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Daily-current-affairs / 12 Jan 2026

वैश्विक अर्थव्यवस्था 2026: अनिश्चितता के मध्य विकास और स्थिरता का विश्लेषण

वैश्विक अर्थव्यवस्था 2026: अनिश्चितता के मध्य विकास और स्थिरता का विश्लेषण

सन्दर्भ:

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकाशित विश्व आर्थिक स्थिति और संभावनाएं (WESP) 2026’ रिपोर्ट ऐसे वैश्विक परिदृश्य में सामने आई है, जब विश्व अर्थव्यवस्था कोविड महामारी के प्रभावों से आगे बढ़ते हुए बहुस्तरीय और परस्पर संबद्ध संकटों का सामना कर रही है। भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान, जलवायु परिवर्तन की तीव्र होती मार तथा विकासशील देशों पर बढ़ता ऋण बोझ, ये सभी कारक वैश्विक आर्थिक स्थिरता को चुनौती दे रहे हैं।

      • रिपोर्ट इस तथ्य को रेखांकित करती है कि भारत जैसी कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपेक्षाकृत मजबूत प्रदर्शन कर रही हैं, जबकि अनेक विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं अनिश्चितता और संरचनात्मक जड़ताओं से जूझ रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अन्य प्रमुख बाजारों में अपेक्षाकृत स्थिर मांग भारत को टैरिफ वृद्धि के प्रतिकूल प्रभावों को आंशिक रूप से संतुलित करने में सहायता कर सकती है।
      • वैश्विक स्तर पर, 2026 में विश्व अर्थव्यवस्था की विकास दर 2.7% रहने का अनुमान है, जो 2025 की 2.8% की दर से हल्की गिरावट को दर्शाता है। यह प्रवृत्ति संकेत देती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था न तो पूर्ण मंदी की स्थिति में है और न ही उच्च-विकास के मार्ग पर बल्कि एक प्रकार की मध्यवर्ती, किंतु अस्थिर अवस्था में फंसी हुई है।

मंद वैश्विक विकास और संरचनात्मक बाधाएं:

रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था एक दीर्घकालिक निम्न-विकास चक्र’ (Low-growth cycle) में प्रवेश कर चुकी है। 2026 के लिए अनुमानित 2.7% की विकास दर महामारी-पूर्व औसत 3.2% से स्पष्ट रूप से कम है, जो यह दर्शाती है कि वैश्विक उत्पादक क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं हो पा रहा है।

निवेश में गिरावट-
विकसित तथा विकासशील, दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं में निजी निवेश की गति मंद पड़ी है। लगातार ऊँची ब्याज दरों ने पूंजी की लागत में वृद्धि की है, जिसके परिणामस्वरूप दीर्घकालिक अवसंरचनात्मक और औद्योगिक परियोजनाओं में निवेश कम हुआ है। यह प्रवृत्ति भविष्य की उत्पादकता और रोजगार सृजन की संभावनाओं को सीमित करती है।

व्यापारिक तनाव-
संरक्षणवाद (Protectionism) की पुनरावृत्ति और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का विखंडन (Fragmentation) अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए गंभीर चुनौती बन गया है। भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक आत्मनिर्भरता की नीतियों ने व्यापार प्रवाह को बाधित किया है। परिणामस्वरूप, 2026 में वैश्विक व्यापार वृद्धि के केवल 2.2% रहने का अनुमान है, जो वैश्वीकरण की पूर्व गति की तुलना में काफी कम है।

मुद्रास्फीति और मौद्रिक नीति दुविधा:

रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में वैश्विक हेडलाइन मुद्रास्फीति घटकर 3.1% रहने की संभावना है, जबकि 2025 में यह 3.4% थी। यद्यपि यह गिरावट सांख्यिकीय दृष्टि से सकारात्मक प्रतीत होती है, परंतु इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव उतने सरल नहीं हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि कीमतें घटी नहीं हैं, सिर्फ़ उनकी बढ़ने की गति कम हुई है। वास्तविक आय (Real Income) उतनी नहीं बढ़ी है कि वह इन ऊँची कीमतों का बोझ आसानी से उठा सके जिससे सामाजिक असमानता, गरीबी और जीवन-यापन की कठिनाइयाँ बनी रहती हैं।

जीवन-यापन की लागत का संकट-
मुद्रास्फीति की दर में कमी के बावजूद, खाद्य और ऊर्जा की संचयी कीमतें (Cumulative Prices) अब भी ऐतिहासिक रूप से ऊँचे स्तर पर बनी हुई हैं। इससे विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वर्ग की वास्तविक क्रय-शक्ति प्रभावित हुई है। कई देशों में घरेलू बजट पर दबाव बढ़ा है, जिससे गरीबी और असमानता की समस्या और गहरी हुई है।

नीतिगत दुविधा-
केंद्रीय बैंकों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे ब्याज दरों में कटौती कब और किस गति से करें। समय से पहले दरों में कमी करने से मुद्रास्फीति के बढ़ने का खतरा है, जबकि अत्यधिक देरी आर्थिक गतिविधियों को और धीमा कर सकती है। इस प्रकार, मौद्रिक नीति संतुलन साधने की एक जटिल प्रक्रिया बन गई है।

क्षेत्रीय विश्लेषण:

विश्व आर्थिक स्थिति और संभावनाएं (WESP) 2026 रिपोर्ट वैश्विक अर्थव्यवस्था में क्षेत्रीय असमानताओं के बढ़ते अंतर को स्पष्ट रूप से उजागर करती है।

भारत: वैश्विक विकास का इंजन-
भारत 2026 में भी विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बने रहने की संभावना रखता है। अनुमानित 6.6% की विकास दर का आधार मजबूत घरेलू मांग, बुनियादी ढांचे में निरंतर सरकारी निवेश तथा अपेक्षाकृत स्थिर वित्तीय प्रणाली है। यह प्रदर्शन भारत को वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में एक प्रमुख विकास-चालक के रूप में स्थापित करता है।

चीन की स्थिति-
चीन की अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक सुस्ती बनी हुई है। रियल एस्टेट क्षेत्र में जारी संकट, ऋणग्रस्त स्थानीय सरकारें और जनसांख्यिकीय परिवर्तन विशेषतः वृद्ध होती आबादी, चीन की विकास संभावनाओं को सीमित कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, इसकी वृद्धि दर 4% के आसपास स्थिर होती दिख रही है।

विकसित अर्थव्यवस्थाएं (अमेरिका और यूरोप)-
अमेरिका में उपभोग में संभावित कमी और यूरोप में ऊर्जा संक्रमण से जुड़ी लागतों के कारण इन क्षेत्रों की विकास दर 1.5% से 1.8% के बीच रहने की संभावना है। उच्च सार्वजनिक ऋण और राजनीतिक अनिश्चितता भी इन अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव डाल रही है।

अफ्रीका और लैटिन अमेरिका-
इन क्षेत्रों में भारी ऋण बोझ, सीमित वित्तीय संसाधन और बार-बार आने वाली जलवायु आपदाएं आर्थिक विकास को बाधित कर रही हैं। परिणामस्वरूप, ये अर्थव्यवस्थाएं अपनी वास्तविक क्षमता से काफी नीचे प्रदर्शन कर रही हैं।

ऋण संकट:

रिपोर्ट यह गंभीर चेतावनी देती है कि अनेक विकासशील देश ऋण संकट (Debt Distress) के कगार पर खड़े हैं। विकासशील देश ऐसे चरण में पहुँच चुके हैं, जहाँ उनकी ऋण चुकाने की क्षमता गंभीर रूप से कमजोर हो गई है। बढ़ती ब्याज दरें, विदेशी मुद्रा की कमी और धीमी आर्थिक वृद्धि के कारण इन देशों के लिए बाह्य ऋण का प्रबंधन कठिन होता जा रहा है।

ब्याज भुगतान बनाम सामाजिक सुरक्षा-
कई अफ्रीकी और निम्न-आय वाले देशों में सरकारी राजस्व का एक बड़ा हिस्सा केवल विदेशी ऋण के ब्याज भुगतान में व्यय हो रहा है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और बुनियादी ढांचे जैसे सामाजिक क्षेत्रों में निवेश के लिए संसाधन सीमित हो जाते हैं।

वित्तीय पहुंच की कमी-
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में सख्ती के कारण विकासशील देशों के लिए पूंजी जुटाना महंगा और कठिन होता जा रहा है। इस स्थिति में सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति और भी चुनौतीपूर्ण बन गई है।

जलवायु परिवर्तन और आर्थिक जोखिम:

विश्व आर्थिक स्थिति और संभावनाएं (WESP) 2026 रिपोर्ट यह स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि एक गंभीर आर्थिक जोखिम बन चुका है। 2025 में दर्ज की गई रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और प्राकृतिक आपदाओं ने 2026 के आर्थिक अनुमानों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया है।

कृषि पर प्रभाव-
एल-नीनो और ला-नीना के बदलते चक्रों ने कृषि उत्पादन की स्थिरता को खतरे में डाल दिया है। इससे खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, विशेषकर उन देशों में जहां कृषि आजीविका का मुख्य साधन है।

हरित संक्रमण (Green Transition)-
रिपोर्ट के अनुसार, जीवाश्म ईंधन से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण के लिए प्रतिवर्ष लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की आवश्यकता है, जबकि वर्तमान निवेश इसका आधा भी नहीं है। यह अंतर जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है।

आगे की राह:

संयुक्त राष्ट्र ने इस रिपोर्ट के माध्यम से वैश्विक नीति-निर्माताओं के लिए कुछ ठोस सुझाव प्रस्तुत किए हैं:

1.        बहुपक्षीय सहयोग:
वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते संरक्षणवाद और व्यापार युद्धों को समाप्त करने के लिए बहुपक्षीय संस्थानों की भूमिका को सुदृढ़ करना आवश्यक है। एक पारदर्शी, समावेशी और नियम-आधारित वैश्विक व्यापार प्रणाली न केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार को गति देगी, बल्कि विकासशील देशों को भी वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में बेहतर एकीकरण का अवसर प्रदान करेगी।

2.      ऋण राहत कार्यक्रम:
विकासशील और निम्न-आय वाले देशों पर बढ़ते ऋण बोझ को देखते हुए G20 कॉमन फ्रेमवर्क को अधिक प्रभावी, समयबद्ध और पारदर्शी बनाना अनिवार्य है। ऋण पुनर्गठन की प्रक्रिया को तेज कर इन देशों को वित्तीय दबाव से राहत दी जानी चाहिए, ताकि वे संसाधनों को ऋण सेवा के बजाय विकासात्मक और सामाजिक क्षेत्रों में निवेश कर सकें।

3.      राजकोषीय नीति में सुधार:
सरकारों को व्यापक और अलक्षित सब्सिडी के स्थान पर लक्षित एवं परिणामोन्मुखी सब्सिडी तंत्र अपनाना चाहिए। साथ ही, अवसंरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रौद्योगिकी जैसी उत्पादक परिसंपत्तियों में निवेश को प्राथमिकता देकर दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि और रोजगार सृजन को सुनिश्चित किया जा सकता है।

4.     सतत विकास लक्ष्य (SDG) निवेश:
सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति के लिए वैश्विक स्तर पर वित्त पोषण में उल्लेखनीय वृद्धि आवश्यक है। विशेष रूप से गरीबी उन्मूलन, असमानता में कमी, जलवायु कार्रवाई और मानव विकास से जुड़े लक्ष्यों पर निवेश बढ़ाकर ही 2030 तक समावेशी और सतत विकास को वास्तविक रूप दिया जा सकता है।

निष्कर्ष:

विश्व आर्थिक स्थिति और संभावनाएं 2026’ रिपोर्ट यह स्पष्ट संदेश देती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था एक निर्णायक मोड़ पर है। 2.7% की अनुमानित विकास दर न तो पूर्ण निराशा का संकेत है और न ही सतत विकास के लिए पर्याप्त है। भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं का लचीलापन आशा उत्पन्न करता है, किंतु वैश्विक सहयोग के अभाव में गरीबी, ऋण संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से प्रभावी ढंग से नहीं निपटा जा सकता। यदि वर्तमान समय में एक न्यायसंगत वित्तीय व्यवस्था और हरित भविष्य में निवेश नहीं किया गया, तो आने वाले दशक की आर्थिक रिपोर्टें कहीं अधिक चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत कर सकती हैं।

 

UPSC/PCS मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न: वैश्विक मुद्रास्फीति में गिरावट के बावजूद जीवन-यापन की लागत एक संकट क्यों बना हुआ है? विश्व आर्थिक स्थिति और संभावनाएं (WESP) 2026 रिपोर्ट के सन्दर्भ में स्पष्ट कीजिए।