदा की तैयारी के लिए एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं।

हिमालयी समुदायों और तीर्थस्थलों की सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक निगरानी, जोखिम-संवेदनशील भूमि उपयोग नियोजन और सतत बुनियादी ढाँचा विकास आवश्यक हैं।

 

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