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Blog / 07 Jan 2026

कृषि विस्तार और जैव विविधता की हानि

संदर्भ:

हाल ही में कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि दुनिया भर में बढ़ती खाद्य माँग  को पूरा करने के लिए प्राकृतिक क्षेत्रों को तेजी से कृषि भूमि में बदला जा रहा है। इसका सबसे गंभीर असर जैव विविधता पर पड़ रहा है, विशेषकर संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:

    • जैव विविधता हॉटस्पॉट्स पर खतरा:
      • जैव विविधता हॉटस्पॉट्स वे क्षेत्र होते हैं जहाँ ऐसी विशिष्ट वनस्पति और जीव-जंतु प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो विश्व के अन्य किसी भाग में नहीं मिलतीं। इन क्षेत्रों में पहले ही 70% से अधिक प्राकृतिक वनस्पति नष्ट हो चुकी है। अध्ययन बताता है कि जब इन हॉटस्पॉट्स में कृषि विस्तार होता है, तो उसका प्रभाव केवल भूमि उपयोग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप प्रजातियों की संख्या और विविधता में उल्लेखनीय गिरावट देखी जाती है।
        • प्रजाति समृद्धि (Species Richness) में लगभग 26% की कमी
        • व्यक्तिगत प्रजातियों की आबादी में 12% की गिरावट
        • संपूर्ण जैविक समुदाय की विविधता में 9% की कमी
      • यह विशेष रूप से चिंता का विषय है क्योंकि यही प्रजातियाँ परागण, बीज प्रसार और प्राकृतिक कीट नियंत्रण जैसी आवश्यक पारिस्थितिकी सेवाएँ प्रदान करती हैं, जिन पर कृषि और मानव जीवन दोनों निर्भर करते हैं।

कृषि विस्तार के क्षेत्रीय पैटर्न:

    • अध्ययन के अनुसार, कृषि का विस्तार वैश्विक औसत की तुलना में उष्णकटिबंधीय और विकासशील क्षेत्रों में कहीं अधिक तेज़ी से हो रहा है।
      • जैसे : दक्षिण अमेरिका: सेराडो और अटलांटिक फॉरेस्ट
      • दक्षिण-पूर्व एशिया: इंडो-बर्मा और सुंडालैंड
      • अफ्रीका: पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्र
    • वर्ष 2000 से 2019 के बीच जैव विविधता हॉटस्पॉट्स में कृषि भूमि में 12% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि इसी अवधि में वैश्विक औसत वृद्धि केवल 9% रही।
    • अध्ययन ने 3,483 ऐसे उच्च-जोखिम क्षेत्रों की पहचान की है, जो लगभग 1,741 मिलियन हेक्टेयर में फैले हैं। इनमें से लगभग 1,031 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र संरक्षित क्षेत्रों के बाहर स्थित है।

केस स्टडीभारत के पश्चिमी घाट:

भारत के पश्चिमी घाट के उत्तरी हिस्सों में बड़े पैमाने पर बागानों और वृक्षारोपण का विस्तार हो रहा है।

मुख्य कारण:

    • इसके साथ ही पारंपरिक खेती प्रणालियाँ कमजोर हो रही हैं। युवा पीढ़ी का पलायन, भूमि का परित्याग और बिक्री जैसी प्रक्रियाएँ आवास विखंडन को बढ़ावा दे रही हैं।
    • पश्चिमी घाट में 5,000 से अधिक पुष्पीय पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ 139 स्तनधारी प्रजातियाँ, 508 पक्षी प्रजातियाँ और लगभग 325 वैश्विक रूप से संकटग्रस्त प्रजातियाँ निवास करती हैं।
    • शोध बताता है कि पथरीले पठारों को धान के खेत या बागानों में बदलने से मेंढकों (Frogs) की विविधता में तेज गिरावट आती है।
    • IUCN की रिपोर्ट वर्ल्ड हेरिटेज आउटलुक–4 (2025) के अनुसार, भूमि-उपयोग परिवर्तन और विकास दबाव पश्चिमी घाट के लिए बड़े खतरे हैं।

नीति और संरक्षण सुझाव:

    • संरक्षित क्षेत्रों का रणनीतिक विस्तार, खासकर दुर्लभ प्रजातियों के आवासों में किया जाय।
    • मौजूदा संरक्षित क्षेत्रों में प्रबंधन क्षमता और कानून प्रवर्तन को मजबूत करना।
    • प्राकृतिक क्षेत्रों पर दबाव घटाने के लिए मौजूदा कृषि भूमि की उत्पादकता बढ़ाना।
    • अंतरराष्ट्रीय खाद्य व्यापार सहयोग ताकि गरीब लेकिन जैव-विविध देशों पर खेती विस्तार का दबाव न पड़े।
    • स्थानीय समुदायों की भागीदारी, क्योंकि वे जैव विविधता संरक्षण में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।

निष्कर्ष:

जैव विविधता हॉटस्पॉट्स में अनियंत्रित कृषि विस्तार टिकाऊ नहीं है। इन क्षेत्रों की रक्षा करना प्रजातियों के विलुप्त होने से बचाने, पारिस्थितिकी सेवाओं को बनाए रखने और जलवायु सहनशीलता  बढ़ाने के लिए अत्यंत आवश्यक है।