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Daily-mcqs 19 May 2026
Q1:
इबोला वायरस रोग (EVD) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह एक जूनोटिक (पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाला) रोग है, जो Orthoebolavirus वंश के वायरसों के कारण होता है। 2. इबोला वायरस के Bundibugyo स्ट्रेन के लिए WHO द्वारा अनुमोदित अनेक टीके और उपचार विश्वभर में उपलब्ध हैं। 3. जब WHO किसी बीमारी को Public Health Emergency of International Concern (PHEIC) घोषित करता है, तब वह सभी देशों को कड़े अंतरराष्ट्रीय यात्रा एवं सीमा प्रतिबंध लगाने के लिए अनिवार्य करता है। उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
A: केवल 1
B: केवल 1 और 3
C: केवल 2 और 3
D: 1, 2, और 3
उत्तर: A
स्पष्टीकरण:
कथन 1 सही है:
इबोला वायरस रोग (EVD) एक गंभीर एवं प्रायः घातक जूनोटिक बीमारी है, जो Orthoebolavirus वंश के वायरसों के कारण होती है। फल खाने वाले चमगादड़ (fruit bats) जैसे जंगली जानवर इसके प्राकृतिक भंडार (reservoir) माने जाते हैं।
कथन 2 गलत है:
कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) और युगांडा में वर्तमान प्रकोप Bundibugyo स्ट्रेन के कारण हुआ है। यह इबोला वायरस का एक दुर्लभ प्रकार है, जिसके लिए वर्तमान में कोई स्वीकृत टीका या विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है।
कथन 3 गलत है:
जब WHO किसी बीमारी को Public Health Emergency of International Concern (PHEIC) घोषित करता है, तब वह देशों को अंतरराष्ट्रीय यात्रा या सीमा प्रतिबंध लगाने के विरुद्ध सलाह देता है। ऐसे प्रतिबंध आवश्यक व्यापार और मानवीय सहायता मार्गों को बाधित कर सकते हैं।
Q2:
इबोला वायरस रोग (EVD) के निदान एवं प्रबंधन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन-पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (RT-PCR) तथा एंटीबॉडी-कैप्चर ELISA, इबोला संक्रमण की पुष्टि के लिए मान्य प्रयोगशाला निदान विधियाँ हैं। 2. mAb114 (Ansuvimab) तथा REGN-EB3 (Inmazeb) जैसे मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा इबोला प्रबंधन हेतु अनुशंसित उपचारों में शामिल हैं। उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
A: केवल 1
B: केवल 2
C: 1 व 2 दोनों
D: कोई नहीं
उत्तर: C
स्पष्टीकरण:
कथन 1 सही है:
EVD की पुष्टि के लिए प्रयोगशाला परीक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रमुख निदान विधियों में RT-PCR जैसे आणविक परीक्षण, एंटीबॉडी-कैप्चर ELISA जैसे सीरोलॉजिकल परीक्षण, एंटीजन पहचान परीक्षण तथा सेल कल्चर तकनीकों द्वारा वायरस पृथक्करण शामिल हैं।
कथन 2 सही है:
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) इबोला वायरस रोग के उपचार हेतु कुछ विशेष मोनोक्लोनल एंटीबॉडी उपचारों की अनुशंसा करता है, जिनमें mAb114 (Ansuvimab) तथा REGN-EB3 (Inmazeb) शामिल हैं। इनके साथ अन्य आवश्यक नियंत्रण एवं सहायक उपचार प्रक्रियाएँ भी अपनाई जाती हैं।
Q3:
भारत और नीदरलैंड्स के बीच हालिया द्विपक्षीय विकासों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. दोनों देशों ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को “स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” (Strategic Partnership) के स्तर तक उन्नत किया, जिसका मुख्य फोकस उच्च प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर संप्रभुता तथा जलवायु सहनशीलता पर है। 2. एक नए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत, भारत की Tata Electronics ने डच सेमीकंडक्टर कंपनी ASML के साथ साझेदारी की है, ताकि भारत के पहले वाणिज्यिक सेमीकंडक्टर फैब प्लांट को सशक्त किया जा सके। 3. नीदरलैंड्स सरकार ने औपचारिक रूप से 11वीं शताब्दी के चोल कालीन ताम्रपत्र (copper plates) भारत को सौंप दिए, जिन्हें वर्ष 1712 में यूरोप ले जाया गया था। उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
A: केवल एक
B: केवल दो
C: सभी तीनो
D: कोई नहीं
उत्तर: C
स्पष्टीकरण:
कथन 1 सही है:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 16–17 मई 2026 को नीदरलैंड्स की आधिकारिक यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को औपचारिक रूप से “स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” तक उन्नत किया। इस नए ढाँचे के अंतर्गत 2026–2030 के लिए पाँच-वर्षीय रणनीतिक रोडमैप तैयार किया गया, जिसमें महत्वपूर्ण खनिज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग तथा जलवायु अनुकूलन जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है।
कथन 2 सही है:
भारत की Tata Electronics ने ASML के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। ASML उन्नत लिथोग्राफी मशीनों के निर्माण में वैश्विक स्तर पर अग्रणी और लगभग एकाधिकार रखने वाली डच कंपनी है। यह तकनीकी सहयोग गुजरात के धोलेरा में स्थापित होने वाले भारत के आगामी वाणिज्यिक सेमीकंडक्टर फैब प्लांट को मजबूत करेगा।
कथन 3 सही है:
सांस्कृतिक कूटनीति की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में, नीदरलैंड्स सरकार ने 11वीं शताब्दी के चोल कालीन ताम्रपत्र भारत को औपचारिक रूप से सौंप दिए। ये ऐतिहासिक धरोहरें वर्ष 1712 में नागपट्टिनम से यूरोप ले जाई गई थीं।
Q4:
भारत के सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश संख्या के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या का निर्धारण भारत के राष्ट्रपति द्वारा, भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर किया जाता है। 2. सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1950 में कुल आठ न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या के साथ कार्य प्रारंभ किया था, जिसमें सात puisne judges (अन्य न्यायाधीश) और एक मुख्य न्यायाधीश शामिल थे। 3. “सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026” के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृत संख्या बढ़ाकर 38 न्यायाधीश (37 न्यायाधीश और 1 मुख्य न्यायाधीश) कर दी गई। उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
A: केवल 1 और 2
B: केवल 1 और 3
C: केवल 2 और 3
D: 1, 2, और 3
उत्तर: C
स्पष्टीकरण:
कथन 1 गलत है:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने का अधिकार केवल संसद के पास है, न कि राष्ट्रपति या मुख्य न्यायाधीश के पास। संसद इस शक्ति का प्रयोग “सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956” जैसे कानूनों को बनाकर या उनमें संशोधन करके करती है।
कथन 2 सही है:
जब भारत का सर्वोच्च न्यायालय वर्ष 1950 में स्थापित हुआ और उसने कार्य करना शुरू किया, तब उसमें कुल आठ न्यायाधीश थे—सात puisne judges तथा एक भारत के मुख्य न्यायाधीश।
कथन 3 सही है:
हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने “सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026” को स्वीकृति दी। इस अध्यादेश द्वारा “सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956” की धारा 2 में संशोधन कर न्यायाधीशों की कुल स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी गई, जिसमें 37 न्यायाधीश और 1 मुख्य न्यायाधीश शामिल हैं।
Q5:
भारतीय संविधान के अंतर्गत निम्नलिखित में से कौन-सा प्रावधान/तंत्र संविधान की व्याख्या से संबंधित मामलों के निर्णय हेतु न्यूनतम संख्या में न्यायाधीशों के बैठने को अनिवार्य करता है?
A: अनुच्छेद 124(3)
B: अनुच्छेद 131
C: अनुच्छेद 145(3)
D: अनुच्छेद 143
उत्तर: C
स्पष्टीकरण:
अनुच्छेद 145(3) सही है:
यह अनुच्छेद प्रावधान करता है कि संविधान की व्याख्या से संबंधित किसी महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न (substantial question of law) के निर्णय हेतु कम-से-कम पाँच न्यायाधीशों का बैठना आवश्यक होगा। ऐसे पीठों को सामान्यतः “संविधान पीठ (Constitution Bench)” कहा जाता है। सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश संख्या बढ़ाने का उद्देश्य अधिक एवं बड़ी संविधान पीठों का गठन करना है, ताकि नियमित पीठों के दैनिक कार्य प्रभावित न हों।
अनुच्छेद 124(3) गलत है:
यह अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए आवश्यक योग्यताओं से संबंधित है।
अनुच्छेद 131 गलत है:
यह अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction) से संबंधित है, विशेषकर भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों अथवा राज्यों के बीच विवादों के संदर्भ में।
अनुच्छेद 143 गलत है:
यह अनुच्छेद भारत के राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि वे सार्वजनिक महत्व के विधिक या तथ्यात्मक प्रश्नों पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श एवं सलाहकारी मत (Advisory Opinion) प्राप्त कर सकें।