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Daily-current-affairs / 02 Jan 2026

विकास, स्थिरता और आत्मविश्वास: वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक मजबूती

विकास, स्थिरता और आत्मविश्वास: वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक मजबूती

सन्दर्भ:

वैश्विक अर्थव्यवस्था आज अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार संरक्षणवाद और मौद्रिक सख्ती के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में भारत की अर्थव्यवस्था का उच्च विकास, गिरती महंगाई और घटती बेरोज़गारी के साथ आगे बढ़ना केवल संयोग नहीं, बल्कि पिछले एक दशक में किए गए संरचनात्मक सुधारों, सुदृढ़ संस्थागत ढांचे और घरेलू मांग-आधारित विकास मॉडल का परिणाम है।

      • वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में 8.2 प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि, नवंबर 2025 में बेरोज़गारी का 4.7 प्रतिशत तक गिरना और सीपीआई मुद्रास्फीति का ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तरों तक पहुँचना, भारतीय अर्थव्यवस्था को एक दुर्लभ गोल्डीलॉक्स पीरियडमें स्थापित करता है जहाँ विकास पर्याप्त तेज़ है और महंगाई नियंत्रण में है।

तीव्र होती आर्थिक वृद्धि:

      • भारत की हालिया विकास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मुख्यतः घरेलू कारकों द्वारा संचालित है। वैश्विक व्यापार में सुस्ती और निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्थाओं पर बढ़ते दबाव के विपरीत, भारत में निजी उपभोग, शहरी मांग में सुधार और सार्वजनिक पूंजीगत व्यय ने विकास को गति दी है।
      • वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में जीडीपी वृद्धि छह तिमाहियों के उच्चतम स्तर पर पहुँचना इस बात को दर्शाता है कि भारत का आर्थिक विस्तार अस्थायी प्रोत्साहनों पर नहीं, बल्कि संरचनात्मक मजबूती पर आधारित है। सरकार द्वारा अवसंरचना सड़क, रेल, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल नेटवर्क में निरंतर निवेश ने न केवल अल्पकालिक मांग उत्पन्न की है, बल्कि दीर्घकालीन उत्पादकता और निजी निवेश को भी प्रोत्साहित किया है।

      • भारत की घरेलू विकास दर कई कारकों के कारण ऊपर की ओर बढ़ रही है, जैसे- मजबूत घरेलू मांग, आयकर और वस्तु एवं सेवा कर का सरलीकरण, कच्चे तेल की कीमतों में कमी, सरकार द्वारा पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता के आधार पर बढ़ाना और कम मुद्रास्फीति के कारण अनुकूल मौद्रिक और वित्तीय स्थितियाँ।
      • इसी पृष्ठभूमि में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा वित्त वर्ष 2025-26 के लिए जीडीपी वृद्धि अनुमान को 6.8 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.3 प्रतिशत करना, भारत की घरेलू आर्थिक मजबूती में नीति-निर्माताओं के विश्वास को दर्शाता है।

रोज़गार परिदृश्य:

      • भारत जैसे युवा देश के लिए आर्थिक वृद्धि तभी सार्थक है, जब वह रोज़गार सृजन में परिलक्षित हो। बेरोजगारी और आर्थिक गतिविधि एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसे-जैसे विकास की गति बढ़ती है, वस्तुओं और सेवाओं के अधिक उत्पादन से श्रम की मांग बढ़ती है, जिससे रोजगार के अधिक अवसर पैदा होते हैं और बेरोजगारी कम होती है। इस संदर्भ मेंभारत की घटती बेरोजगारी दर इसकी आर्थिक गति की मजबूती को दर्शाती है। विकास की निरंतरता को देखते हुए, भारत के  बेहतर होते रोजगार परिणाम निरंतर विकास और रोजगार सृजन के बीच अच्छे तालमेल को दिखाते हैं।
      • नवंबर 2025 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के व्यक्तियों के लिए बेरोजगारी दर (सीडब्ल्यूएस के अनुसार) घटकर 4.8 प्रतिशत रह गई, जो अक्टूबर 2025 में 5.4 प्रतिशत थी। यह अप्रैल 2025 (5.1 प्रतिशत) के बाद का सबसे निचला स्तर है। इस गिरावट का मुख्य कारण महिलाओं की बेरोजगारी दर में आई भारी कमी है। शहरी महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर 9.7 प्रतिशत से घटकर 9.3 प्रतिशत हो गई, जबकि ग्रामीण महिलाओं के लिए यह 4.0 प्रतिशत से गिरकर 3.4 प्रतिशत पर आ गई। कुल मिलाकर, ग्रामीण बेरोजगारी दर गिरकर 3.9 प्रतिशत के नए निचले स्तर पर आ गई है, जबकि शहरी बेरोजगारी दर घटकर 6.5 प्रतिशत रह गई है।

महंगाई पर नियंत्रण: 

      • उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) वस्तुओं और सेवाओं की उस बास्केट की कीमतों में होने वाला बदलाव है, जिन्हें आमतौर पर परिवारों के विशिष्ट समूहों द्वारा खरीदा जाता है। साल 2025 में, भारत ने समग्र रूप से एक अनुकूल मुद्रास्फीति वातावरण का अनुभव किया। वर्ष 2025 में सीपीआई मुद्रास्फीति का 4.26 प्रतिशत (जनवरी) से गिरकर नवंबर में 0.71 प्रतिशत तक पहुँचना, भारत के मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचे की प्रभावशीलता को रेखांकित करता है। खाद्य कीमतों में कमी, आपूर्ति-पक्ष प्रबंधन और समयोचित मौद्रिक हस्तक्षेप ने मूल्य स्थिरता सुनिश्चित की। इस नियंत्रित महंगाई के वातावरण ने भारतीय रिज़र्व बैंक को नीतिगत रेपो दर में कटौती की संभावना प्रदान की। यह संतुलन भारत की मैक्रो-आर्थिक नीति की परिपक्वता को दर्शाता है।

व्यापार और अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र:

      • वैश्विक मंदी की आशंकाओं के बावजूद भारत का बाहरी क्षेत्र उल्लेखनीय रूप से लचीला बना हुआ है। वस्तु निर्यात में निरंतर वृद्धि विशेषकर इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और पेट्रोलियम उत्पादों में भारत की विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता और वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में उसके बढ़ते एकीकरण को दर्शाती है।
      • नवंबर 2025 तक, वस्तु निर्यात का मूल्य बढ़कर 38.13 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया, जो वैश्विक व्यापारिक बाधाओं के बावजूद बाहरी सेक्टर के प्रदर्शन में निरंतर वृद्धि को दर्शाता है।
      • वर्ष 2025 में वस्तु निर्यात की मजबूत वृद्धि में योगदान देने वाली प्रमुख वस्तुएं काजू, समुद्री उत्पाद, अन्य अनाज, इलेक्ट्रॉनिक सामान, इंजीनियरिंग सामान और पेट्रोलियम उत्पाद थीं, जिन्होंने पिछले 11 वर्षों में 10 प्रतिशत से अधिक की अपनी उच्चतम वृद्धि दर दर्ज की।

 

 

      • सेवा निर्यात भारत की बाहरी स्थिरता का एक प्रमुख स्तंभ बना हुआ है। आईटी और व्यावसायिक सेवाओं में निरंतर विस्तार ने चालू खाता घाटे को नियंत्रित रखने में मदद की है। 686 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार, भारत को बाहरी आघातों के विरुद्ध एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करता है। 2025 में यूनाइटेड किंगडम, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ व्यापार साझेदारी को मजबूत करके, भारत ने अपने ग्लोबल एक्सपोर्ट का विस्तार किया और अपने निर्यात के लिए उभरते बाजारों तक पहुंच बढ़ाई।

निवेश प्रवाह और वैश्विक विश्वास:

      • अप्रैल से सितंबर 2025-26 की अवधि में भारत के निवेश और विकास परिदृश्य में उल्लेखनीय मजबूती देखने को मिली है, जो अर्थव्यवस्था में बढ़ते घरेलू और अंतरराष्ट्रीय विश्वास को दर्शाती है। इस अवधि में सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 19.4 प्रतिशत बढ़कर 43.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर से 51.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया।
      • इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि शुद्ध एफडीआई में 127.6 प्रतिशत की तीव्र वृद्धि दर्ज की गई, जो 3.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 7.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। यह वृद्धि मुख्यतः पूँजी की स्वदेश वापसी (repatriation) में कमी और दीर्घकालिक निवेश प्रवाह के सुदृढ़ होने के कारण संभव हुई है।
      • हालाँकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) में वैश्विक वित्तीय अनिश्चितताओं के कारण अस्थिरता बनी हुई है, फिर भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जैसे दीर्घकालिक पूँजी प्रवाह भारत की आर्थिक बुनियाद की मजबूती और संरचनात्मक सुधारों की विश्वसनीयता को रेखांकित करते हैं।
      • अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने भी भारत के आर्थिक दृष्टिकोण को लेकर आशावाद व्यक्त किया है। विभिन्न एजेंसियों द्वारा 2025 से 2027 के बीच भारत की विकास दर 6 से 7.5 प्रतिशत के दायरे में रहने का अनुमान लगाया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि भारत आने वाले वर्षों में भी सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहेगा।
      • कुल मिलाकर, बढ़ता अंतरराष्ट्रीय विश्वास, मजबूत घरेलू मांग, गिरती बेरोजगारी और नियंत्रित मुद्रास्फीति भारत को उसके 2047 के दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों की ओर अग्रसर होने के लिए एक ठोस, स्थिर और विश्वसनीय आधार प्रदान करती है।

चुनौतियाँ:

      • हालाँकि वर्तमान परिदृश्य उत्साहजनक है, फिर भी कुछ संरचनात्मक चुनौतियाँ बनी हुई हैं:
        • गुणवत्तापूर्ण और उच्च-उत्पादकता वाले रोजगार का सृजन
        • कौशल विकास और शिक्षा-रोज़गार के बीच बेहतर सामंजस्य
        • कृषि उत्पादकता और ग्रामीण आय में स्थायी वृद्धि
        • निर्यात में उच्च-मूल्य विनिर्माण की हिस्सेदारी बढ़ाना
      • इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीतिक जोखिम और वैश्विक वित्तीय अस्थिरता जैसे कारक भविष्य में विकास की गति को प्रभावित कर सकते हैं। अतः सुधारों की निरंतरता, सहकारी संघवाद और मानव पूंजी में निवेश नीति-निर्माण की केंद्रीय प्राथमिकताएँ बनी रहनी चाहिए।

निष्कर्ष:

भारत एक ऐसे आर्थिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ उच्च विकास, नियंत्रित महंगाई और बेहतर रोज़गार परिणाम एक साथ मौजूद हैं। यह केवल वर्तमान उपलब्धि नहीं, बल्कि आने वाले दशकों के लिए एक मजबूत आधार है। यदि सुधारों की गति बनी रहती है और विकास को अधिक समावेशी व टिकाऊ बनाया जाता है, तो 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य एक व्यवहारिक वास्तविकता बन सकता है।

 

UPSC/PCS मुख्य परीक्षा प्रश्न: भारत की हालिया आर्थिक वृद्धि मुख्यतः घरेलू मांग-आधारित मॉडल पर टिकी हुई है। रोजगार, महंगाई और बाहरी क्षेत्र के संकेतकों के संदर्भ में इस मॉडल की मजबूती और सीमाओं का मूल्यांकन कीजिए।