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Daily-current-affairs / 29 Nov 2025

भारत की किशोर न्याय प्रणाली: स्थायी कमियाँ और सुधार का मार्ग

भारत की किशोर न्याय प्रणाली: स्थायी कमियाँ और सुधार का मार्ग

सन्दर्भ: 

किशोर न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के लागू होने के लगभग एक दशक बाद भी, भारत की बाल-सुरक्षा व्यवस्था गंभीर संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही है। यह कानून एक ऐसी प्रणाली स्थापित करने के लिए बनाया गया था जो बाल-मित्र, पुनर्वास-उन्मुख और वयस्क आपराधिक न्याय प्रक्रिया से स्पष्ट रूप से भिन्न हो। फिर भी, इंडिया जस्टिस रिपोर्ट (IJR) की नई रिपोर्ट किशोर न्याय और विधि से संघर्ष में बच्चे: अग्रिम पंक्ति की क्षमता का अध्ययन”, जो 24 नवम्बर 2023 को जारी हुई, दर्शाती है कि कानूनी दृष्टि अभी भी पूर्ण रूप से साकार नहीं हो सकी है।

    • रिपोर्ट एक असहज सत्य को सामने लाती है: प्रगतिशील विधि के बावजूद, विधि से संघर्ष में रहने वाले बच्चे अभी भी विलंब, कमजोर अवसंरचना, अपर्याप्त स्टाफ वाले संस्थान और अविश्वसनीय डेटा प्रणाली का सामना करते हैं। ये कमियाँ न केवल पुनर्वास बल्कि व्यापक बाल-सुरक्षा लक्ष्यों को भी कमजोर करती हैं। इन अंतरालों को समझना भारत के न्याय वितरण तंत्र को मजबूत बनाने और यह सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है कि बच्चों जो सबसे अधिक संवेदनशील समूहों में से एक हैं, के साथ सम्मान और न्यायपूर्ण व्यवहार हो।

लंबित मामलों की समस्या:

·        अध्ययन का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष किशोर न्याय बोर्डों (JJBs) के समक्ष लंबित मामलों की भारी संख्या है। 31 अक्तूबर 2023 तक, 50,000 से अधिक बच्चे अपने मामलों पर निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे थे। 362 किशोर न्याय बोर्ड (JJB) के आंकड़ों के अनुसार, 55% मामले लंबे समय से लंबित हैं।

·        यह बैकलॉग किशोर न्याय अधिनियम की उस भावना के प्रतिकूल है, जो संवेदनशील और तीव्र सुनवाई की मांग करता है। बच्चों के संदर्भ में न्याय में देरी का अर्थ है कि भावनात्मक तनाव, अनिश्चितता और शिक्षा व पारिवारिक जीवन में व्यवधान। रिपोर्ट एक कठोर तुलना करती है कि बच्चे भी वयस्क अंडरट्रायल कैदियों जैसी स्थिति झेलते हैं वो भी उस प्रणाली की प्रतीक्षा करते हुए जो उन्हें संरक्षण देने के लिए बनाई गई है।

India’s Juvenile Justice System

रिक्तियाँ और गैर-कार्यक्षम पीठें:

एक सक्षम किशोर न्याय प्रणाली बहुविषयक पीठों पर निर्भर करती है। प्रत्येक किशोर न्याय बोर्ड में एक प्रधान मजिस्ट्रेट और दो प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता होने चाहिए ताकि न्यायिक निर्णयों में कानूनी, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संतुलन सुनिश्चित हो सके। मगर अध्ययन में व्यापक स्तर पर अनुपालन न होने की स्थिति सामने आई:

        24% किशोर न्याय बोर्ड पूर्ण पीठ के बिना कार्य कर रहे हैं।

        अध्ययन में शामिल 470 बोर्डों में से 111 में पूर्ण पीठ का अभाव था।

        केवल ओडिशा, सिक्किम और जम्मू-कश्मीर ने प्रत्येक जिले में पूर्ण पीठ की रिपोर्ट दी।

पूर्व सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश मदन बी. लोकुर ने इस स्थिति को चिंताजनकबताया, यह कहते हुए कि रिक्तियाँ केवल किशोर न्याय बोर्डों  तक सीमित नहीं, बल्कि बाल देखभाल संस्थानों (CCIs) तक भी फैली हैं। यह कमी सुनवाई, पुनर्वास योजना और समयबद्ध निर्णय को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।

राज्यों में अवसंरचना संबंधी कमियाँ:

1. सेफ्टी होम का अभाव

जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम 16–18 वर्ष की आयु के उन बच्चों के लिए सेफ्टी होम (Places of Safety) अनिवार्य करता है, जिन पर घोर अपराध का आरोप है। ऐसे बच्चों को सामान्य अवलोकन गृहों में नहीं रखा जा सकता। मगर रिपोर्ट बताती है कि:
• 14 राज्यों जिनमें आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य भी शामिल हैं, में सेफ्टी होम नहीं है।
यह एक गंभीर कानूनी व प्रशासनिक शून्य पैदा करता है।

2. कानूनी सहायता तक कमजोर पहुंच

प्रत्येक किशोर न्याय बोर्ड में एक कानूनी सेवा क्लिनिक होना चाहिए जिससे बच्चों को उचित कानूनी सहायता मिल सके। लेकिन:
सर्वेक्षण किए गए 437 किशोर न्याय बोर्डों में से 30% में कोई कानूनी सेवा क्लिनिक नहीं है।
इसका अर्थ है कि हजारों बच्चे बिना पर्याप्त कानूनी मार्गदर्शन के सुनवाई में भाग लेते हैं जो प्रक्रिया की निष्पक्षता को कमजोर करता है।

3. बाल देखभाल संस्थानों में चिकित्सकीय सुविधा का अभाव

बाल देखभाल संस्थानों (CCIs) की स्थिति और भी चिंताजनक है। जिन 15 राज्यों ने डेटा उपलब्ध कराया:
लगभग 80%
बाल देखभाल संस्थान (CCI) में डॉक्टर या चिकित्सकीय स्टाफ नहीं था।
यह अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि
बाल देखभाल संस्थान (CCIs) में अक्सर वे बच्चे रहते हैं जो उत्पीड़न, तस्करी, परित्याग या अपराध-संबंधी परिस्थितियों से निकाले गए होते हैं और जिन्हें तत्काल चिकित्सा व मनोवैज्ञानिक सहायता की आवश्यकता होती है।

कमज़ोर निगरानी और पर्यवेक्षण:

निगरानी तंत्र कागज़ों पर तो मौजूद हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन कमजोर है।

    • जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम प्रत्येक किशोर न्याय बोर्ड को प्रत्येक महीने कम-से-कम एक बार बाल देखभाल संस्थान (CCIs) का निरीक्षण करने का निर्देश देता है।
    • 14 राज्यों और जम्मू और कश्मीर में अनिवार्य 1,992 निरीक्षणों के मुकाबले केवल 810 निरीक्षण हुए।
      पर्याप्त निरीक्षण न होने से संस्थान अधिकार-उल्लंघन, उपेक्षा और दुर्व्यवहार के लिए संवेदनशील हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में अनाथालयों में बच्चों के शोषण की चुनौती पर पहले ही चिंता व्यक्त की थी।

डेटा की कमी:

    • रिपोर्ट के अनुसार विश्वसनीय डेटा का अभाव सबसे बड़ी संरचनात्मक कमजोरी है। जहाँ वयस्क न्याय प्रणाली में नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड है, वहाँ किशोर मामलों के लिए कोई केंद्रीय सार्वजनिक डेटाबेस मौजूद नहीं है।
      रिपोर्ट संकलित करने के लिए 28 राज्यों और 2 केन्द्रशाषित प्रदेशों में 250 से अधिक आरटीआई आवेदन किया जिसमें प्राप्त 500+ उत्तरों में से:
      • 11% अस्वीकृत
      • 24% का कोई उत्तर नहीं
    • यह अपारदर्शिता निगरानी को अनियमित बनाती है और जवाबदेही कमजोर करती है।
      किशोर न्याय संरचना पिरामिडीय है और इसकी प्रभावी कार्यप्रणाली इस बात पर निर्भर करती है कि डेटा पुलिस स्टेशन और CCIs से लेकर जिला और राज्य स्तर तक सहज रूप से प्रवाहित हो। डेटा बिखरा या अनुपलब्ध होने पर निगरानी निरंतर के बजाय अवसरवादी बन जाती है।
    • रिपोर्ट निष्कर्ष देती है कि कानूनी वादों और जमीन पर वास्तविकताओं के बीच की दूरी अभी भी बहुत अधिक है। सुरक्षात्मक और सुधार-उन्मुख प्रणाली की जगह किशोर न्याय व्यवस्था अक्सर वयस्क आपराधिक न्याय प्रणाली की लंबित मामले, कमजोर दस्तावेज़ीकरण और खराब फॉलो-अप जैसी कमियाँ दिखाती है।

व्यापक संस्थागत कमजोरियों का मूल्यांकन:

1. जिला बाल संरक्षण इकाइयों (DCPUs) में स्टाफ की कमी

DCPU बचाव, केस-प्रबंधन और पुनर्वास का केंद्र है। मगर कई राज्यों में निम्न पदों पर 30% से अधिक रिक्तियाँ हैं:
संरक्षण अधिकारी
परामर्शदाता
आउटरीच कार्यकर्ता
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की 2023 समीक्षा में यह कमी उजागर हुई।

2. बाल कल्याण समितियों (CWCs) में लंबित मामले

CWCs उन बच्चों को देखते हैं जिन्हें देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता है। इनमें अक्सर पाया गया:
भारी मामले
सामाजिक जांच रिपोर्टों में विलंब
कम संख्या में परामर्शदाता
अनियमित बैठकें
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की 2022 सामाजिक ऑडिट रिपोर्ट ने इन समस्याओं की पुष्टि की।

3. किशोर न्याय बोर्ड (JJBs) के लिए कमजोर बहुविषयक समर्थन

JJ अधिनियम की धारा 4 और 8 के अनुसार JJBs को मनोवैज्ञानिक, प्रोबेशन अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ताओं का समर्थन मिलना चाहिए। 2021 में दिल्ली हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत देखभाल योजना तैयार करने के लिए पर्याप्त स्टाफ की कमी पर चिंता जताई।

4. बाल देखभाल संस्थान (CCIs) की निगरानी में कमी

2021 संशोधन के बाद जिलाधिकारियों को निरीक्षण का दायित्व मिला, लेकिन अनुपालन राज्यों में काफी असमान है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई अनियमित या अवैध संस्थानों को लेकर चिंता जता चुका है।

5. विभागों के बीच कमजोर समन्वय

बचाव, पुनर्वास और पुनर्समायोजन के लिए विभिन्न विभागों के बीच घनिष्ठ तालमेल जरूरी है:
पुलिस
श्रम विभाग
स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग
जिला बाल संरक्षण इकाई
बाल कल्याण समिति
किशोर न्याय बोर्ड
बाल स्वराज पोर्टल (2021–23) ने इन एजेंसियों के बीच क्रॉस-रिपोर्टिंग और फॉलो-अप में गंभीर अंतराल दिखाए।

सहकार्य और तंत्रगत एकीकरण को मजबूत करना:

1. जिला स्तर पर संयोजन समितियाँ

जिलाधिकारियों के नेतृत्व में वैधानिक समितियाँ जिला बाल संरक्षण इकाई, बाल कल्याण समिति, किशोर न्याय बोर्ड, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की कार्यवाहियों का एकीकरण कर सकती हैं। कर्नाटक के 2023 मॉडल ने गुमशुदा बच्चों को ट्रैक करने और पुनर्वास में बेहतर परिणाम दिखाए।

2. डिजिटल एकीकरण और रियल-टाइम अपडेट

निम्न डेटाबेसों को जोड़ने से सभी संस्थान एक ही केस डेटा देख पाएँगे:
• TrackChild 2.0
• Baal Swaraj
• CCTNS (पुलिस)
MWCD की 2024 रिपोर्ट में पाया गया कि डिजिटल एकीकरण से बच्चों की रिकवरी दर में सुधार हुआ।

3. वैधानिक निकायों के लिए पेशेवर प्रशिक्षण

राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD) प्रमाणित प्रशिक्षण किशोर न्याय बोर्ड और बाल कल्याण समितियों के सदस्यों के लिए अनिवार्य किया जा सकता है ताकि किशोर न्याय नियमों की एकसमान व्याख्या और बाल-संवेदनशील प्रक्रियाएँ सुनिश्चित हों।

4. नियमित स्वतंत्र निरीक्षण

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की 2021 दिशानिर्देशों के आधार पर त्रैमासिक सामाजिक ऑडिट और तृतीय-पक्ष मूल्यांकन पारदर्शिता बढ़ाने में महत्वपूर्ण हैं।

5. एकीकृत वित्तपोषण

चाइल्ड प्रोटेक्शन सर्विसेज योजना के अंतर्गत स्वास्थ्य, श्रम और शिक्षा विभागों के बजट को मिलाकर योजनाबद्ध तरीके से संसाधन आवंटन किया जा सकता है। 15वें वित्त आयोग के अनुदान राज्यों को संयोजन-आधारित मॉडल अपनाने का अवसर देता है।

निष्कर्ष:

भारत की किशोर न्याय प्रणाली, जो प्रगतिशील कानून और संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3) और 21 पर आधारित है, बच्चों की सुरक्षा और पुनर्वास को सुदृढ़ करने का लक्ष्य रखती है। लेकिन इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के नए निष्कर्ष दर्शाते हैं कि वास्तविक स्थिति इस लक्ष्य से अभी काफी दूर है। लंबित मामले, रिक्तियाँ, कमजोर निगरानी, खराब अवसंरचना और रियल-टाइम डेटा की कमी, ये सभी इस प्रणाली के मूल सिद्धांतों को कमजोर करते हैं। इस ढाँचे को मजबूत बनाने के लिए केवल सतही समाधान पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता है एक डिजिटल रूप से एकीकृत, पेशेवर रूप से प्रशिक्षित और उत्तरदायी व्यवस्था की जहाँ सभी संस्थान एकसाथ कार्य करें। तभी किशोर न्याय प्रणाली अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगी।

UPSC/PCS मुख्य प्रश्न: किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 एक बाल-मित्र न्याय प्रणाली का वादा करता है, फिर भी संरचनात्मक कमजोरियाँ इसके कार्यान्वयन को प्रभावित करती रहती हैं। प्रमुख संस्थागत और प्रशासनिक कमियों पर चर्चा करते हुए बाल-सुरक्षा से जुड़े निकायों के बीच समन्वय को सुदृढ़ करने हेतु सुधार सुझाइए।