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Blog / 07 Jul 2026

एआई शासन और ग्लोबल साउथ की आवाज़: वैश्विक एआई नियमों को आकार देने में भारत की भूमिका

चर्चा में क्यों?

हाल ही में जिनेवा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) शासन पर पहला संयुक्त राष्ट्र वैश्विक संवाद आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य जिम्मेदार एआई उपयोग के लिए एक वैश्विक ढांचा विकसित करना था। इस संवाद का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि एआई शासन में सभी देशों, विशेष रूप से विकासशील देशों के हितों को शामिल किया जाए, न कि केवल तकनीकी रूप से उन्नत अर्थव्यवस्थाओं द्वारा नियम निर्धारित किए जाएं।

वैश्विक एआई शासन (Global AI Governance) क्या है?

एआई शासन से तात्पर्य उन कानूनों, संस्थानों, नैतिक सिद्धांतों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग तंत्रों की व्यवस्था से है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास और उपयोग को नियंत्रित करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के आदेश के तहत स्थापित वैश्विक एआई शासन संवाद एक ऐसा मंच प्रदान करता है जहाँ:

      • सभी देशों को समान भागीदारी और आवाज़ मिलती है।
      • सरकारें, नागरिक समाज, उद्योग और विशेषज्ञ इसमें भाग लेते हैं।
      • जिम्मेदार एआई विकास के लिए साझा सिद्धांतों पर चर्चा की जाती है।

इस संवाद के मुख्य उद्देश्य हैं:

      • एआई विभाजन (AI Divide) को कम करना।
      • मानव निगरानी और नियंत्रण सुनिश्चित करना।
      • सुरक्षा और संरक्षा को बढ़ावा देना।
      • एआई विकास को अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकारों के अनुरूप बनाना।

 ग्लोबल साउथ के नेतृत्व वाले एआई शासन की आवश्यकता क्यों है:

डेटा और संसाधनों के शोषण को रोकना

एआई मॉडल के प्रशिक्षण के लिए बड़ी मात्रा में डेटा की आवश्यकता होती है। विकासशील देशों को निम्नलिखित क्षेत्रों में सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है:

      • स्थानीय डेटा के अनधिकृत उपयोग को रोकना।
      • स्वदेशी ज्ञान के शोषण से बचाव करना।
      • एआई से होने वाले लाभ और मुनाफे में उचित भागीदारी सुनिश्चित करना।

सामाजिक और आर्थिक नुकसान से निपटना

एआई से जुड़े कुछ जोखिमों में वृद्धि हो सकती है, जैसे:

      • डीपफेक और गलत सूचना (Misinformation)
      • एल्गोरिदम आधारित भेदभाव।
      • घृणास्पद भाषण और ऑनलाइन हेरफेर।

इन तात्कालिक खतरों से नागरिकों की सुरक्षा के लिए प्रभावी नियमों की आवश्यकता है।

आर्थिक लाभों का समान वितरण सुनिश्चित करना

एआई से उत्पन्न आर्थिक मूल्य का लाभ स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं तक पहुँचना चाहिए, जैसे:

      • रोजगार के अवसरों का निर्माण।
      • घरेलू नवाचार को बढ़ावा देना।
      • तकनीकी हस्तांतरण को प्रोत्साहित करना।

अन्यथा एआई से होने वाला लाभ केवल बहुराष्ट्रीय तकनीकी कंपनियों तक सीमित रह सकता है।

डिजिटल संप्रभुता की रक्षा

विदेशी एआई प्लेटफॉर्म, क्लाउड सेवाओं और सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता रणनीतिक कमजोरियाँ पैदा कर सकती है। विकासशील देशों को महत्वपूर्ण डिजिटल बुनियादी ढांचे पर अधिक नियंत्रण की आवश्यकता है।

एआई पारिस्थितिकी तंत्र में भारत की स्थिति:

वैश्विक तकनीकी साझेदारी

भारत ने Pax Silica जैसी पहलों में भाग लिया है, जो सेमीकंडक्टर सहयोग और नवाचार-अनुकूल तकनीकी मानकों को बढ़ावा देती हैं।

हालांकि, भारत का सेमीकंडक्टर उद्योग अभी मुख्य रूप से असेंबली और परीक्षण पर केंद्रित है तथा उन्नत तकनीक के लिए आयात पर निर्भर है।

कम अनुसंधान एवं विकास (R&D) निवेश

भारत का अनुसंधान एवं विकास खर्च प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कम है। इससे:

      • स्वदेशी एआई अनुसंधान सीमित होता है।
      • उन्नत कंप्यूटिंग क्षमताओं का विकास धीमा होता है।
      • वैश्विक प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है।

स्वदेशी एआई विकास

भारत ने समावेशी एआई को बढ़ावा देने के लिए कई पहलें शुरू की हैं, जैसे:

      • India AI Impact Summitनैतिक और विकास-केंद्रित एआई शासन को बढ़ावा देने के लिए।
      • Sarvam AI मॉडलभारतीय भाषाओं और डिजिटल समावेशन पर केंद्रित एआई मॉडल।

एआई शासन की चुनौतियाँ:

      • रणनीतिक संतुलन: भारत को विकसित देशों के साथ सहयोग बनाए रखते हुए ग्लोबल साउथ के हितों का प्रतिनिधित्व करने के बीच संतुलन बनाना होगा।
      • तकनीकी निर्भरता: सीमित घरेलू कंप्यूटिंग ढांचा और विदेशी चिप एवं क्लाउड प्रदाताओं पर निर्भरता भारत के लिए कमजोरियाँ पैदा करती है।
      • वैश्विक सहमति का अभाव: एआई विनियमन को लेकर प्रमुख शक्तियों के बीच मतभेदों के कारण सार्वभौमिक नियमों का विकास धीमा हो रहा है।
      • पर्यावरणीय चिंताएँ: एआई के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे में बड़ी मात्रा में भूमि, पानी, बिजली की आवश्यकता होती है, जिससे पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।

आगे की राह:

      • भारत को समावेशी एआई शासन के निर्माण में ग्लोबल साउथ देशों का नेतृत्व करना चाहिए।
      • विकासशील देशों को साझा कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और ओपन-सोर्स एआई प्लेटफॉर्म विकसित करने के लिए सहयोग करना चाहिए।
      • मजबूत डेटा संरक्षण नियमों के माध्यम से सहमति आधारित डेटा उपयोग और उचित मुआवजा सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
      • भारत को अनुसंधान एवं विकास (R&D) निवेश बढ़ाना चाहिए तथा घरेलू सेमीकंडक्टर और एआई क्षमताओं को मजबूत करना चाहिए।

निष्कर्ष:

एआई शासन भविष्य में तकनीकी शक्ति के वितरण को निर्धारित करेगा। एक प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्था के रूप में भारत के पास ऐसा संतुलित वैश्विक ढांचा बनाने का अवसर है, जो नवाचार को बढ़ावा देने के साथ-साथ समानता, गोपनीयता और डिजिटल संप्रभुता की रक्षा करे। ग्लोबल साउथ के नेतृत्व वाला दृष्टिकोण यह सुनिश्चित कर सकता है कि एआई असमानता का स्रोत बनने के बजाय समावेशी विकास का साधन बने।

 

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