संदर्भ:
हाल ही में ओडिशा के भुवनेश्वर में 13वीं ब्रिक्स शिक्षा मंत्रियों की बैठक संपन्न हुई। इसमें एक संयुक्त घोषणा-पत्र अपनाया गया, जिसमें शिक्षा, कौशल, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग का मार्ग-मानचित्र प्रस्तुत किया गया। वर्ष 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहे भारत ने जन-केंद्रित और मानवता-प्रथम दृष्टिकोण पर बल दिया, जिसमें शिक्षार्थी, शिक्षक, शोधकर्ता और युवा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के केंद्र में हैं।
भारत की 2026 में ब्रिक्स अध्यक्षता:
भारत ने 1 जनवरी 2026 को चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली। इससे पहले भारत 2012, 2016 और 2021 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर चुका है। अध्यक्षता का विषय: “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” था।
यह विषय भारत के निम्नलिखित उद्देश्यों पर केंद्रित है:
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- सुदृढ़ एवं लचीली वैश्विक व्यवस्थाएँ
- नवाचार और प्रौद्योगिकी
- विकासशील देशों के बीच अधिक सहयोग
- सतत एवं समावेशी विकास
- जन-केंद्रित वैश्विक दक्षिण सहयोग
- 18वाँ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12–13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित किया जाना निर्धारित है।
- सुदृढ़ एवं लचीली वैश्विक व्यवस्थाएँ
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शिक्षा मंत्रियों की बैठक के प्रमुख परिणाम:
संयुक्त घोषणा-पत्र में सहयोग के लिए पाँच प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की गई है।
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- प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा: ब्रिक्स देश गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा तक पहुँच को मजबूत करेंगे। इसके साथ ही मूलभूत साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान को भी बढ़ावा दिया जाएगा।
- तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा: तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण में अधिक सहयोग से कौशल को उभरते हुए रोजगार के अवसरों के अनुरूप बनाने में सहायता मिलेगी।
- अनुसंधान, नवाचार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता: सदस्य देश निम्नलिखित को बढ़ावा देंगे
- संयुक्त अनुसंधान
- नवाचार पारितंत्र
- नवोद्यम
- शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नैतिक उपयोग
- इससे वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान और तकनीकी क्षमता निर्माण को बढ़ावा मिल सकता है।
- संयुक्त अनुसंधान
- योग्यताओं की पारस्परिक मान्यता: घोषणा-पत्र में शैक्षणिक योग्यताओं की अधिक पारस्परिक मान्यता का समर्थन किया गया है। इससे ब्रिक्स देशों के बीच विद्यार्थियों की आवाजाही तथा शैक्षणिक सहयोग को सुगम बनाने में सहायता मिलेगी।
- शैक्षणिक नेतृत्व और गतिशीलता: निम्नलिखित माध्यमों से सहयोग को और मजबूत किया जाएगा:
- शिक्षकों एवं संकाय सदस्यों का आदान-प्रदान
- छात्रवृत्तियाँ
- शैक्षणिक नेतृत्व कार्यक्रम
- संस्थागत विकास
- शिक्षकों एवं संकाय सदस्यों का आदान-प्रदान
- प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा: ब्रिक्स देश गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा तक पहुँच को मजबूत करेंगे। इसके साथ ही मूलभूत साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान को भी बढ़ावा दिया जाएगा।
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ब्रिक्स के बारे में:
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- ब्रिक्स प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधित्व करने वाला अंतर-सरकारी सहयोग मंच है।
- ब्रिक शब्द का प्रयोग अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने 2001 में किया था। औपचारिक सहयोग की शुरुआत 2006 में हुई, जबकि पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में आयोजित हुआ।
- ब्रिक्स प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधित्व करने वाला अंतर-सरकारी सहयोग मंच है।
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विस्तार:
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- 2010: दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद ब्रिक का नाम ब्रिक्स हुआ।
- 2024: मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात इसमें शामिल हुए।
- 2025: इंडोनेशिया पूर्ण सदस्य बना।
- 2010: दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद ब्रिक का नाम ब्रिक्स हुआ।
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वर्तमान में ब्रिक्स में 11 पूर्ण सदस्य हैं।
भारत के लिए महत्व:
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- वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व: ब्रिक्स भारत को विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के हितों को वैश्विक मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है।
- रणनीतिक स्वायत्तता: ब्रिक्स भारत को विभिन्न भू-राजनीतिक समूहों के साथ सहभागिता करने में सक्षम बनाता है, जबकि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रख सकता है।
- शिक्षा और मानव पूंजी: कौशल, अनुसंधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और विद्यार्थियों की आवाजाही के क्षेत्र में सहयोग भारत की ज्ञान अर्थव्यवस्था और जनसांख्यिकीय लाभांश को मजबूत कर सकता है।
- प्रौद्योगिकी सहयोग: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल प्रौद्योगिकियों, अनुसंधान और नवाचार में सहयोग समावेशी तकनीकी विकास को बढ़ावा दे सकता है।
- सांस्कृतिक कूटनीति: पारंपरिक और स्वदेशी ज्ञान को बढ़ावा देने से भारत की सभ्यतागत कूटनीति और सॉफ्ट पावर को मजबूती मिल सकती है।
- वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व: ब्रिक्स भारत को विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के हितों को वैश्विक मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है।
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आगे की राह:
भारत को अपनी अध्यक्षता का उपयोग शिक्षा, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, जलवायु कार्रवाई और व्यापार के क्षेत्र में व्यावहारिक तथा सर्वसम्मति-आधारित सहयोग को बढ़ावा देने के लिए करना चाहिए। अधिक संस्थागत समन्वय, शैक्षणिक गतिशीलता, अनुसंधान साझेदारी और डिजिटल सहयोग ब्रिक्स को वैश्विक दक्षिण की चिंताओं के समाधान में अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
