संदर्भ:
हाल ही में प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (PNAS) में प्रकाशित एक वैश्विक अध्ययन में पाया गया कि प्राचीन या पुरानी घासभूमियाँ एक सदी तक पुनर्बहाली के बाद भी अपनी मूल पादप समुदायों को पूरी तरह से वापस प्राप्त नहीं कर सकती हैं। यह अध्ययन मौजूदा घासभूमियों के संरक्षण के पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित करता है और बताता है कि इनके नष्ट होने के बाद केवल पुनर्स्थापना के माध्यम से इन्हें आसानी से फिर से बनाया जा सकता है, ऐसा मानना उचित नहीं है।
प्राचीन घासभूमियाँ क्या हैं?
प्राचीन घासभूमियाँ ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र हैं जो लंबे समय में विकसित हुए हैं और इनमें घास तथा अन्य गैर-काष्ठीय शाकीय पौधों की प्रधानता होती है। ये समृद्ध जैव विविधता को सहारा देती हैं, चराई के संसाधन और पशुपालक समुदायों की आजीविका प्रदान करती हैं, मृदा अपरदन को रोकती हैं तथा स्थलीय कार्बन भंडारण में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। इसके बावजूद, घासभूमियों को ऐतिहासिक रूप से वनों की तुलना में कम संरक्षण प्राथमिकता मिली है और इन्हें अक्सर “बंजर भूमि” के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जिससे ये कृषि, बुनियादी ढाँचे, खनन, वृक्षारोपण और ऊर्जा परियोजनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
शोधकर्ताओं ने छह महाद्वीपों के 24 अध्ययनों में 742 पादप प्रजातियों के लक्षणों का विश्लेषण किया और पुरानी घासभूमियों तथा द्वितीयक घासभूमियों से जुड़ी प्रजातियों की तुलना की। द्वितीयक घासभूमियों में सामान्यतः पुरानी घासभूमियों की विशिष्ट प्रजातियाँ कम पाई गईं और इनमें अधिक ऊँचे पौधों की प्रधानता थी, जिनमें विशिष्ट पत्ती क्षेत्रफल अधिक, पत्तियों में नाइट्रोजन की मात्रा अधिक तथा शुष्क पदार्थ की मात्रा कम थी। ये अंतर एक सदी से अधिक समय तक बने रहे, जिससे पता चलता है कि वनस्पति की पुनर्बहाली आवश्यक रूप से मूल पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्स्थापित नहीं करती है।
पुनर्बहाली कठिन क्यों है?
विनाश से मृदा में पोषक तत्वों, pH और सूक्ष्मजीवी परिस्थितियों में बदलाव हो सकता है, जिससे मूल घासभूमि वनस्पतियों के लिए पर्यावरण अनुपयुक्त हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप देशी बहुवर्षीय घासों और शाकीय पौधों की जगह खरपतवार या गैर-देशी प्रजातियाँ ले सकती हैं। पुरानी घासभूमियाँ समय के साथ नियमित आग, शाकाहारी जीवों की चराई और मौसमी जलवायु परिवर्तन जैसी पारिस्थितिक प्रक्रियाओं के माध्यम से विकसित होती हैं, जिन्हें कम समय में हमेशा दोहराया नहीं जा सकता।
पुरानी घासभूमियाँ बनाम द्वितीयक घासभूमियाँ
पुरानी घासभूमियों में ऐसी प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो लंबे समय से मौजूद पारिस्थितिक परिस्थितियों और प्राकृतिक विक्षोभ की प्रक्रियाओं के अनुकूल होती हैं। द्वितीयक घासभूमियाँ, जो किसी विक्षोभ के बाद विकसित होती हैं, वनस्पति आवरण तो पुनः प्राप्त कर सकती हैं, लेकिन इनमें प्रजातियों की संरचना और पारिस्थितिक कार्यों में बदलाव हो सकता है। पहले के शोधों में भी पाया गया है कि द्वितीयक घासभूमियाँ काफी कम पादप प्रजातियों को सहारा दे सकती हैं और अपनी पूर्व जैव विविधता को पुनः प्राप्त करने में सदियों या उससे भी अधिक समय ले सकती हैं।
भारत के लिए महत्व
भारत की घासभूमियाँ थार, कच्छ, दक्कन, तराई और असम के बाढ़ मैदानों में पाई जाती हैं और ये कई विशिष्ट वन्यजीवों को सहारा देती हैं। घासभूमि पुनर्स्थापना से ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, लेसर फ्लोरिकन और पिग्मी हॉग जैसी प्रजातियों को लाभ मिला है। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड विशेष रूप से यह दर्शाता है कि केवल किसी एक प्रजाति पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय संपूर्ण घासभूमि आवासों का संरक्षण कितना महत्वपूर्ण है।
प्रमुख नीतिगत चिंता
एक प्रमुख चुनौती बंजर भूमि दृष्टिकोण (Wasteland Approach) है, जिसके तहत प्राकृतिक खुले पारिस्थितिकी तंत्रों को ऐसी निम्नीकृत भूमि माना जा सकता है, जो वनीकरण के लिए उपयुक्त है। हालाँकि, प्राकृतिक घासभूमियों में पेड़ लगाना आवास की संरचना को बदल सकता है और खुले पारिस्थितिकी तंत्रों के अनुकूल प्रजातियों के लिए खतरा पैदा कर सकता है। हाल के शोधों से यह भी पता चलता है कि वैश्विक भूमि-उपयोग का दबाव प्राकृतिक गैर-वन पारिस्थितिकी तंत्रों को तेजी से प्रभावित कर रहा है, जो वनों से आगे बढ़कर संरक्षण के दायरे का विस्तार करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
विश्व की घासभूमियों का वर्गीकरण:
घासभूमियों को व्यापक रूप से उष्णकटिबंधीय और समशीतोष्ण घासभूमियों में वर्गीकृत किया जाता है। उष्णकटिबंधीय घासभूमियों या सवाना में गर्म परिस्थितियाँ, स्पष्ट आर्द्र और शुष्क ऋतुएँ तथा सामान्यतः 50–130 सेमी वर्षा होती है। इनके प्रमुख उदाहरणों में अफ्रीकी सवाना, वेनेजुएला-कोलंबिया के ल्यानोस (Llanos) और ब्राजील-उरुग्वे के कैंपोस (Campos) शामिल हैं। समशीतोष्ण घासभूमियों में गर्म ग्रीष्मकाल और ठंडी सर्दियाँ होती हैं तथा सामान्यतः 25–75 सेमी वर्षा होती है। इनके महत्वपूर्ण उदाहरणों में उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी, यूरेशिया के स्टेपी, अर्जेंटीना-उरुग्वे के पम्पास, दक्षिण अफ्रीका के वेल्ड, ऑस्ट्रेलिया के डाउन्स और हंगरी के पुज़्ता शामिल हैं।
आगे की राह:
भारत को राष्ट्रीय घासभूमि पुनर्स्थापना कार्यक्रम (National Grassland Restoration Programme) के साथ-साथ राष्ट्रीय चराई नीति (National Grazing Policy) की आवश्यकता है। प्राथमिकताओं में पुरानी घासभूमियों का मानचित्रण और संरक्षण, अनुचित भूमि रूपांतरण को रोकना, आक्रामक प्रजातियों पर नियंत्रण, देशी प्रजातियों के माध्यम से पुनर्स्थापना को बढ़ावा देना, वैज्ञानिक तरीके से चराई का प्रबंधन करना और पशुपालक समुदायों को शामिल करना शामिल होना चाहिए।
