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Blog / 05 May 2026

तेज़ाब हमले के पीड़ितों को RPwD अधिनियम के अंतर्गत किया गया शामिल

तेज़ाब हमले के पीड़ितों को RPwD अधिनियम के अंतर्गत किया गया शामिल 

संदर्भ:

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) के तहत एसिड अटैक पीड़ितोंकी परिभाषा का विस्तार किया। पहले यह अधिनियम केवल एसिड फेंके जाने के पीड़ितों को मान्यता देता था, जबकि जबरन एसिड पिलाए जाने के मामलों को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया था।

मुख्य निर्णय:

      • मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा कि:
        • जबरन एसिड पिलाए जाने से बचे लोगों को भी एसिड अटैक पीड़ितकी परिभाषा में शामिल किया जाना चाहिए।
      • यह व्याख्या अधिनियम के लागू होने (2016) से ही प्रभावी मानी जाएगी (पूर्वव्यापी रूप से)।
      • यह विस्तार संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों का उपयोग करते हुए किया गया, ताकि पूर्ण न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

कानूनी व संवैधानिक आधार:

      • अनुच्छेद 142: सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक आदेश देने की शक्ति देता है।
      • चूंकि सरकार ने अभी तक अधिनियम की अनुसूची में औपचारिक संशोधन नहीं किया था, इसलिए अदालत ने हस्तक्षेप किया।

निर्णय का महत्व:

      • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) के तहत अब जबरन एसिड पिलाए जाने के पीड़ितों को भी औपचारिक रूप से दिव्यांग व्यक्तिके रूप में मान्यता दी गई है। इस मान्यता से उन्हें दिव्यांग अधिकारों के कानूनी ढांचे में शामिल किया जाता है, जिससे उन्हें गरिमा के साथ व्यवहार और आवश्यक सहायता मिल सके, न कि उन्हें सुरक्षा प्रणाली से बाहर रखा जाए।
      • इसके परिणामस्वरूप, ऐसे पीड़ित दिव्यांगता प्रमाणपत्र के पात्र होंगे, जिससे उन्हें वित्तीय सहायता, स्वास्थ्य सेवाएं और पुनर्वास सुविधाओं तक पहुंच मिलेगी। अदालत ने इस मुद्दे के लैंगिक न्याय (gender justice) पहलू पर भी जोर दिया, यह देखते हुए कि अधिकांश पीड़ित महिलाएं होती हैं, जिससे यह मामला लैंगिक हिंसा से भी जुड़ता है। कुल मिलाकर, यह दृष्टिकोण पुनर्वास, सामाजिक सुरक्षा और पीड़ितों की गरिमा बहाल करने पर केंद्रित व्यापक मानवाधिकार दृष्टिकोण को दर्शाता है।

RPwD अधिनियम, 2016 के बारे में:

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ने 1995 के अधिनियम को प्रतिस्थापित किया और इसे संयुक्त राष्ट्र के दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय (UNCRPD) के अनुरूप बनाया गया।

मुख्य विशेषताएं:

      • दिव्यांगता की श्रेणियों को 7 से बढ़ाकर 21 किया गया, जिसमें एसिड अटैक पीड़ित भी शामिल हैं।
      • सरकारी नौकरियों में 4% और उच्च शिक्षा में 5% आरक्षण का प्रावधान।
      • भेदभाव रहित व्यवहार, गरिमा और समानता पर जोर।
      • सार्वजनिक ढांचे और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) में सुगमता (accessibility) अनिवार्य।
      • केंद्र और राज्य स्तर पर शिकायत निवारण प्राधिकरणों की स्थापना।

निष्कर्ष:

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारत में दिव्यांग अधिकारों और पीड़ित संरक्षण को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह कानून की प्रगतिशील व्याख्या को दर्शाता है, जो यह सुनिश्चित करती है कि कानूनी सुरक्षा समय के साथ बदलते अपराधों और उनके प्रभावों के अनुरूप बनी रहे।

 

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