परिचय:
भारत को अक्सर “दुनिया की फार्मेसी” कहा जाता है। वैश्विक स्तर पर उपभोग किए जाने वाले हर पाँच में से एक जेनेरिक दवा का निर्माण, भारत में होता है। न्यूयॉर्क की फार्मेसी से लेकर लागोस के अस्पतालों तक, भारत में बनी दवाओं की पहुँच हैं। यह उपलब्धि राष्ट्रीय गर्व का विषय है और इसने भारत को वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में एक केंद्रीय खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया है।
- फिर भी, इस सफलता के पीछे चुनौतियों भी है। इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस के मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थकेयर मैनेजमेंट के एक हालिया अध्ययन ने भारत की औषधि नीति और नियामक ढांचे में गंभीर खामियों की ओर इशारा किया है। ये कमजोरियाँ न केवल घरेलू दवा सुरक्षा को खतरे में डालती हैं, बल्कि भारत की एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर भी प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
भारत की औषधि नियमन व्यवस्था:
भारत के दवा बाजार की सबसे असामान्य विशेषताओं में से एक है “ब्रांडेड जेनेरिक्स” का वर्चस्व।
· असली जेनेरिक (True Generics) सस्ती, पेटेंट-रहित दवाएँ होती हैं जिनका उद्देश्य मरीजों को किफायती पहुँच प्रदान करना होता है।
· ब्रांडेड दवाएँ वे पेटेंटेड दवाएँ हैं जिन्हें विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं और अक्सर ये महँगी होती हैं।
· ब्रांडेड जेनेरिक्स—जो भारत के दवा बाजार का 87% हिस्सा हैं—इन दोनों के बीच आते हैं। ये पेटेंट के तहत नहीं आते, फिर भी इन पर ब्रांड नाम होते हैं और इन्हें सच्चे जेनेरिक्स की तुलना में महँगे दाम पर बेचा जाता है।
इस प्रणाली ने वह स्थिति बना दी है जिसे कई विशेषज्ञ “दोनों दुनिया की सबसे खराब स्थिति” कहते हैं। मरीजों को न तो जेनेरिक्स से जुड़ी सस्ती कीमतें मिलती हैं और न ही उन्हें ब्रांडेड दवाओं की प्रीमियम कीमत को सही ठहराने वाला कोई विशेषाधिकार।
अध्ययन भारत की औषधि नियमन प्रणाली में दो प्रमुख कमियों को पहचानता है:
1. दवा गुणवत्ता सुरक्षा में देरी: कई आवश्यक सुरक्षा उपाय जैसे गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज़ (GMPs), पोस्ट-मार्केटिंग सर्विलांस और संरचित निरीक्षण केवल पिछले दो दशकों में पेश किए गए। लंबे समय तक भारत ने विनिर्माण और वितरण पर बिना महत्वपूर्ण जाँच के काम किया।
2. खंडित नीतिनिर्माण: सुधार अक्सर व्यापक विधायी बहस के बजाय टुकड़ों-टुकड़ों में गजट अधिसूचनाओं के रूप में लाए गए। इसने एक खंडित और पुराना नियामक ढाँचा बना दिया, जिससे कमजोर निगरानी और राज्यों में असमान प्रवर्तन हुआ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अनुमान है कि विकासशील देशों में हर दस में से एक दवा नकली या निम्न-स्तरीय होती है। यद्यपि इसके लिए केवल भारत जिम्मेदार नहीं है, लेकिन लगातार गुणवत्ता जाँच में विफल होने की रिपोर्टों ने भारत की एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में छवि पर सवाल उठाए हैं।
दवा उपभोग में विश्वास की कमी:
भारत के खंडित नियामक माहौल का सबसे हानिकारक परिणाम विश्वास का क्षरण है।
· उपभोक्ता व्यवहार: असली जेनेरिक्स की उपलब्धता के बावजूद, अधिकांश भारतीय अभी भी ब्रांडेड जेनेरिक्स को प्राथमिकता देते हैं। इसका मुख्य कारण दवा कंपनियों द्वारा दशकों से किया गया वह मार्केटिंग है, जिसने ब्रांडेड दवाओं को श्रेष्ठ बताया।
· जागरूकता की कमी: इस बारे में कोई सतत सरकारी अभियान नहीं है कि लोग सुरक्षित दवाओं की पहचान कैसे करें या जेनेरिक दवाएँ समान रूप से प्रभावी होती हैं। मरीजों को अक्सर अपने आप एक जटिल और भ्रमित प्रणाली से गुजरना पड़ता है।
भारत में दवा नियमन:
भारत में दवाओं का नियमन ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 (DCA) और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 के तहत किया जाता है। ये कानून दवाओं के आयात, निर्माण, बिक्री और वितरण को नियंत्रित करते हैं।
· सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO): स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है। यह दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और कॉस्मेटिक्स की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता को नियंत्रित करता है।
· स्टेट ड्रग रेगुलेटरी अथॉरिटीज़ (SDRAs): विनिर्माण इकाइयों को लाइसेंस देती हैं, बिक्री की निगरानी करती हैं, उल्लंघनकर्ताओं पर मुकदमा चलाती हैं और भ्रामक विज्ञापनों पर कार्रवाई करती हैं।
· ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (DTAB): दवा नियमन से संबंधित तकनीकी मामलों पर केंद्र सरकार को सलाह देता है।
· ड्रग्स कंसल्टेटिव कमेटी (DCC): राज्यों और केंद्र के बीच कानून लागू करने में समानता सुनिश्चित करती है।
· सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी (CDL): दवाओं और कॉस्मेटिक्स की गुणवत्ता परीक्षण के लिए राष्ट्रीय प्रयोगशाला है।
इस संरचना में, केंद्र और राज्यों के बीच जिम्मेदारियाँ साझा की जाती हैं। CDSCO नई दवाओं की मंजूरी, क्लिनिकल ट्रायल और आयात को संभालता है, जबकि राज्य लाइसेंसिंग और स्थानीय निरीक्षण संभालते हैं।
दवा गुणवत्ता और नियमन में अन्य समस्याएँ:
· कमजोर प्रवर्तन: केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन ओवरलैपिंग अधिकारक्षेत्र बनाता है और प्रवर्तन को कमजोर करता है। किसी एक प्राधिकरण के पास पूर्ण नियंत्रण नहीं होता, जिससे खामियाँ रह जाती हैं।
· राज्य-स्तरीय चुनौतियाँ: कई राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण संसाधनों की कमी से जूझते हैं। परीक्षण प्रयोगशालाएँ अपर्याप्त हैं, दवा निरीक्षकों की संख्या कम है और अधिकारी अक्सर कानूनी व तकनीकी पहलुओं में प्रशिक्षण से वंचित होते हैं। इससे वे उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ मजबूत कार्रवाई करने में असमर्थ रहते हैं।
· आयात पर निर्भरता: भारत अपने एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) का एक बड़ा हिस्सा चीन, ताइवान और अन्य देशों से आयात करता है। इससे गुणवत्ता निगरानी और आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियों पर चिंता बढ़ती है।
· वित्तीय बाधाएँ: CDSCO और SDRAs दोनों ही सरकारी फंड पर निर्भर हैं। जटिल अनुमोदन प्रणाली के कारण धन तक पहुँच में देरी होती है, जिससे दक्षता प्रभावित होती है।
· पारदर्शिता की कमी: दवा निर्माताओं का कोई केंद्रीय डेटाबेस नहीं है, अनुमोदन चरणों की समय-सीमा अस्पष्ट है और रिकॉर्ड-कीपिंग कमजोर है। इस सूचना असमानता के कारण जवाबदेही को ट्रैक करना कठिन हो जाता है।
· फार्माकोविजिलेंस की खामियाँ: भारत का फार्माकोविजिलेंस प्रोग्राम (PvPI) सीमित पहुंच रखता है। कई मरीज और यहाँ तक कि स्वास्थ्य पेशेवर भी प्रतिकूल दवा प्रतिक्रियाओं की रिपोर्ट करने की प्रक्रिया से अनजान हैं। अधिकारियों की ओर से इस पर कार्रवाई की जानकारी भी कम मिलती है।
· डेटा इंटीग्रिटी समस्याएँ: कुछ भारतीय निर्माताओं को बायोअवेलेबिलिटी और बायोइक्विवेलेंस से संबंधित अध्ययनों में डेटा अखंडता मुद्दों के लिए चिह्नित किया गया है। यह भारत के दवा अनुसंधान अभ्यासों में विश्वास को कमजोर करता है।
गुणवत्ता सुधार के लिए उठाए गए कदम:
· राज्य औषधि नियामक प्रणाली को सशक्त करना (SSDRS): प्रयोगशालाओं और राज्य औषधि नियंत्रक कार्यालयों को उन्नत करने के लिए केंद्र प्रायोजित योजना। · DCA संशोधन (2008): नकली और मिलावटी दवाओं के लिए कड़े दंड लागू किए गए, कुछ अपराधों को गैर-जमानती बनाया गया। · 1945 के नियमों में संशोधन: विनिर्माण लाइसेंस देने से पहले निरीक्षण अनिवार्य किया गया। · शेड्यूल M संशोधन: WHO-GMP मानकों को भारतीय नियमों में एकीकृत किया गया। · फार्मास्युटिकल्स टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन असिस्टेंस स्कीम (PTUAS): 500 करोड़ रुपये से कम टर्नओवर वाले सभी विनिर्माण इकाइयों तक विस्तारित, ताकि तकनीक और गुणवत्ता उन्नयन हो सके। · विशेष न्यायालय: राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में DCA के अंतर्गत अपराधों की शीघ्र सुनवाई के लिए स्थापित। |
ऑनलाइन फार्मेसी और रिटेल चेन
ऑनलाइन फार्मेसी का उदय नए जोखिम प्रस्तुत करता है। जयपुर में 2014 के एक अध्ययन में पाया गया कि 8 में से 2 ई-फार्मेसी ने बिना पर्चे के दवाएँ डिलीवर कीं।
दूसरी ओर, रिटेल फार्मेसी चेन ने सकारात्मक परिणाम दिखाए हैं। हैदराबाद के एक अध्ययन में पाया गया कि पारंपरिक फार्मेसी की तुलना में दवा गुणवत्ता में 5% सुधार और कीमतों में 2% कमी आई। उचित नियमन के साथ, ऐसे मॉडल किफायतीपन और सुरक्षा में सुधार कर सकते हैं।
आगे की राह
· मजबूत नियमन: लाइसेंसिंग, निरीक्षण, सैंपलिंग और परीक्षण में अधिक निवेश।
· वित्तीय स्वायत्तता: नियामकों को अपनी आय उत्पन्न करने और वितरित करने की अनुमति देना, जिससे धीमी सरकारी मंजूरियों पर निर्भरता कम हो।
· डिजिटल उपकरण: केंद्रीकृत रिकॉर्ड-कीपिंग, राष्ट्रीय दवा डेटाबेस और वास्तविक समय फार्माकोविजिलेंस के लिए डिजिटल तकनीक का उपयोग।
· उपभोक्ता जागरूकता: जेनेरिक दवाओं के बारे में लोगों को शिक्षित करने और सुरक्षित दवाओं की पहचान में मदद करने के लिए सतत अभियान शुरू करना।
· समान मानक: CDSCO में अधिक शक्तियों का केंद्रीकरण और DCC के माध्यम से SDRAs के साथ मजबूत साझेदारी।
निष्कर्ष
भारत की औषधि उद्योग दुनिया की सबसे बड़ी उद्योगों में से एक है, जो बड़ी मात्रा में किफायती दवाएँ बनाता है। लेकिन इसकी दीर्घकालिक सफलता घरेलू स्तर पर प्रमुख समस्याओं को ठीक करने पर निर्भर है। ब्रांडेड जेनेरिक्स पर अत्यधिक निर्भरता, दवा गुणवत्ता पर कमजोर निगरानी, संस्थानों के बीच समन्वय की कमी और जनता में कम जागरूकता जैसे मुद्दे धीरे-धीरे सिस्टम में विश्वास को कम कर रहे हैं। यदि भारत “दुनिया की फार्मेसी” बना रहना चाहता है, तो उसे प्रतिक्रियात्मक के बजाय सक्रिय नियमन की ओर बढ़ना होगा। इसका अर्थ है मजबूत निरीक्षण, बेहतर उपभोक्ता शिक्षा और संस्थानों के बीच अधिक समन्वय।
मुख्य प्रश्न: भारत ‘दुनिया की फार्मेसी’ के नाम से जाना जाता है। फिर भी, ब्रांडेड जेनेरिक्स, कमजोर नियामक प्रवर्तन, खंडित संस्थाएँ और उपभोक्ता जागरूकता की कमी जैसी लगातार समस्याएँ इसकी औषधि प्रणाली में विश्वास को कम कर रही हैं। इन चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए और भारत के औषधि नियामक ढाँचे में सुधार के लिए उपाय सुझाइए। |