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Daily-current-affairs / 07 Jan 2026

भारत की वित्तीय स्थिरता: मजबूत आधार और उभरते प्रणालीगत जोखिम

भारत की वित्तीय स्थिरता: मजबूत आधार और उभरते प्रणालीगत जोखिम

संदर्भ:

आधुनिक अर्थव्यवस्था की स्थिरता उसकी वित्तीय प्रणाली की मजबूती पर निर्भर करती है। बैंक, गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान, भुगतान तंत्र और पूंजी बाजार न केवल आर्थिक गतिविधियों को गति देते हैं, बल्कि संकट के समय पूरे आर्थिक तंत्र को संभालने की क्षमता भी रखते हैं। वैश्विक वित्त का इतिहास यह स्पष्ट करता है कि जब वित्तीय स्थिरता कमजोर होती है, तो उसका प्रभाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी गहराई से पड़ता है। वर्ष 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहाँ वित्तीय क्षेत्र की अस्थिरता ने रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और शासन व्यवस्था तक को प्रभावित किया।

      • आज, जब विश्व अर्थव्यवस्था भू-राजनीतिक तनाव, उच्च ब्याज दरों, आपूर्ति-श्रृंखला व्यवधान और तीव्र तकनीकी परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, भारत की वित्तीय स्थिति का आकलन और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। इसी संदर्भ में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा प्रकाशित वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (Financial Stability Report) यह संकेत देती है कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली समग्र रूप से मजबूत बनी हुई है। किंतु इसके समानांतर कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ भी उभर रही हैं, जो भविष्य में वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम उत्पन्न कर सकती हैंविशेष रूप से असुरक्षित खुदरा ऋण, फिनटेक-आधारित डिजिटल लेंडिंग और क्रिप्टो परिसंपत्तियों से जुड़े खतरे।

वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुख्य बिन्दु:

      • रिपोर्ट के अनुसार भारत की समग्र वित्तीय स्थिति (Fiscal Health) स्थिर बनी हुई है। संप्रभु ऋण टिकाऊ स्तर पर है, जिसे  एस एंड पी ग्लोबल रेटिंग्स द्वारा भारत की रेटिंग को ‘बीबीबीतक उन्नत किया जाना, अनुकूल ब्याज दरविकास अंतर (interest rate–growth differential) और विदेशी मुद्रा दायित्वों का अपेक्षाकृत निम्न स्तर समर्थन प्रदान करता है।
      • हालाँकि, बाज़ारों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से जुड़ा उत्साह दिखाई देता है, लेकिन रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यह आशावाद अंतर्निहित कमजोरियों को छिपा सकता है और वैश्विक झटकों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ा सकता है।
      • फिनटेक क्षेत्र में ऋण वितरण में 36.1% की तीव्र वृद्धि दर्ज की गई है, परंतु भारतीय रिज़र्व बैंक ने चिंता जताई है कि पाँच या अधिक ऋणदाताओं से असुरक्षित ऋण लेने वाले उधारकर्ताओं में ऋण-हानि (impairment) का स्तर अधिक है।
      • रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि विदेशी मुद्रा-आधारित स्टेबलकॉइन का व्यापक प्रसार भारत की मौद्रिक संप्रभुता को कमजोर कर सकता है, नीति संचरण को बाधित कर सकता है तथा धनशोधन (money laundering) के जोखिम बढ़ा सकता है।
      • मुद्रा के मोर्चे पर, भारतीय रुपये में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरावट देखी गई, जिसका कारण व्यापार शर्तों (terms of trade) में गिरावट, व्यापारिक साझेदारों की तुलना में अधिक शुल्क (tariffs) और पूंजी प्रवाह में सुस्ती रहा। इसके बावजूद, बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति मजबूत बनी हुई है, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCBs) के पास पर्याप्त पूंजी बफर मौजूद हैं और सितंबर 2025 तक सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (GNPA) अनुपात घटकर 2.2% के बहु-दशकीय निम्न स्तर पर पहुँच गया है।

वित्तीय स्थिरता और उसका महत्व:

      • वित्तीय स्थिरता का तात्पर्य ऐसी स्थिति से है, जहाँ वित्तीय संस्थान, बाजार और अवसंरचनाएँ बिना किसी बड़े व्यवधान के कार्य करती रहें, आंतरिक या बाहरी झटकों को सहन कर सकें और वास्तविक अर्थव्यवस्था को निरंतर समर्थन प्रदान करें। यह केवल बैंकों की बैलेंस शीट तक सीमित अवधारणा नहीं है, बल्कि इसमें उपभोक्ता विश्वास, निवेशकों की धारणा, भुगतान प्रणाली की विश्वसनीयता और नीति-निर्माताओं की साख भी शामिल होती है।
      • भारत जैसे विकासशील देश के लिए वित्तीय स्थिरता का महत्व और अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि आर्थिक वृद्धि, रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन का सीधा संबंध एक सुचारु वित्तीय प्रणाली से जुड़ा हुआ है। किसी भी वित्तीय अस्थिरता का प्रभाव सबसे पहले और सबसे अधिक कमजोर वर्गों पर ही पड़ता है, जिससे असमानता और सामाजिक असंतोष बढ़ने का खतरा रहता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था का लचीलापन:

      • हाल के वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने कई गंभीर वैश्विक और घरेलू झटकों का सामना किया है कोविड-19 महामारी, वैश्विक मंदी की आशंकाएँ, आपूर्ति संकट और भू-राजनीतिक टकराव। इसके बावजूद भारत की आर्थिक वृद्धि अपेक्षाकृत मजबूत बनी रही। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि भारत की वृद्धि मुख्यतः घरेलू मांग पर आधारित रही है।
      • सेवा क्षेत्र की निरंतर मजबूती, सार्वजनिक पूंजीगत व्यय में वृद्धि, बुनियादी ढाँचे में निवेश और डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार भारत की आर्थिक लचीलापन क्षमता को दर्शाते हैं। सार्वजनिक पूंजीगत व्यय ने क्राउड-इन इफेक्टके माध्यम से निजी निवेश को प्रोत्साहित किया है, जिससे बैंक ऋण की गुणवत्ता और मांगदोनों को समर्थन मिला है। साथ ही, नियंत्रित मुद्रास्फीति और विवेकपूर्ण मौद्रिक नीति ने व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह लचीलापन इस बात का संकेत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब केवल अल्पकालिक नीतिगत हस्तक्षेपों पर नहीं, बल्कि संरचनात्मक सुधारों पर आधारित होती जा रही है।

बैंकिंग प्रणाली की मजबूती और सुधारों का प्रभाव:

      • भारतीय बैंकिंग प्रणाली ने अतीत में गंभीर संकटों का सामना किया है। एक समय उच्च गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPAs) बैंकों की सबसे बड़ी समस्या थीं। कमजोर ऋण अनुशासन, कॉर्पोरेट गवर्नेंस की कमी और अपर्याप्त नियामकीय निगरानी ने बैंकिंग क्षेत्र को कमजोर किया था।
      • हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के क्रियान्वयन, बैंकों के पुनर्पूंजीकरण, ऋण मूल्यांकन प्रक्रियाओं में सुधार और जोखिम प्रबंधन तंत्र को मजबूत करने से NPAs में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। आज भारतीय बैंक बेहतर पूंजी पर्याप्तता, अधिक पारदर्शिता और मजबूत बैलेंस शीट के साथ कार्य कर रहे हैं, जो वित्तीय स्थिरता के लिए एक ठोस आधार प्रदान करता है।
      • फिर भी, यह स्वीकार करना आवश्यक है कि सुधारों की यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। IBC प्रक्रियाओं में देरी, बड़े हेयरकट और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में शासन संबंधी चुनौतियाँ यह संकेत देती हैं कि बैंकिंग सुधारों को और गहराई देने की आवश्यकता बनी हुई है।

असुरक्षित खुदरा ऋण:

      • जहाँ एक ओर बैंकिंग प्रणाली मजबूत दिखती है, वहीं दूसरी ओर असुरक्षित खुदरा ऋण का तेज़ विस्तार एक संभावित जोखिम के रूप में उभर रहा है। व्यक्तिगत ऋण, क्रेडिट कार्ड और बाय नाउ पे लेटरजैसे उत्पादों ने ऋण को अत्यंत सुलभ बना दिया है।
      • ऋण की सुलभता अपने आप में नकारात्मक नहीं है, क्योंकि यह उपभोग और अल्पकालिक आर्थिक गतिविधि को प्रोत्साहित करती है। किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब ऋण विस्तार उपभोक्ताओं की वास्तविक पुनर्भुगतान क्षमता से आगे निकल जाता है। असुरक्षित ऋण में संपार्श्विक का अभाव होता है, जिससे डिफॉल्ट की स्थिति में बैंकिंग प्रणाली पर जोखिम और अधिक बढ़ जाता है।
      • यदि यह प्रवृत्ति अनियंत्रित रही, तो घरेलू ऋण स्तर में वृद्धि और क्रेडिट-टू-जीडीपी गैप बढ़ सकता है, जिससे प्रणालीगत जोखिम उत्पन्न होने की आशंका है। यह स्थिति 2008 के सब-प्राइम संकट की याद दिलाती है, जहाँ गैर-जिम्मेदार ऋण वितरण ने वैश्विक वित्तीय तंत्र को गहरे संकट में धकेल दिया था।

फिनटेक और डिजिटल ऋण:

      • फिनटेक क्रांति ने भारत की वित्तीय प्रणाली को अधिक समावेशी बनाया है। डिजिटल भुगतान, त्वरित ऋण स्वीकृति और डेटा-आधारित क्रेडिट आकलन ने उन वर्गों तक वित्तीय सेवाएँ पहुँचाई हैं, जो पहले औपचारिक वित्तीय प्रणाली से बाहर थे। यह वित्तीय समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
      • परंतु फिनटेक ऋण में तीव्र वृद्धि के साथ-साथ कमजोर अंडरराइटिंग मानक, अपर्याप्त नियामकीय निगरानी और एक ही उधारकर्ता पर कई स्रोतों से ऋण का बोझ गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। यह स्थिति संकेत देती है कि तकनीकी नवाचार को बिना समुचित नियमन के आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
      • इस क्षेत्र में एक समन्वित नियामकीय ढाँचा, मजबूत डेटा-साझाकरण व्यवस्था और प्रभावी उपभोक्ता संरक्षण नियम आवश्यक होंगे, ताकि नवाचार और स्थिरता के बीच संतुलन बना रहे।

क्रिप्टो परिसंपत्तियाँ और मौद्रिक संप्रभुता:

      • डिजिटल युग ने मुद्रा की अवधारणा को भी चुनौती दी है। क्रिप्टोकरेंसी और स्टेबलकॉइन जैसी परिसंपत्तियाँ पारंपरिक वित्तीय प्रणाली के बाहर एक समानांतर व्यवस्था निर्मित कर रही हैं। इनके समर्थक इन्हें विकेंद्रीकरण और स्वतंत्रता का प्रतीक मानते हैं, जबकि नियामक संस्थाएँ इन्हें वित्तीय स्थिरता और मौद्रिक संप्रभुता के लिए संभावित खतरे के रूप में देखती हैं।
      • विशेष रूप से विदेशी मुद्रा-आधारित स्थिरकॉइन केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति के प्रभाव को कमजोर कर सकते हैं। यदि बड़े पैमाने पर लेन-देन पारंपरिक मुद्रा के बाहर होने लगें, तो केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नियंत्रण क्षमता प्रभावित हो सकती है। यह मौद्रिक संप्रभुता के लिए एक गंभीर चुनौती है। इसी संदर्भ में केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) एक संतुलित समाधान के रूप में उभरती है, जो तकनीकी नवाचार को अपनाते हुए मौद्रिक नियंत्रण बनाए रखने का अवसर प्रदान करती है।

वित्तीय स्थिरता का सामाजिक आयाम:

      • वित्तीय स्थिरता केवल आर्थिक अवधारणा नहीं है; इसका सामाजिक आयाम भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि बैंकिंग प्रणाली अस्थिर होती है, तो उसका प्रभाव रोजगार, बचत और सामाजिक सुरक्षा पर पड़ता है। विशेषकर मध्यम और निम्न आय वर्ग वित्तीय संकट से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
      • इसलिए वित्तीय स्थिरता को केवल आंकड़ों और अनुपातों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसमें नैतिक ऋण वितरण, उपभोक्ता संरक्षण और वित्तीय साक्षरता जैसे तत्वों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

आगे की राह:

भारत की वित्तीय प्रणाली आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। एक ओर मजबूत बैंकिंग प्रणाली, बेहतर पूंजी स्थिति और आर्थिक लचीलापन है, तो दूसरी ओर असुरक्षित ऋण, फिनटेक जोखिम और क्रिप्टो चुनौतियाँ हैं। इस स्थिति में नीति-निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखना है जिसमें जिम्मेदार तरीके से ऋण विस्तार हो, नियमन के साथ नवाचार हो और वित्तीय समावेशन शामिल हो।

निष्कर्ष:

वित्तीय स्थिरता कोई स्थिर अवस्था नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है, जो निरंतर निगरानी, समयबद्ध हस्तक्षेप और दूरदर्शी नीतियों की माँग करती है। भारतीय बैंकिंग प्रणाली ने अतीत की कमजोरियों से सीख लेकर स्वयं को सुदृढ़ किया है, किंतु भविष्य की चुनौतियाँ अधिक जटिल और बहुआयामी हैं। यदि भारत मजबूती और सतर्कता के इस संतुलन को बनाए रखने में सफल होता है, तो वह न केवल वैश्विक वित्तीय अस्थिरताओं से सुरक्षित रहेगा, बल्कि वित्तीय स्थिरता को एक सार्वजनिक हित के रूप में स्थापित करते हुए स्थायी और समावेशी आर्थिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त कर सकेगा। यही भारत की वित्तीय स्थिरता की वास्तविक कसौटी है।

 

UPSC/PCS मुख्य परीक्षा प्रश्न: भारतीय रिज़र्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट भारत की आर्थिक स्थिति के बारे में क्या संकेत देती है? उभरते जोखिमों और नीतिगत विकल्पों की चर्चा कीजिए।

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