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Blog / 13 Jun 2026

अनुच्छेद 329 और चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा

संदर्भ:

हाल ही में मीनाक्षी नटराजन द्वारा मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव हेतु दाखिल नामांकन पत्र को रिटर्निंग ऑफिसर (RO) द्वारा निरस्त किए जाने के विरुद्ध दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 329(b) के तहत चुनावी प्रक्रिया के दौरान न्यायिक हस्तक्षेप सीमित है और ऐसे मामलों में चुनाव याचिका (Election Petition) ही वैधानिक उपाय है।

मामला क्या था?

      • कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन ने मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया था। रिटर्निंग ऑफिसर ने उनके नामांकन को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि उन्होंने अपने शपथपत्र में हैदराबाद में लंबित एक आपराधिक मामले का उल्लेख नहीं किया था।
      • इसके विरुद्ध उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। हालांकि न्यायालय ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ होने के बाद अदालतें उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं और चुनाव संपन्न होने के बाद ही चुनाव याचिका के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है।

अनुच्छेद 329: संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 329 चुनाव संबंधी मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप पर प्रतिबंध लगाता है। इसका उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया की निरंतरता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है।

      • अनुच्छेद 329(a):
        • यह प्रावधान निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन (Delimitation) तथा सीटों के आवंटन से संबंधित कानूनों को न्यायालय में चुनौती देने पर रोक लगाता है।
        • अर्थात् संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए परिसीमन संबंधी कानूनों की वैधता को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
      • अनुच्छेद 329(b): यह प्रावधान कहता है कि संसद अथवा राज्य विधानमंडल के किसी भी चुनाव को केवल चुनाव याचिका (Election Petition) के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है। इसका तात्पर्य है कि:
        • चुनाव प्रक्रिया के दौरान न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा।
        • नामांकन पत्र की स्वीकृति या अस्वीकृति जैसे विवाद चुनाव समाप्त होने के बाद ही उठाए जा सकते हैं।
        • चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद संबंधित उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका दायर की जाती है।

महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय:

      • एन.पी. पोन्नुस्वामी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर:
        • इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि "Election" शब्द का अर्थ केवल मतदान नहीं, बल्कि अधिसूचना जारी होने से लेकर परिणाम घोषित होने तक की पूरी प्रक्रिया है।
        • न्यायालय ने माना कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान न्यायिक हस्तक्षेप लोकतांत्रिक व्यवस्था को बाधित कर सकता है।
      • मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त:
        • इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया को बीच में रोकना संविधान की मंशा के विपरीत है और सभी विवाद चुनाव के बाद चुनाव याचिका के माध्यम से ही उठाए जाने चाहिए।

अनुच्छेद 329 का महत्व:

      • सकारात्मक पक्ष:
        • चुनावों के समयबद्ध संचालन को सुनिश्चित करता है।
        • न्यायिक हस्तक्षेप के कारण होने वाली देरी को रोकता है।
        • Election Commission of India की स्वायत्तता को मजबूत करता है।
        • लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निरंतरता बनाए रखता है।
      • चुनौतियाँ:
        • यदि चुनाव अधिकारी द्वारा स्पष्ट त्रुटि भी की जाए तो तत्काल राहत प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
        • उम्मीदवार को चुनाव समाप्त होने तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
        • चुनाव याचिकाओं के निस्तारण में कई बार वर्षों लग जाते हैं।

निष्कर्ष:

अनुच्छेद 329 भारतीय चुनावी लोकतंत्र की स्थिरता का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षा कवच है। इसका उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को न्यायिक हस्तक्षेप से मुक्त रखते हुए समय पर चुनाव सम्पन्न कराना है। हालांकि इससे कुछ मामलों में तत्काल न्याय प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है, फिर भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की निरंतरता और निर्वाचन प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने के लिए यह प्रावधान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

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