चर्चा में क्यों?
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के एक आदेश को निरस्त कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि वह आदेश AI द्वारा उत्पन्न छह काल्पनिक (Hallucinated) कानूनी उद्धरणों (Legal Citations) पर आधारित था। इनमें से तीन उद्धृत निर्णय अस्तित्व में ही नहीं थे, जबकि अन्य निर्णयों को या तो गलत तरीके से उद्धृत किया गया था या उनका मामले से कोई संबंध नहीं था।
एआई हैलुसिनेशन (AI Hallucinations) क्या है?
AI हैलुसिनेशन वह स्थिति है, जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्रणाली किसी झूठी, मनगढ़ंत या गलत जानकारी को वास्तविक और प्रमाणिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत कर देती है।
कानूनी क्षेत्र में AI हैलुसिनेशन के कारण निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं-
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- काल्पनिक न्यायिक निर्णय (Fake Judgments) और कानूनी उद्धरण।
- कानूनों की गलत व्याख्या।
- भ्रामक कानूनी तर्क।
- त्रुटिपूर्ण न्यायिक निर्णय।
- काल्पनिक न्यायिक निर्णय (Fake Judgments) और कानूनी उद्धरण।
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मामले की पृष्ठभूमि:
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- एसेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स लिमिटेड (Essel Infraprojects Ltd.) ने पैन इंडिया यूटिलिटीज़ डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड को जम्मू एवं कश्मीर बैंक द्वारा दिए गए 200 करोड़ रुपये के ऋण के लिए कॉर्पोरेट गारंटी प्रदान की थी।
- ऋण चुकाने में चूक (Default) होने के बाद बैंक ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (Insolvency and Bankruptcy Code - IBC) की धारा 7 के तहत एसेल के विरुद्ध दिवाला कार्यवाही प्रारंभ की।
- एसेल ने तर्क दिया कि 2014 में बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित डीमर्जर (Demerger) और अमलगमेशन (Amalgamation) के बाद उसकी देनदारी (Liability) स्थानांतरित हो चुकी थी।
- हालाँकि NCLT और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) ने एसेल की दलील को अस्वीकार कर दिया, लेकिन बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश को निरस्त कर दिया, क्योंकि यह मनगढ़ंत कानूनी नज़ीरों (Legal Precedents) पर आधारित पाया गया।
- एसेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स लिमिटेड (Essel Infraprojects Ltd.) ने पैन इंडिया यूटिलिटीज़ डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड को जम्मू एवं कश्मीर बैंक द्वारा दिए गए 200 करोड़ रुपये के ऋण के लिए कॉर्पोरेट गारंटी प्रदान की थी।
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सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ:
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- NCLT का आदेश छह उद्धृत न्यायिक निर्णयों पर आधारित था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इन संदर्भों में गंभीर अनियमितताएँ पाईं।
- तीन निर्णय अस्तित्व में ही नहीं थे।
- दो वास्तविक निर्णय उन कानूनी सिद्धांतों का समर्थन नहीं करते थे, जिनका दावा आदेश में किया गया था।
- एक उद्धरण पूरी तरह किसी अन्य मामले से संबंधित था।
- न्यायालय ने यह भी कहा कि ये संदर्भ न तो किसी पक्षकार द्वारा न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे और न ही उनका कोई स्वतंत्र आधार था। प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि ये AI-सहायता प्राप्त कानूनी शोध (AI-Assisted Research) के माध्यम से उत्पन्न किए गए थे।
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मनगढ़ंत न्यायिक निर्णयों या कानूनी नज़ीरों पर निर्भरता न्यायिक निर्णय प्रक्रिया की मूलभूत विश्वसनीयता को कमजोर करती है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि AI द्वारा उत्पन्न अप्रमाणित सामग्री की थोड़ी-सी मात्रा भी किसी न्यायिक निर्णय की वैधता को प्रभावित कर सकती है।
- इसके साथ ही न्यायालय ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को निर्देश दिया कि वह न्यायिक कार्यवाहियों में AI के उपयोग के लिए आवश्यक सुरक्षा उपायों (Safeguards) पर विचार करे।
- NCLT का आदेश छह उद्धृत न्यायिक निर्णयों पर आधारित था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इन संदर्भों में गंभीर अनियमितताएँ पाईं।
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न्यायपालिका में AI से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ:
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- सटीकता (Accuracy) की समस्या: AI गलत कानूनी उद्धरण और भ्रामक जानकारी उत्पन्न कर सकता है।
- पूर्वाग्रह (Bias): AI ऐतिहासिक कानूनी आँकड़ों में मौजूद पक्षपात को दोहरा सकता है।
- मानवीय निर्णय क्षमता की सीमाएँ: न्यायिक निर्णय केवल तथ्यों पर नहीं, बल्कि सहानुभूति, संवैधानिक मूल्यों और परिस्थितिजन्य समझ पर भी आधारित होते हैं, जिन्हें AI पूरी तरह नहीं समझ सकता।
- नियामकीय ढाँचे का अभाव: भारत में न्यायालयों में AI के उपयोग को नियंत्रित करने वाला कोई व्यापक कानूनी एवं नियामकीय ढाँचा उपलब्ध नहीं है।
- सटीकता (Accuracy) की समस्या: AI गलत कानूनी उद्धरण और भ्रामक जानकारी उत्पन्न कर सकता है।
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आगे की राह:
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- AI को केवल सहायक उपकरण (Assistive Tool) के रूप में उपयोग किया जाए, न्यायाधीशों के विकल्प के रूप में नहीं।
- AI के उपयोग के लिए स्पष्ट नैतिक दिशानिर्देश (Ethical Guidelines) और प्रभावी नियामकीय ढाँचा विकसित किया जाए।
- न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं और न्यायालयी कर्मचारियों को AI साक्षरता (AI Literacy) का प्रशिक्षण दिया जाए।
- AI द्वारा तैयार किए गए सभी कानूनी संदर्भों और उद्धरणों का अनिवार्य रूप से सत्यापन किया जाए।
- AI प्रणाली में पूर्वाग्रह और त्रुटियों की पहचान के लिए नियमित ऑडिट (Audit) किए जाएँ।
- AI को केवल सहायक उपकरण (Assistive Tool) के रूप में उपयोग किया जाए, न्यायाधीशों के विकल्प के रूप में नहीं।
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निष्कर्ष:
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में भारत की न्यायिक व्यवस्था को अधिक कुशल बनाने, लंबित मामलों को कम करने, कानूनी शोध को बेहतर बनाने तथा न्याय तक पहुँच को आसान बनाने की अपार संभावनाएँ हैं। किंतु AI द्वारा उत्पन्न काल्पनिक न्यायिक निर्णयों (AI-Hallucinated Judgments) की यह घटना स्पष्ट करती है कि तकनीक पर बिना सत्यापन के अत्यधिक निर्भरता न्यायपालिका की विश्वसनीयता और निष्पक्षता के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। इसलिए न्यायिक प्रणाली में AI का उपयोग मानवीय निगरानी, तथ्यात्मक सत्यापन, पारदर्शिता तथा सुदृढ़ नैतिक एवं नियामकीय व्यवस्था के साथ ही किया जाना चाहिए।
