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Blog / 20 May 2026

तीसरा भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन 2026: भारत के लिए रणनीतिक महत्व

तीसरा भारत–नॉर्डिक शिखर सम्मेलन 2026

संदर्भ:

हाल ही में तृतीय भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन 19 मई 2026 को ओस्लो में आयोजित किया गया, जहाँ भारत तथा पाँच नॉर्डिक देशों, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन ने अपनी साझेदारी को “हरित प्रौद्योगिकी एवं नवाचार रणनीतिक साझेदारी” के स्तर तक उन्नत किया।

नॉर्डिक क्षेत्र के बारे में:

      • नॉर्डिक क्षेत्र में पाँच संप्रभु देश सम्मिलित हैं: डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन। यह “स्कैंडिनेविया” से भिन्न है, जिसमें सामान्यतः केवल नॉर्वे, स्वीडन और डेनमार्क ही शामिल होते हैं।
      • नॉर्डिक मॉडल उच्च मानव विकास, सशक्त सामाजिक कल्याण प्रणालियों तथा स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल शासन में अग्रणी भूमिका के लिए जाना जाता है।

3rd India–Nordic Summit 2026

शिखर सम्मेलन के प्रमुख परिणाम:

वर्ष 2026 का यह शिखर सम्मेलन क्षेत्रीय सहयोग से आगे बढ़कर एक संरचित दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी की दिशा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत देता है।

      • हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार साझेदारी: भारत और नॉर्डिक देशों ने निम्न क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा करने पर सहमति व्यक्त की:
        • नवीकरणीय ऊर्जा एवं हरित हाइड्रोजन
        • चक्रीय अर्थव्यवस्था एवं अपशिष्ट प्रबंधन
        • डिजिटल अवसंरचना एवं स्वच्छ प्रौद्योगिकियाँ
        • जलवायु-अनुकूल औद्योगिक समाधान
      • व्यापार और निवेश विस्तार: इस शिखर सम्मेलन में भारत–EFTA व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते के कार्यान्वयन तथा भारत–EU मुक्त व्यापार समझौते की प्रगति पर बल दिया गया। नॉर्डिक देशों के निवेश से भारत की विनिर्माण एवं नवाचार आधारित व्यवस्था को सुदृढ़ होने की अपेक्षा है।
      • विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार: सहयोग को निम्न क्षेत्रों में विस्तारित किया गया:
        • 6G दूरसंचार
        • कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं क्वांटम प्रौद्योगिकी
        • स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र एवं इनक्यूबेटर
        • यह भारत की उस रणनीति को समर्थन देता है, जिसका उद्देश्य प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता को कम करना है।
      • आर्कटिक और नीली अर्थव्यवस्था सहयोग: इन देशों ने आर्कटिक अनुसंधान, जलवायु निगरानी तथा सतत महासागर शासन में सहयोग को मजबूत करने पर सहमति व्यक्त की। यह भारत की आर्कटिक नीति और हिंद-प्रशांत समुद्री दृष्टिकोण को भी समर्थन प्रदान करता है।

भारत के लिए रणनीतिक महत्व:

      • जलवायु और हरित संक्रमण: नॉर्डिक देश विश्व में सतत विकास (सस्टेनेबिलिटी) के क्षेत्र में अग्रणी हैं। इस सहयोग से भारत को उन्नत हरित प्रौद्योगिकियों तक पहुँच मिलती है, जिससे वह अपने “पंचामृत” जलवायु लक्ष्यों और शून्य-कार्बन (नेट-ज़ीरो) लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम होता है।
      • भू-राजनीतिक एवं आर्कटिक सहभागिता: जलवायु परिवर्तन और नए समुद्री मार्गों के कारण आर्कटिक क्षेत्र रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होता जा रहा है। नॉर्डिक देशों के साथ भारत की साझेदारी से आर्कटिक शासन व्यवस्था और जलवायु विज्ञान सहयोग में उसकी भूमिका मजबूत होती है।
      • प्रौद्योगिकी और रणनीतिक स्वायत्तता: 6G, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग भारत के तकनीकी आत्मनिर्भरता और महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं के विविधीकरण के लक्ष्य को समर्थन देता है।

भारत–नॉर्डिक शिखर सम्मेलन के बारे में:

      • भारत–नॉर्डिक शिखर सम्मेलन भारत और पाँच नॉर्डिक देशों, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन के बीच उच्च-स्तरीय कूटनीतिक बैठक है।
      • इसका उद्देश्य व्यापार, जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ ऊर्जा, नवाचार और वैश्विक शासन जैसे क्षेत्रों में सहयोग को सुदृढ़ करना है।

तीन शिखर सम्मेलन:

      • 2018 (स्टॉकहोम): नवाचार, वैश्विक सुरक्षा और आर्थिक सहयोग पर केंद्रित
      • 2022 (कोपेनहेगन): महामारी के बाद पुनर्प्राप्ति, जलवायु कार्रवाई और नीली अर्थव्यवस्था पर बल
      • 2026 (ओस्लो): हरित प्रौद्योगिकी एवं नवाचार रणनीतिक साझेदारी के रूप में उन्नयन

निष्कर्ष:

तृतीय भारत–नॉर्डिक शिखर सम्मेलन उत्तरी यूरोप के साथ भारत के संबंधों के विकास में एक महत्वपूर्ण चरण है। यह जलवायु कार्रवाई, उन्नत प्रौद्योगिकी, व्यापार और आर्कटिक शासन में सहयोग को मजबूत करता है। भारत के लिए यह साझेदारी सतत विकास, तकनीकी प्रगति और उभरते भू-राजनीतिक क्षेत्रों में वैश्विक भूमिका को सुदृढ़ करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 

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